Karnataka High Court का ऐतिहासिक फैसला, गंभीर Disability वाली युवती की Hysterectomy को दी मंजूरी

अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि अपने 'पैरेंट्स पैट्रिया' (अभिभावक के तौर पर अधिकार) अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, इस कोर्ट के लिए सबसे ज़रूरी बात संबंधित व्यक्ति का हित है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने गंभीर विकासात्मक और बौद्धिक अक्षमता वाली 23 साल की महिला को 'टोटल एब्डोमिनल हिस्टेरेक्टॉमी' (पेट के ज़रिए गर्भाशय निकालने का ऑपरेशन) कराने की मंज़ूरी दे दी है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया महिला की भलाई, सेहत, सम्मान और उसके सर्वोत्तम हितों की रक्षा के लिए है। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने 17 जून को यह आदेश महिला के माता-पिता की याचिका पर दिया; वे ही महिला की मुख्य देखभाल करने वाले भी हैं। कोर्ट ने बेंगलुरु के वाणीविलास अस्पताल में सर्जरी की मंज़ूरी देने से पहले मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, महिला का खुद से मासिक धर्म के दौरान साफ़-सफ़ाई न रख पाना, माता-पिता द्वारा बताई गई बार-बार होने वाली मेडिकल परेशानियां और सर्जरी न करने की कोई मेडिकल वजह न होने जैसी बातों पर विचार किया। टोटल एब्डॉमिनल हिस्टरेक्टॉमी एक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें पेट पर चीरा लगाकर गर्भाशय और सर्विक्स को पूरी तरह से निकाल दिया जाता है।
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अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि अपने 'पैरेंट्स पैट्रिया' (अभिभावक के तौर पर अधिकार) अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, इस कोर्ट के लिए सबसे ज़रूरी बात संबंधित व्यक्ति का हित है। कोर्ट ने आगे कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, मरीज़ की बौद्धिक और विकासात्मक अक्षमताओं की प्रकृति और गंभीरता, माहवारी के दौरान साफ़-सफ़ाई का खुद ध्यान न रख पाना, याचिकाकर्ताओं द्वारा बताई गई बार-बार होने वाली मेडिकल दिक्कतें, किसी मेडिकल रुकावट का न होना और मेडिकल बोर्ड की सर्वसम्मत सिफारिश को ध्यान में रखते हुए, यह कोर्ट इस बात से संतुष्ट है कि प्रस्तावित प्रक्रिया का मकसद (X) के कल्याण, स्वास्थ्य, सम्मान और सर्वोत्तम हितों को आगे बढ़ाना है।
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कोर्ट ने आगे कहा कि इसलिए, इस कोर्ट की यह सोच-समझकर बनाई गई राय है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई अनुमति दी जानी चाहिए। इस आदेश से माता-पिता को अपनी बेटी का इलाज वनीविलास अस्पताल में करवाने की अनुमति मिल गई। साथ ही, मेडिकल सुपरिटेंडेंट को निर्देश दिया गया कि वे मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों और सभी लागू मेडिकल, कानूनी और नैतिक नियमों के अनुसार ज़रूरी इंतज़ाम करें। जज ने कहा कि मेडिकल सुपरिटेंडेंट को यह पक्का करना होगा कि इलाज के हर चरण में मरीज़ की भलाई, सम्मान, सुरक्षा और हितों का ध्यान रखा जाए। आदेश में यह भी कहा गया कि मरीज़ को सर्जरी से पहले और बाद में काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता, देखभाल और रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) सेवाएँ दी जानी चाहिए, जिन्हें इलाज करने वाली टीम—जिसमें साइकियाट्रिस्ट और अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं—ज़रूरी समझे। अदालत ने कहा कि सर्जरी की तारीख और समय मेडिकल सुपरिटेंडेंट तय करेंगे। वे ऐसा माता-पिता और इलाज करने वाले विशेषज्ञों से सलाह करके और मरीज़ की मेडिकल स्थिति व सुविधा को ध्यान में रखकर करेंगे।
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