Supreme Court ने Anwar Dhebar को दी अंतरिम जमानत, राज्य से बाहर रहने का निर्देश

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उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य विपणन निगम लिमिटेड से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में कारोबारी अनवर ढेबर को अंतरिम जमानत प्रदान की है। शीर्ष अदालत ने जमानत की शर्त के तौर पर आरोपी को मुकदमे की सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ राज्य से बाहर रहने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही ढेबर को अपनी अंतरिम जमानत की अवधि के दौरान नए निवास स्थान का पता भी अदालत को देना होगा।

नयी दिल्ली, पांच अगस्त उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य विपणन निगम लिमिटेड (सीएसएमसीएल) से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और अवैध कमीशन गिरोह के मामले में कारोबारी अनवर ढेबर को बुधवार को अंतरिम जमानत दे दी। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने जमानत की शर्त के तौर पर ढेबर को छत्तीसगढ़ से बाहर रहने और मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने ढेबर को यह भी निर्देश दिया कि अंतरिम जमानत मिलने के बाद वह जहां रहेंगे, उस पते का विवरण न्यायालय को उपलब्ध कराएं।

ढेबर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने पैरवी की। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 13 मई को ढेबर की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि आरोप राज्य संचालित निगम के भीतर ‘‘गहरे और व्यवस्थित भ्रष्टाचार के नेटवर्क’’ की ओर संकेत करते हैं। उच्च न्यायालय ने कहा था कि सार्वजनिक धन से जुड़े आर्थिक अपराधों को अधिक गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा था कि गहरी साजिश और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन की हानि से जुड़े आर्थिक अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं और इनका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि जांच के दौरान एकत्र सामग्री से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों को उनके वैध बिलों और बकाये का भुगतान जारी कराने के लिए कथित तौर पर अवैध कमीशन देने के लिए मजबूर किया जाता था। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराओं तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज किया है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सीएसएमसीएल के भीतर कथित तौर पर एक संगठित व्यवस्था संचालित की जा रही थी जिसके तहत मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों से बिलों के भुगतान के बदले कमीशन वसूला जाता था और यह धन बिचौलियों के माध्यम से आगे पहुंचाया जाता था।

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