अटल को क्यों लगा था डर कि कर्नाटकवासी सुषमा को अपने यहां ही रख लेंगे!

By अभिनय आकाश | Publish Date: Aug 7 2019 1:58PM
अटल को क्यों लगा था डर कि कर्नाटकवासी सुषमा को अपने यहां ही रख लेंगे!
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अटल ने कहा था कन्नड़ भाषा पर उनका अधिकार देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे डर है कर्नाटकवासी उन्हें अपने यहां ही न रख लें और दिल्ली जाने से मना करें।

शानदार वक्ता, बेहतरीन राजनेता और देश की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मंगलवार रात निधन हो गया। देश के लोकप्रिय राजनेताओं में शुमार स्वराज ने यूं तो अपने राजनीतिक जीवन में चार राज्यों में 11 चुनाव लड़ें। लेकिन एक चुनाव जिसका कि उनके चुनावी जीवन के सबसे चर्चित चुनावों की श्रेणी में अक्सर जिक्र होता है। साल 1999 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। सोनिया गांधी दो जगह से चुनावी मैदान में उतरी थीं। उत्तर प्रदेश के रायबरेली और कर्नाटक के बेल्लारी दोनों जगहों से इस बार सोनिया चुनावी अखाड़े में ताल ठोक रही थीं। नामांकन भरने का आखरी दिन था। अचानक भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष और मौजूदा यूपीए चेयरमैन सोनिया गांधी के खिलाफ बेलारी से चुनाव मैदान में उतर गयीं। 

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बेल्लारी कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती थी। ये चुनाव इस मायने में भी खास था क्योंकि भाजपा की स्ट्रेटजी विदेशी बहु बनाम स्वदेशी बेटी को आधार बनाकर चुनाव लड़ने की थी। सुषमा स्वराज ने बेल्लारी में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया। सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के खिलाफ जमकर चुनाव प्रचार किया। यहां तक की कन्नड़ में भाषण तक देना सीख लिया था। सुषमा स्वराज ने स्थानीय मतदाताओं से सहज संवाद के लिए कन्नड़ सीखनी शुरू की और करीब एक महीने के भीतर ही वह कन्नड़ सीखने में कामयाब हुईं। उनके कन्नड़ में दिए गए भाषण की कई क्लिप आज भी इंटरनेट पर मिल जाएंगे। सुषमा स्वराज को इस वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से शाबाशी भी खूब मिली। 
अटल ने कहा था कन्नड़ भाषा पर उनका अधिकार देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे डर है कर्नाटकवासी उन्हें अपने यहां ही न रख लें और दिल्ली जाने से मना करें। हालांकि लाख कोशिश के बाद भी सुषमा स्वराज सोनिया गांधी को बेल्लारी में नहीं हरा पायीं। लेकिन सुषमा स्वराज को इस चुनाव में 45 प्रतिशत वोट मिले और 56 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। बता दें कि पहले बेल्लारी सीट मद्रास और फिर मैसूर स्टेट में हुआ करती थी लेकिन 1977 के बाद से यह कर्नाटक हिस्सा है। मौजूदा समय यह सीट आरक्षित है।

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