प्रभाकरण, तमिल पहचान और TVK: CM विजय का नया 'Dravidian Project' क्या है?

सितंबर 2025 में नागपट्टिनम जिले में एक संबोधन के दौरान, विजय ने एक बार फिर इस मुद्दे पर भावनात्मक प्रहार किया। उन्होंने प्रभाकरन का स्पष्ट रूप से जिक्र करते हुए कहा हमारे संबंधी रिश्तेदार, ईलम तमिल, चाहे वे श्रीलंका में हों या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में एक ऐसे नेता को खोने के बाद भी पीड़ा झेल रहे हैं जिन्होंने उन्हें मातृत्व स्नेह दिया था। उनके लिए आवाज उठाना हमारा कर्तव्य है।
साल 2008 की बात है, जब तमिल उग्रवादियों के खिलाफ श्रीलंकाई सेना का सैन्य अभियान अपने चरम पर था। उस दौर में, श्रीलंकाई तमिलों के दर्द और उनके संघर्ष के प्रति अपनी एकजुटता जताने के लिए अभिनेता विजय चेन्नई में भूख हड़ताल पर बैठे थे। भावुक अपील करते हुए उन्होंने कहा था, ईलम तमिलों की जिंदगी में आजादी का नया सवेरा होने दें। इसके साथ ही उन्होंने हर उस शख्स को इस मुहिम से जुड़ने की पुकार लगाई थी, जिसकी रगों में तमिल अस्मिता और पहचान का लहू बह रहा है। इस आंदोलन के मंच से अभिनेता ने तमिलों के शौर्य और पराक्रम को भी स्वर दिया। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा हम बाघ के बच्चे हैं। अपनी बात को वजन देने के लिए उन्होंने प्राचीन तमिल साहित्य के गौरवग्रंथ 'पुरनानूरु' (400 कविताओं का महासंग्रह) की उन पंक्तियों का जिक्र किया, जो एक ऐसी वीर तमिल परंपरा की बात करती हैं, जिसका पालन-पोषण उस माँ के आंचल में हुआ है जिसने महज़ एक लाठी के दम पर खूंखार बाघ को मार गिराया था। लगभग दो दशक बाद, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरन को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की। विजय के राजनीतिक संदेशों में प्रभाकरन, एलटीटीई और व्यापक तमिल आंदोलन का जिक्र अक्सर देखने को मिलता है। एलटीटीई प्रमुख के चित्र तमिलगा वेत्री कज़गम (टीवीके) के कार्यक्रमों में दिखाई देते रहे हैं, वहीं विजय ने अपने भाषणों और रैलियों में बार-बार श्रीलंकाई तमिलों के अधिकारों की बात की है और तमिल पहचान पर जोर दिया है। सितंबर 2025 में नागपट्टिनम जिले में एक संबोधन के दौरान, विजय ने एक बार फिर इस मुद्दे पर भावनात्मक प्रहार किया। उन्होंने प्रभाकरन का स्पष्ट रूप से जिक्र करते हुए कहा हमारे संबंधी रिश्तेदार, ईलम तमिल, चाहे वे श्रीलंका में हों या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में एक ऐसे नेता को खोने के बाद भी पीड़ा झेल रहे हैं जिन्होंने उन्हें मातृत्व स्नेह दिया था। उनके लिए आवाज उठाना हमारा कर्तव्य है।
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प्रभाकरण को लेकर विजय ने क्या कहा?
एक्स पर एक पोस्ट में विजय ने कहा कि हम मुल्लीवाइकल की यादों को अपने दिलों में संजोकर रखेंगे! हम समुद्र पार रहने वाले अपने तमिल भाइयों के अधिकारों के लिए हमेशा एकजुटता से खड़े रहेंगे! 18 मई को वैश्विक स्तर पर रहने वाली श्रीलंकाई तमिल आबादी और भारत में रहने वाले तमिलों के कुछ वर्गों द्वारा मुल्लीवाइकल स्मरण दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसका नाम उस स्थान के नाम पर रखा गया है। बता दें कि मुल्लीवाइक्कल में ही 2009 में इसी दिन श्रीलंकाई सेना ने प्रभाकरण को गोली मार दी थी।
बीजेपी ने साधा निशाना
बीजेपी नेता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा ने एक्स पर एनडीटीवी की एक रिपोर्ट को पोस्ट करते हुए लिखा कि कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार प्रभाकरन को श्रद्धांजलि अर्पित की। अगर राहुल गांधी अपने पिता के हत्यारे का महिमामंडन करने वाले व्यक्ति के साथ सत्ता के लिए हाथ मिला सकते हैं, तो सोचिए सत्ता में आने पर उन्हें क्या-क्या समझौते करने पड़ेंगे।
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लिट्टे पर राजीव गांधी की हत्या का आरोप
