विस चुनाव में लोकायुक्त, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे गौण

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पिछले पांच साल में भ्रष्टाचार की छिटपुट घटनाओं को छोड़कर कोई बड़ा मुद्दा भाजपा सरकार में नहीं आया है। कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर झारखंड में पार्टी प्रभारी रहते हुए कथित भ्रष्टाचार करने तथा उनके कार्यालय में हुए स्टिंग ऑपरेशन का मुद्दा उठाया लेकिन बाद में समय के साथ इन मुद्दों ने दम तोड़ दिया।

देहरादून|  लोकायुक्त और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे इस बार उत्तराखंड के चुनावी परिदृश्य में गौण दिखाई दे रहे हैं।

राज्य में चौदह फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनावों में जीतने के लिए पूरा दमखम लगा रही कांग्रेस अभी तक इन दोनों मुद्दों पर ज्यादा कुछ कहने से बचती रही है जबकि भाजपा ने भी अपना पूरा चुनाव प्रचार विकास के मुद्दे पर ही केंद्रित कर रखा है।

पृथक उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद 2002 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ। इसके बाद 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव से लेकर 2017 के चुनाव तक भ्रष्टाचार हमेशा प्रमुख मुद्दा रहा है। विधानसभा चुनाव 2007 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए 56 कथित घोटाले बड़ा मुद्दा बने। इन घोटालों के सहारे सत्ता की सीढी चढी भाजपा सरकार भी घोटालों के आरोपों से दूर नहीं रही।

हालांकि, 2012 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी ने अपने दूसरे मुख्यमंत्रित्व काल में सर्वसम्मति से एक कठोर लोकायुक्त अधिनियम पारित कराया। लेकिन, उनके बाद विजय बहुगुणा के नेतृत्व में बनी कांग्रेस सरकार ने इसे रद्द कर दिया और उसकी जगह एक नया कम शक्तिशाली लोकायुक्त अधिनियम बनाया।

हालांकि, उनके बाद मुख्यमंत्री बने हरीश रावत ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। हालांकि, 2017 के चुनाव में लोकायुक्त को बड़ा मुद्दा बनाने वाली भाजपा के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यह कहते हुए सबको अचरज में डाल दिया कि उनकी सरकार की नीति भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की है और ऐसे में लोकायुक्त की कोई जरूरत ही नहीं है।

कांग्रेस ने त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के इस रूख का जबरदस्त विरोध किया था। लेकिन, इस चुनाव में इस मुद्दे को लेकर अब तक खामोश रही है और उनके नेता भाजपा के खिलाफ अपना प्रचार पांच साल में तीन मुख्यमंत्री देने पर ही फोकस कर रहे हैं।

पिछले पांच साल में भ्रष्टाचार की छिटपुट घटनाओं को छोड़कर कोई बड़ा मुद्दा भाजपा सरकार में नहीं आया है। कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर झारखंड में पार्टी प्रभारी रहते हुए कथित भ्रष्टाचार करने तथा उनके कार्यालय में हुए स्टिंग ऑपरेशन का मुद्दा उठाया लेकिन बाद में समय के साथ इन मुद्दों ने दम तोड़ दिया।

यह पहला चुनाव होने जा रहा है जिसमें अभी तक दोनों पार्टियां भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक दूसरे पर बड़ा प्रहार करने से बच रही हैं। प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हरीश रावत ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर आरोप लगाया कि वह खनन क्षेत्र में भ्रष्टाचार को बढावा दे रहे हैं।

दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री ने रावत पर पलटवार करते हुए कहा कि एक स्टिंग ऑपरेशन में अपने मंत्रियों को प्रदेश को लूटने का लाइसेंस देने वाले वाले नेता को यह आरोप लगाने का नैतिक अधिकार नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने भी माना कि इस बार चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा नीचे की तरफ चला गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘2022 के विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा नहीं है। चुनावी मुद्दों की सूची में यह एक बहुत छोटा मुद्दा बन कर रह गया है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसका एक कारण यह भी है कि हमाम में सभी नंगे हैं। दूसरे लोगों को भी यह लगने लगा ​है कि भ्रष्टाचार अब सरकार का एक अभिन्न अंग है। इसके अलावा, ज्यादा बड़े मुद्दों को देखते हुए भ्रष्टाचार हाशिए पर चला गया है।’’ हालांकि, कांग्रेस ने कहा कि भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है और आगामी दिनों में चुनाव प्रचार के जोर पकड़ने के साथ भाजपा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा पूरे जोर-शोर से उठाया जाएगा।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता मथुरादत्त जोशी ने कहा, ‘‘पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके कार्यालय में हुआ स्टिंग ऑपरेशन, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जनसंपर्क अधिकारी की वायरल हुई चिट्ठी जैसे मुद्दे हम जनता के सामने जोर—शोर से उठाएंगे।’’

उधर, प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष डॉक्टर देवेंद्र भसीन ने कहा कि उनकी पार्टी भी चुनाव में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठा रही है। लेकिन उन्होंने माना कि उनका मुख्य चुनावी मुद्दा विकास है और वह जनता से इसी मुद्दे पर दोबारा आशीर्वाद मांग रहे हैं।

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