Shubhanshu Shukla Axiom Mission | अंतरिक्ष में इतिहास रचने वाले शुभांशु शुक्ला की कहानी | Matrubhoomi

Shubhanshu
Prabhasakshi
अभिनय आकाश । Feb 27 2026 7:51PM

एक डेकोरेटेड पायलट होने के साथ-साथ वह एक टेस्ट पायलट भी हैं। उनके परिवार का भी उनकी सफलता में बड़ा कंट्रीब्यूशन है। पिताजी रामभू दयाल शुक्ला साहब यूपी सचिवालय से रिटायर्ड जॉइंट सेक्रेटरी हैं। मां ने हमेशा सपनों को सपोर्ट किया। उनकी पत्नी काम्या एक डेंटिस्ट हैं और उनका छ साल का बेटा किियाश भी इस हिस्टोरिक मोमेंट का हिस्सा बनने के लिए सुपर एक्साइटेड है। शुभांशु तीन भाई बहनों में सबसे छोटे हैं। बहनें निधि और सुची दोनों ही उन्हें सपोर्ट करती आई हैं। डिफेंस फोर्सेस ज्वाइन करने वाले अपने परिवार के वो पहले व्यक्ति हैं।

जब हमारी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने पूछा था राकेश शर्मा जी से जो पहले भारत के अंतरिक्ष यात्री थे कि वहां से भारत कैसा दिखता है? तो उन्होंने कहा था सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा।  25 जून 2025 की दोपहर जैसे ही घड़ी में 12:01 का वक्त दिखाया भारत का दिल एक साथ धड़क उठा अमेरिका के कनेडी स्पेस सेंटर से जैसे ही फाल्कन रॉकेट से बंधा स्पेस एक्स का ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट आसमान की ऊंचाइयों की ओर बढ़ा। उसमें सवार एक भारतीय का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। वो नाम है शुभांशु शुक्ला। राकेश शर्मा के बाद 41 साल तक भारत ने इंतजार किया था। उस पल का जब कोई भारतीय दोबारा अंतरिक्ष की दहलीज पर कदम रखेगा और इस इंतजार को तोड़ा लखनऊ के लाल भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने।  एक्सियम4 मिशन नासा और स्पेस एक्स का यह अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष अभियान केवल अमेरिका या पश्चिमी देशों के लिए वैज्ञानिक प्रयोग का प्लेटफार्म नहीं रहा। इस बार इसमें भारत की भावनाएं, उम्मीदें और आकांक्षाएं भी सवार थी। शुभांशु ने उड़ान से पहले कहा यह सिर्फ मेरी उड़ान नहीं है बल्कि 140 करोड़ देशवासियों के सपने लेकर जा रहा हूं। उनकी यह बात सिर्फ शब्द नहीं एक भावनात्मक संकल्प था। भारत की अंतरिक्ष यात्रा को आगे ले जाने का। यह मिशन पहले 10 जून को ल्च होना था। लेकिन खराब मौसम के चलते एक दिन के लिए पोस्टपोन किया गया।

कौन हैं शुभांशु शक्ला

एक डेकोरेटेड पायलट होने के साथ-साथ वह एक टेस्ट पायलट भी हैं। उनके परिवार का भी उनकी सफलता में बड़ा कंट्रीब्यूशन है। पिताजी रामभू दयाल शुक्ला साहब यूपी सचिवालय से रिटायर्ड जॉइंट सेक्रेटरी हैं। मां ने हमेशा सपनों को सपोर्ट किया। उनकी पत्नी काम्या एक डेंटिस्ट हैं और उनका छ साल का बेटा किियाश भी इस हिस्टोरिक मोमेंट का हिस्सा बनने के लिए सुपर एक्साइटेड है। शुभांशु तीन भाई बहनों में सबसे छोटे हैं। बहनें निधि और सुची दोनों ही उन्हें सपोर्ट करती आई हैं। डिफेंस फोर्सेस ज्वाइन करने वाले अपने परिवार के वो पहले व्यक्ति हैं।

स्पेस स्टेशन से समुद्र तक शुभ का मंगल सफर

डिपार्चर बर्न: स्पेस स्टेशन से अलग होने के बाद वह पृथ्वी की कक्षा में घूमने लगता है। इस प्रक्रिया में इंजन बर्न कर या को कक्षा से दूर जाने लगता है।

फेजिंग बर्न: इस चरण में यान अपनी कक्षा में स्थिति को इस तरह से बदलता है ताकि वह सही समय पर पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सके। इसे ऑर्बिटल फेजिंग कहा जाता है।

