Delimitation पर Chandrababu Naidu को Shashi Tharoor का जवाब, ड्राइवर की सैलरी से समझाया गणित

थरूर की यह प्रतिक्रिया नायडू के उस बयान के बाद आई है, जिसमें नायडू ने संसद में संविधान संशोधन विधेयक को रोकने के लिए विपक्ष की आलोचना की थी और कहा था कि परिसीमन को लेकर जताई जा रही चिंताएं बेबुनियाद हैं।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बुधवार को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन ढांचे के बचाव पर एक 'विचार-प्रयोग' (thought experiment) के ज़रिए अपनी असहमति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि अगर सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में एक समान बढ़ोतरी की जाती है, तब भी राजनीतिक प्रभाव बड़े राज्यों की ओर ही झुका रहेगा। थरूर की यह प्रतिक्रिया नायडू के उस बयान के बाद आई है, जिसमें नायडू ने संसद में संविधान संशोधन विधेयक को रोकने के लिए विपक्ष की आलोचना की थी और कहा था कि परिसीमन को लेकर जताई जा रही चिंताएं बेबुनियाद हैं। अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान पेश किए गए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 में लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने और परिसीमन को 2011 की जनगणना से जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया था। इसमें सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों की संख्या को आनुपातिक रूप से 50% तक बढ़ाने का प्रस्ताव भी शामिल था।
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यह बिल ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर पाया। वोट देने वाले 528 सदस्यों में से 298 ने बिल का समर्थन किया, जबकि 230 ने इसका विरोध किया। इसे पास करने के लिए कम से कम 352 वोटों की ज़रूरत थी। थरूर ने एक्स पर एक अख़बार की क्लिपिंग शेयर की, जिसकी हेडलाइन थी "नायडू ने कहा - परिसीमन बिल 50% सीट बढ़ोतरी के प्रावधान के साथ वापस आएगा। उन्होंने लिखा, नायडू जी, आइए एक सोच-विचार वाला प्रयोग करते हैं। मान लीजिए आपकी सैलरी 2 लाख है और आपके ड्राइवर की 20,000 है। आप सभी के लिए 50% बढ़ोतरी का ऐलान करते हैं। अब आपकी सैलरी 3 लाख हो जाती है और आपके ड्राइवर की 30,000। प्रतिशत या अनुपात के हिसाब से बढ़ोतरी तो एक जैसी है - लेकिन क्या आप अपने ड्राइवर की तुलना में और पहले की अपनी स्थिति की तुलना में, कहीं बेहतर स्थिति में नहीं हैं? थरूर ने कहा कि दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने यही चिंता जताई है कि भले ही सीटों में बढ़ोतरी का अनुपात एक जैसा रहे, फिर भी राजनीतिक संतुलन काफी बदल जाएगा।
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एक उदाहरण देते हुए उन्होंने पूछा कि क्या सच में कोई फर्क नहीं पड़ेगा अगर उत्तर प्रदेश के सांसदों की संख्या 80 से बढ़कर 120 हो जाए और केरल के सांसदों की संख्या 20 से बढ़कर 30 हो जाए? उन्होंने कहा कि भले ही संख्या का अनुपात एक जैसा रहे, लेकिन राजनीतिक वजन में भारी अंतर एक गंभीर चिंता का विषय बना रहेगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक वजन में भारी अंतर केरल के 10 और सांसदों के मुकाबले यूपी के 90 और सांसद। क्या यह आपके लिए बिल्कुल भी चिंता की बात नहीं है? इस उदाहरण के ज़रिए थरूर ने तर्क दिया कि सभी राज्यों में सीटों की संख्या में आनुपातिक बढ़ोतरी करने से राजनीतिक संतुलन बना रहेगा, ऐसा ज़रूरी नहीं है। खासकर दक्षिणी राज्यों के लिए, जिन्होंने लंबे समय से आबादी पर आधारित परिसीमन प्रक्रिया में नुकसान होने की चिंता जताई है।
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