Fake Legal Precedents | आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी चूक! सुप्रीम कोर्ट ने पकड़े 6 मनगढ़ंत फैसले, NCLT और NCLAT के आदेश निरस्त

न्यायिक प्रणाली और कानूनी तकनीक के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा बनाए गए फर्जी और काल्पनिक कानूनी उदाहरणों (Fake Precedents) के आधार पर दिए गए ट्रिब्यूनल के आदेशों को पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
न्यायिक प्रणाली और कानूनी तकनीक के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा बनाए गए फर्जी और काल्पनिक कानूनी उदाहरणों (Fake Precedents) के आधार पर दिए गए ट्रिब्यूनल के आदेशों को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। शीर्ष अदालत ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के फैसलों को खारिज करते हुए कानूनी व्यवस्था में 'AI हैलुसिनेशन' (Artificial Intelligence Hallucination) से होने वाले गंभीर खतरों पर कड़ी चेतावनी दी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को एक विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) गठित करने का ऐतिहासिक निर्देश दिया है। यह समिति न्यायिक कार्यवाही और वकालत में एआई के बढ़ते इस्तेमाल से पैदा होने वाली चुनौतियों और इसके सुरक्षित दायरे की जांच करेगी।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड द्वारा इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 7 के तहत एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड (EIL) के खिलाफ शुरू की गई दिवालियापन की कार्यवाही से जुड़ा था। EIL ने पैन इंडिया यूटिलिटीज डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड को दी गई क्रेडिट सुविधाओं के लिए कॉर्पोरेट गारंटी दी थी। NCLT मुंबई ने 28 अगस्त 2024 को 87.43 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट का संज्ञान लेते हुए दिवालियापन की याचिका को स्वीकार किया था, जिसे बाद में 11 सितंबर 2025 को NCLAT ने भी बरकरार रखा।
इसे भी पढ़ें: Gulf of Aden में Indian Navy का एक्शन, INS Trikand ने समुद्री लुटेरों के हमले को किया नाकाम
वकीलों ने पकड़ी AI की 'मनगढ़ंत' थ्योरी
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, सस्पेंड की गई डायरेक्टर पूजा रमेश सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले का आधार बनाने के लिए छह ऐसे न्यायिक फैसलों का सहारा लिया था जो वास्तव में दुनिया में कहीं मौजूद ही नहीं हैं।
आदेशों में जिन कथित मिसालों (Precedents) का जिक्र किया गया था, उनमें शामिल थे:
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम श्री राम अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर (2020)
एवरेस्ट केंटो सिलेंडर्स बनाम भारत संघ (2015)
ICICI बैंक बनाम अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर रियल एस्टेट (2019)
जब इन मामलों की गहन पड़ताल की गई और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा जमा किया गया, तो पुष्टि हुई कि ये मामले किसी भी प्रामाणिक कानूनी डेटाबेस (जैसे SCC Online या LiveLaw) में मौजूद नहीं थे। ये पूरी तरह से एआई टूल्स द्वारा तैयार किए गए भ्रामक, काल्पनिक और 'हैलुसिनेटेड' (Hallucinated) मामले थे, जिन्हें ट्रिब्यूनल ने अनजाने में असली मानकर अपने फैसले का हिस्सा बना लिया था।
इसे भी पढ़ें: Congress से फिर नाराज हुए Manish Tewari ! इस बार साफ साफ पूछा- प्रतिभा और क्षमता होना क्या सबसे बड़ा दोष है?
"कानून के क्षेत्र में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस जैसा है एआई हैलुसिनेशन"
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने लाइव लॉ (livelaw.in) के अनुसार न्याय प्रणाली में एआई के इस अनियंत्रित उपयोग की तुलना एक भीषण त्रासदी से करते हुए बेहद तीखी टिप्पणी की:
"हमारे लिए, यानी उन लोगों के लिए जो विवादों के निपटारे और फैसले लेने के पवित्र काम में लगे हैं, AI का यह नतीजा— यानी नकली, गैर-मौजूद और काल्पनिक सामग्री बनाना और कानून में मिसाल के तौर पर उसका इस्तेमाल करना— कानून और न्याय के क्षेत्र में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस (Bhopal Gas Tragedy) के रिसाव जैसा है। यह अदृश्य रूप से खतरनाक है और जब तक किसी को इसका पता चलता है, तब तक यह पूरी व्यवस्था के लिए विनाशकारी हो चुका होता है।"
पीठ ने साफ किया कि एआई सिस्टम में प्रॉम्प्ट का जवाब देते समय ऐसी नकली और मनगढ़ंत जानकारी उत्पन्न करने की एक अंतर्निहित प्रवृत्ति होती है। अदालत ने कहा, "हमें ऐसे हैलुसिनेशन के वैज्ञानिक कारणों या उन्हें ठीक करने की तकनीकी प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं है। इनसे निपटना इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का काम है। लेकिन कानूनी व्यवस्था एआई द्वारा बनाई गई मनगढ़ंत सामग्री को न्यायिक सोच को प्रभावित करने की इजाजत कतई नहीं दे सकती।"
तकनीकी प्रगति को अपनाएंगे, लेकिन नियंत्रण इंसानों का रहेगा
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक गलत फैसले को सुधारने का नहीं था, बल्कि भविष्य के लिए न्यायपालिका का दृष्टिकोण तय करने का एक बड़ा अवसर था। बेंच ने जोर देकर कहा कि भले ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जजों और वकीलों की शोध (Research) में मदद कर सकता है, लेकिन यह कभी भी इंसानी विवेक, चेतना और सोच-समझ की जगह नहीं ले सकता। अदालत के शब्दों में, "न्यायिक कार्यवाही हर चरण में इंसानों के पूरी तरह और पूर्ण नियंत्रण में होनी चाहिए।"
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश:
शीर्ष अदालत ने प्रक्रिया और न्याय की निष्पक्षता व विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए NCLT और NCLAT दोनों के फैसलों को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अब इस मामले को बिना किसी एआई-जनरेटेड फर्जी उदाहरणों का सहारा लिए, केवल वास्तविक कानूनी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस NCLT को भेज दिया गया है।
अन्य न्यूज़















