प्रशांत भूषण ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता सवालों के घेरे में आ गई है

Prashant Bhushan
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भूषण ने आरोप लगाया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है और सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों को राजद्रोह तथा अन्य गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ता है तथा उन्हें वर्षों तक जमानत नहीं मिल पाती।

सामाजिक कार्यकर्ता एवं वकील प्रशांत भूषण ने रविवार को कहा कि भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की निष्पक्षता पिछले कुछ वर्षों में सवालों के घेरे में आ गयी है। उन्होंने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि वह सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेताओं द्वारा चुनाव संहिता के उल्लंघन पर चुप्पी साधे रहता है जबकि ऐसे मामलों में विपक्षी दलों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई करता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार की सुविधा को ध्यान में रखते हुए चुनावों का कार्यक्रम बनाया जाता है।

भूषण ने आरोप लगाया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है और सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों को राजद्रोह तथा अन्य गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ता है तथा उन्हें वर्षों तक जमानत नहीं मिल पाती। वह मराठी के एक दैनिक अखबार ‘देशोन्नति’’ द्वारा यहां आयोजित एक कार्यक्रम में ‘लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियों’ के विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘टी एन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद कई वर्षों तक हमने देखा कि चुनाव आयोग बहुत निष्पक्ष और पारदर्शी था। लेकिन पिछले छह से सात वर्ष में उसकी निष्पक्षता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।’’

भूषण ने यह भी आरोप लगाया कि सभी नियामक संस्थानों में स्वतंत्रता का अभाव है और उन्होंने इसे सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बताया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का गठन लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने तथा विधायिका एवं कार्यपालिका को उनकी सीमाओं के भीतर रखने के लिए किया गया था। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन अब हम देख रहे हैं कि यह नहीं हो रहा है। सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोग राजद्रोह और कई बार तो गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून के तहत झूठे मामलों का सामना कर रहे हैं। उन्हें वर्षों तक जमानत नहीं मिल पाती तथा खुलेआम यह किया जा रहा है। हमारी न्यायपालिका इसके खिलाफ काम नहीं कर पा रही है इसलिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी खतरे में है।’’

भूषण ने आरोप लगाया, ‘‘सरकार मीडिया को भी नियंत्रित कर रही है। पुलिस एजेंसियों का इस्तेमाल भी राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) तथा आयकर विभाग जैसी कुछ एजेंसियों का चुनाव पूरी तरह सरकार के हाथ में है, जिसने लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया है।’’ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर उन्होंने कहा कि फिलहाल ईवीएम में कोई बड़ी छेड़छाड़ नहीं की गयी है लेकिन आने वाले वक्त में इसे खारिज नहीं किया जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा चुनावी बॉन्ड के मुद्दे पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई न करने के बारे में इस कार्यक्रम के इतर पूछे एक सवाल के जवाब में उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि सरकार की इस मुद्दे में कोई दिलचस्पी नहीं है और संभवत: वे इसे रोक रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘बहरहाल, भारत के नए प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में इस मामले पर सुनवाई होगी।

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