Shaheen Bagh में 16 वर्षीय घरेलू सहायिका मुक्त, गर्म इस्त्री से दागने और प्रताड़ना का आरोप

दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के अबुल फजल एन्क्लेव में पुलिस और एनजीओ ने संयुक्त अभियान चलाकर एक नाबालिग घरेलू सहायिका को छुड़ाया। पीड़िता पर गर्म इस्त्री और चाकू से हमला करने तथा 20 घंटे तक काम कराने का आरोप है। बाल कल्याण समिति के निर्देश पर पीड़िता को उपचार के लिए एम्स में भर्ती कराया गया है।
नयी दिल्ली, सात नवंबर दिल्ली के दक्षिण-पूर्वी इलाके शाहीन बाग में एक घर से 16 वर्षीय नाबालिग को मुक्त कराया गया। पुलिस ने शनिवार को यह जानकारी दी। पुलिस ने बताया कि नाबालिग से कथित तौर पर रोजाना 20 घंटे काम कराया जाता था, उसे गर्म इस्त्री व चाकू से बार-बार दागा जाता था और कई दिनों तक भोजन नहीं दिया जाता था।
पुलिस के मुताबिक, लड़की अबुल फजल एन्क्लेव-दो स्थित एक घर में घरेलू सहायिका के तौर पर काम कर रही थी और उसे करीब एक साल से उसके माता-पिता से दूर रखा गया था। पुलिस ने कहा कि यह मामला तब उजागर हुआ जब बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले एनजीओ एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन ने शिकायत दी। कालकाजी के उपजिलाधिकारी (एसडीएम) के निर्देश पर तीन और चार नवंबर को श्रम विभाग, दिल्ली पुलिस और गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से बचाव अभियान चलाया।
पुलिस ने बताया कि अभियान के दौरान शाहीन बाग की श्रम विहार झुग्गी की रहने वाली लड़की को अबुल फजल एन्क्लेव-दो स्थित एक घर से मुक्त कराया गया और वहां सदफ नाम की एक महिला उससे कथित तौर पर घरेलू काम कराती थी। नाबालिग ने अपने बयान में बताया कि उससे सुबह छह बजे से रात दो बजे तक काम कराया जाता था और इस दौरान उसे झाड़ू-पोछा लगाने, बर्तन धोने और घर की सफाई जैसे काम करने पड़ते थे। उसने बताया कि उसे पूर्वाह्न करीब 11 बजे चाय दी जाती थी और अक्सर बचा हुआ खाना परोसा जाता था।
नाबालिग ने आरोप लगाया कि जिस घर में वह काम करती थी, उसमें रहने वाली महिला उसे बार-बार गर्म इस्त्री से पीठ, हाथों और कूल्हों पर दागती थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि गर्म किए गए चाकू से भी उसे चोट पहुंचाई गई। गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के अनुसार, लड़की के शरीर पर कई चोटें और पुराने जख्मों के निशान मिले हैं, इनमें उसकी पीठ पर जलने के निशान व सिर पर गहरे घाव शामिल हैं।
नाबालिग ने अधिकारियों को बताया कि एक बार उसे लगातार तीन दिनों तक खाना और पानी नहीं दिया गया था। उसने बताया कि छोटी-छोटी गलतियों पर उसकी पिटाई भी की जाती थी और उसे चिकित्सक के पास ले जाने के बजाय मेडिकल स्टोर से खरीदी गई दवाएं दी जाती थीं। पुलिस के अनुसार, नाबालिग को उसके माता-पिता से मिलने से भी कथित तौर पर रोका जाता था।
पुलिस ने बताया कि करीब एक साल के दौरान उसे माता-पिता से फोन पर केवल दो-तीन बार बात करने की अनुमति दी गई। एनजीओ ने आरोप लगाया कि इन फोन कॉल के दौरान नाबालिग का चेहरा ढक दिया जाता था, ताकि उसके माता-पिता शरीर पर चोटों के निशान न देख सकें। नाबालिग शुरू में अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने से काफी डरी हुई थी, क्योंकि उसे कथित तौर पर दुर्व्यवहार के बारे में बताने पर जान से मारने की धमकी दी गई थी।
बाद में उसने बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष आपबीती सुनाई। उसका बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया गया और उसे समिति के सामने पेश किया गया। समिति ने उसे चिकित्सा उपचार के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराने का निर्देश दिया।
एसडीएम ने शाहीन बाग थाने को बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 और किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया। इस मामले में अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। एनजीओ ने बताया कि नाबालिग को एक अन्य महिला ने इस घर में काम पर लगवाया था और करीब एक साल तक काम कराने के बदले उसे केवल 18,000 रुपये दिए गए थे।
समिति ने बाल कल्याण समिति को बताया कि वह दोबारा पढ़ाई शुरू करना चाहती है और शिक्षिका बनना चाहती है।
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