ज्ञानवापी मस्जिद-श्रृंगार गौरी मामले में शिवलिंग की कार्बन डेटिंग किए जाने का इंतजार, जानें क्या है ये प्रक्रिया

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रितिका कमठान । Oct 07, 2022 3:46PM
ज्ञानवापी मस्जिद और श्रृंगार गौरी मामले में अब कार्बन डेटिंग किए जाने को लेकर अदालत ने फैसला टाल दिया है। कार्बन डेटिंग एक खास विधि है जिसमें वर्षों पुरानी चीजों की उम्र का पता लगाया जाता है। रेडियो कार्बन डेटिंग तकनीक का आविष्कार शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियर्ड लिबी ने वर्ष 1949 में किया था।

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर मामले में शिवलिंग की उम्र का पता लगाने के लिए कार्बन डेटिंग कराई जाएगी। वाराणसी कोर्ट इस मामले पर 11 अक्टूबर को फैसला सुनाएगा। हालांकि इस मामले में सबसे अधिक सवाल उठ रहे हैं कार्बन डेटिंग को लेकर। इसे लेकर कोर्ट में याचिका लगाई गई है, जिसपर अदालत ने आज सुनाया जाने वाला फैसला टाल दिया है।

जानें क्या है कार्बन डेटिंग

कार्बन डेटिंग उस विधि को कहा जाता है, जिसकी मदद से संबंधित वस्तु की उम्र की जानकारी हासिल की जा सकती है। कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया आमतौर पर पुरानी चीजों की उम्र का पता लगाने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया के जरिए लकड़ी, चारकोल, बीज, बीजाणु, पराग, हड्डी, चमड़े, बाल, फर, सींग, रक्त अवशेष, पत्थर, मिट्टी आदि की अनुमानित आयु की जानकारी हासिल कर सकते है। कार्बन डेटिंग के जरिए कार्बनिक अवशेषों जैसे कोरल, शैल, बर्तन, दीवारों पर की गई चित्रकारी आदि की उम्र के बारे में जानकारी मिलती है।

जानें कार्बन डेटिंग की विधि

कार्बन डेटिंग की विधि कुल कार्बन 14 की आवश्यकता होती है। इसमें कार्बन 12 और 14 के बीच का अनुपात निकाला जाता है। बता दें कि जब किसी जीव की मृत्यु होती है, तो इसका कार्बन में आदान प्रदान बंद हो जाता है। पौधे और जानवरों के मरने पर कार्बन 12 से कार्बन 14 के अनुपात में बदलाव होने लगता है। वैज्ञानिक जब इस बदलाव को मापते हैं तो उसी से जीव की संभावित उम्र का पता चलता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक कार्बन 12 स्थिर होता है। इसकी मात्रा में कमी नहीं होती है। कार्बन 14 रेडियोएक्टिव होता है, जिसमें कार्बन की मात्रा में गिरावट होती है। बता दें कि कार्बन 14 को अपनी मात्रा का आधा होने में लगभग 5,730 वर्षों का समय लगता है। कार्बन डेटिंग के जरिए जानकारी हासिल करने के लिए अप्रत्यक्ष विधियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

वर्ष 1949 में हुई थी खोज

जानकारी के मुताबिक कार्बन डेटिंग जिसे रेडियो कार्बन डेटिंग कहा जाता है, की खोज वर्ष 1949 में हुई थी। शिकागो यूनिवर्सिटी के विलियर्ड लिबी को इस खोज के लिए नोबल पुरस्कार से नवाजा गया था। हालांकि इस प्रक्रिया का उपयोग आज भी काफी किया जाता है मगर इसकी सटीकता को लेकर लगातार सवाल खड़े होते रहे है। 

जानें ज्ञानवापी को लेकर हंगामा क्यों

दरअसल कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग को लेकर हिंदू पक्ष की चार महिलाओं ने याचिका दायर की थी। वहीं कार्बन डेटिंग कराने का विरोध करने वालों का कहना है कि कार्बन डेटिंग करने से शिवलिंग को क्षति पहुंचेगी। कार्बन डेटिंग इस मामले का मूल पहलू नहीं है। 

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