कांगडा मंदिर ..जहां का प्रसाद श्रद्धालु खा नहीं सकते,लेकिन शरीर पर लगाते ही चर्म रोग व जोड़ों के दर्द दूर हो जाते हैं

कांगडा मंदिर ..जहां का प्रसाद श्रद्धालु खा नहीं सकते,लेकिन  शरीर पर लगाते ही चर्म रोग व जोड़ों के दर्द दूर हो जाते हैं

हर साल मकर संक्रांति पर यहां मक्खन की मूर्ति स्थापित की जाती है, जिसे मंदिर में सप्ताह भर चलने वाले त्योहार के रूप में मनाया जाता है। सुबह मंदिर के पुजारियों की ओर से 101 बार पवित्र जल से शुद्धिकरण करने के बाद ब्रजेश्वरी देवी की मूर्ति पर देसी घी व मक्खन से तैयार किया गया है। इसे दर्शन के लिए खोल दिया गया है

शिमला  । हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के कांगड़ा नगर जिसे पुरातन काल में नगरकोट धाम के नाम से भी जाना जाता रहा है,के ब्रजेशवरी देवी मंदिर में मकर स्रक्रांति के अवसर पर घृत मंडल पर्व की शुरूआत हो गई।  जिसमें मंदिर के पुजारियों की ओर से मक्खन व देसी घी का लेप मंदिर में स्थापित पिंडी में  लगाया गया है। बीस जनवरी तक यहां इस दौरान विशेष पूजा अर्चना होती रहेगी।  उसके बाद इस लेप को प्रसाद  के रूप में श्रद्धालुओं में बांटा जायेगा।

यूं तो कांगड़ा में इस अवसर पर बड़ी तादाद में पवित्र पिंडी के दर्शनों को पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के श्रद्धालु आते रहे हैं। लेकिन इस बार कोरोना बंदिशों के चलते मंदिर में भीड कम है। लेकिन कर्मकांड व पूजा पूर्ववत जारी है। 

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हर साल मकर संक्रांति पर यहां मक्खन की मूर्ति स्थापित की जाती है, जिसे मंदिर में सप्ताह भर चलने वाले त्योहार के रूप में मनाया जाता है। सुबह मंदिर के पुजारियों की ओर से 101 बार पवित्र जल से शुद्धिकरण करने के बाद ब्रजेश्वरी देवी की मूर्ति पर देसी घी व मक्खन से तैयार किया गया है। इसे दर्शन के लिए खोल दिया गया है।  व पिंडी से इस लेप को 20 जनवरी को हटा दिया जाएगा और श्रद्धालुओं के बीच इसका प्रसाद बांटा जाएगा। आधुनिक युग में दुनिया भर में शायद यह पहला देवालय होगा, जहां  माघ माह के दौरान चढऩे वाले प्रसाद  को श्रद्धालु खा नहीं सकते,लेकिन इसी प्रसाद को अपने शरीर पर लगाते हैं, तो उनके चर्म रोग व जोड़ों के दर्द दूर हो जाते हैं।

 

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यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और बज्रेश्वरी मंदिर के इतिहास के मुताबिक जालंधर दैत्य को मारते समय माता के शरीर पर कई चोटें लगी थीं। इन्हीं घावों को भरने के लिए देवताओं ने माता के शरीर पर घृत (मक्खन)का लेप किया था। इसी परंपरा के अनुसार 101 किलो देसी घी को 101 बार शीतल जल से धोकर इसका मक्खन तैयार कर, इसे माता की पिंडी पर चढ़ाया जाता था।

मकर संक्रांति पर घृतमंडल पर्व को लेकर यह श्रद्धालुओं की ही आस्था है कि हर बार माता की पिंडी पर घृत की ऊंचाई बढ़ती जा रही है। मंदिर में घृत पर्व में माता की पिंडी पर मक्खन  और देसी घी चढ़ाया जाता है। मां की पिंडी को फल मेवों, फूलों और फलों से सजाया जाता है। यह पर्व सात दिन चलता है। सातवें दिन माता की पिंडी से घृत उतारने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद घृत प्रसाद के तौर पर श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।

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बज्रेश्वरी मंदिर के वरिष्ठ पुजारी  राम प्रसाद बताते हैं कि मंदिर में यह प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। घृत पर्व का प्रसाद चर्म और जोड़ों के दर्द में सहायक होता है। मंदिर में घृत प्रसाद के तौर पर श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। मंदिर के इतिहास पर छपी किताब में भी इस परंपरा का जिक्र है। घृत मंडल पर्व पर माता की पिंडी पर मक्खन चढ़ाने की प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो जाती है। स्थानीय और बाहरी लोगों द्वारा मंदिर में दान स्वरूप देशी घी पहुंचाया जाता है। मंदिर प्रशासन इस घी को 101 बार ठंडे पानी से धोकर मक्खन बनाने के लिए मंदिर के पुजारियों की एक कमेटी का गठन करता है। पुजारियों की यही कमेटी मक्खन की पिन्नियां बनाती है और मकर संक्राति को माता की पिंडी पर मक्खन चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।





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