डी-ऑर्बिट बर्न: अब यान पृथ्वी की ओर गिरने के लिए अंतिम बार अपने इंजन को जलाता है, जिससे उसकी गति और ऊंचाई कम होती है। यह कदम उसे पृथ्वी की वायुमंडलीय परत में प्रवेश के लिए तैयार करता है।

ट्रंक को अलग करना : स्पेसक्राफ्ट का पीछे वाला हिस्सा (ट्रक) जो ऊर्जा और सहायक प्रणाली ले जाता है, उसे मुख्य कैप्सूल से अलग कर दिया जाता है, क्योंकि वह अब वापसी में उपयोगी नहीं रहता।

वायुमंडल में प्रवेशः यह सबसे कठिन चरण होता है जब यान अत्यधिक गति और गर्मी के साथ पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है। हीट शील्ड इसका तापमान से बचाव करता है।

पैराशूट खोलनाः वायुमंडल में घर्षण के कारण यान की गति धीमी हो जाती है, इसके बाद एक के बाद एक पैराशूट खुलते हैं ताकि यान की गति और अधिक कम हो सके और वह सुरक्षित तरीके से नीचे आ सके।

पानी में उतरना : अंत में यान महासागर में धीरे-धीरे उतरता है, जिसे स्प्लैशडाउन कहा जाता है। यहां से कू को रिकवरी टीम द्वारा सुरक्षित बाहर निकाला जाता है।

गगनयान मिशन के लिए कारगर होगी शुभांशु की स्टडी

अंतरिक्ष में जीवन को समझने के लिए शुभांशु शुक्ला ने किए सात अहम प्रयोग। ये गगनयान मिशन के लिए महत्वपूर्ण होंगे। इनका मकसद यह समझना था कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में जीवन कैसे प्रभावित होता है। इन प्रयोगों में माइक्रोएल्गी, बीजों का अंकुरण जैसे विषय शामिल थे। सूक्ष्म जीव पर अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि जीवन अत्यधिक तापमान में कैसे जीवित रह सकता है।मांसपेशियों पर शोध से जानने की कोशिश की गई कि अंतरिक्ष में कोशिकाएं कैसे व्यवहार करती है, क्या पुनर्जीवित हो सकती हैं। हरित शैवाल पर अध्ययन यह देखने के लिए था कि क्या इनका विकास अंतरिक्ष में भी संभव है। इनसे ऑक्सिजन और भोजन मिल सकते हैं। 'वॉयेजर डिस्प्ले' की स्टडी अंतरिक्ष उड़ान में आंखों की गति और समन्वय पर असर को समझने के लिए की गई।

18 दिन अंतरिक्ष स्टेशन में बिताए, दो दिन आने-जाने में लगे

 शुभांशु शुक्ला समेत चारों अंतरिक्ष यात्रियों ने 20 दिन के इस मिशन में 18 दिन अंतरिक्ष स्टेशन पर बिताए और एक दिन उन्हें स्पेस स्टेशन तक पहुंचने में और एक दिन धरती तक लौटने में लगा। यह अमेरिकी कंपनी स्पेसएक्स द्वारा इंसानों को कक्षा में भेजने का 18वां मिशन था। इस प्राइवेट अंतरिक्ष मिशन पर शुभांशु शुक्ला को भेजने के लिए भारत ने लगभग 550 करोड़ रुपए खर्च किए।

अनुकूल स्थिति हासिल करने के लिए चार दिन बढ़ाया था मिशनः स्पेस स्टेशन पर रहते हुए इस मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने कुल 31 देशों के सहयोग से 60 से अधिक वैज्ञानिक प्रयोग और तकनीकी परीक्षण पूरे किए। इस मिशन के दौरान अमेरिका, भारत, पोलैंड, हंगरी, सऊदी अरब, ब्राजील, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात और यूरोप के कई देशों के सहयोग से वैज्ञानिक अध्ययन और तकनीकी परीक्षण किए गए।

इस मिशन की शुरुआत 26 जून को फ्लोरिडा स्थित नासा के केनेडी स्पेस सेंटर से हुई थी। इस मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट से ग्रेस अंतरिक्ष यान के जरिए उड़ान भरी और एक दिन बाद अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से सफलतापूर्वक डॉकिंग की। यह मिशन लगभग दो सप्ताह तक चलने की योजना थी, लेकिन वापसी के दौरान अनुकूल स्थिति हासिल करने के लिए इसे चार दिन बढ़ा दिया गया।

All the updates here:

अन्य न्यूज़