लिट्टे पर आरोप है कि उसने 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की थी। इसी वजह से भारत में लिट्टे पर पाबंदी लगी हुई है। इस मामले में प्रभाकरन को मुख्य आरोपी बनाया गया था। दुनिया भर में फैले श्रीलंकाई तमिल समुदाय और भारत में रहने वाले तमिलों का एक वर्ग 18 मई को 'मुल्लीवाइक्कल स्मरण दिवस' या 'तमिल नरसंहार स्मरण दिवस' के रूप में मनाता है।
द्रविड़वाद और तमिल राष्ट्रवाद का अनूठा संगम
विजय की इस ऐतिहासिक जीत ने छह दशकों से चले आ रहे द्रमुक (डीएमके) और अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के वर्चस्व को उखाड़ फेंका। यह केवल किसी फिल्मी हस्ती की राजनीतिक सफलता भर नहीं है, बल्कि तमिलनाडु की सियासत में एक बड़े वैचारिक बदलाव का शंखनाद है। विजय के इस राजनीतिक सफर के केंद्र में एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक संतुलन है: द्रविड़वाद और तमिल राष्ट्रवाद का अनूठा संगम। प्रतीकात्मक कदमों, वैचारिक संदर्भों और भावनात्मक राजनीतिक संदेशों के ज़रिए विजय ने एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश की है, जिसे विश्लेषक अब "नव-द्रविड़वाद" कह रहे हैं। यह एक ऐसा मॉडल है जो पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के जनकल्याण और सामाजिक न्याय के आधार को तो सुरक्षित रखता ही है, साथ ही तमिल अस्मिता और सभ्यता के गौरव को इसकी भावनात्मक आत्मा बना देता है। वैचारिक बदलाव की यह नई बयार उस समय और साफ दिखाई दी, जब रविवार को मुल्लिवैक्कल स्मरणोत्सव के दौरान विजय ने प्रभाकरण को श्रद्धांजलि दी और श्रीलंकाई तमिलों के दर्द को अपनी आवाज़ दी। यह मंच पर टीवीके (टीवीके) के अध्यक्ष विजय नहीं, बल्कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में खुद विजय खड़े थे। तमिलनाडु की राजनीति में प्रभाकरण का कोई भी ज़िक्र हमेशा से एक राजनीतिक बारूद की तरह रहा है, क्योंकि एलटीटीई (लिट्टे) का इतिहास हिंसक रहा है और इस संगठन पर भारत सरकार का रुख बेहद सख्त है। राजीव गांधी की हत्या के बाद भारत ने मई 1992 में एलटीटीई पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे मई 2024 में और पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया था। इसके बावजूद, विजय द्वारा प्रभाकरण का स्मरण किया जाना अलगाववादी उग्रवाद के समर्थन के रूप में नहीं देखा गया; बल्कि इसे तमिलों की पीड़ा, उनके स्वाभिमान और दुनिया भर के तमिलों के बीच एकजुटता की एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पेश किया गया है।
विजय बदलना चाहते हैं तमिलनाडु की राजनीति?
प्रभाकरन का हवाला देते हुए और साथ ही खुद को व्यापक द्रविड़ परंपरा के भीतर रखते हुए, विजय ने संकेत दिया कि वे तमिल राष्ट्रवाद और द्रविड़वाद को परस्पर विरोधी विचारधाराओं के रूप में नहीं देखते हैं। अपने सबसे चर्चित राजनीतिक बयानों में से एक में, उन्होंने घोषणा की कि द्रविड़वाद और तमिल राष्ट्रवाद इस धरती की दो आंखें हैं। इस कथन का राजनीतिक महत्व बहुत अधिक था क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक रूप से इन दोनों वैचारिक धाराओं के बीच तनाव रहा है। द्रविड़ राजनीति ऐतिहासिक रूप से सामाजिक न्याय, तर्कवाद, जाति-विरोधी राजनीति और हिंदी के थोपे जाने के प्रतिरोध पर केंद्रित रही है। यह एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के रूप में उभरा जिसने ब्राह्मणवादी वर्चस्व और जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया और ब्राह्मण-विरोधी भावना को सामाजिक असमानता की केंद्रीय आलोचना के रूप में स्थापित किया। वहीं, तमिल राष्ट्रवाद ने अधिक संकीर्ण रूप से लेकिन दृढ़ता से तमिल पहचान, सभ्यता और वैश्विक तमिल एकजुटता पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि अपनी मजबूत भावनात्मक और सांस्कृतिक जड़ों को भी बरकरार रखा। द्रविड़वाद ने ऐतिहासिक रूप से तर्कवाद को अपनाया और पेरियारवादी प्रभाव के तहत आक्रामक नास्तिकता को भी। वहीं, तमिल राष्ट्रवाद मुरुगन पूजा, शैव धर्म और लोक देवताओं सहित तमिल आध्यात्मिक परंपराओं के साथ गहराई से जुड़ा रहा, जिन्हें स्वदेशी तमिल संस्कृति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
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