स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, कहने वाले तिलक पर लगा था राजद्रोह

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Aug 1 2018 11:58AM
स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, कहने वाले तिलक पर लगा था राजद्रोह
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भारत की गुलामी के दौरान अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले लोकमान्य तिलक ने देश को स्वतंत्र कराने में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। वे जनसेवा में त्रिकालदर्शी, सर्वव्यापी परमात्मा की झलक देखते थे।

भारत की गुलामी के दौरान अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले लोकमान्य तिलक ने देश को स्वतंत्र कराने में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। वे जनसेवा में त्रिकालदर्शी, सर्वव्यापी परमात्मा की झलक देखते थे। "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है मैं इसे लेकर रहूंगा" के उद्घोषक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का स्थान स्वराज के पथगामियों में अग्रणीय है। उनका महामंत्र देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी तीव्रता के साथ गूंजा और एक अमर संदेश बन गया।

यह एक अद्भुत संयोग है कि तिलक 1856 के विद्रोह के वर्ष में तब उत्पन्न हुए जब देश का सामान्य वातावरण अंग्रेजी राज्य के विरूद्ध विद्रोह की भावना से पूर्ण था। महानायक तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को शिवाजी की कर्मभूमि महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश के रत्नागिरि नामक स्थान पर हुआ। तिलक का वास्तविक नाम केशव था। तिलक को बचपन में बाल या बलवंत राव के नाम से पुकारा जाता था। तिलक के पिता गंगाधर राव प्रारम्भ में अपने कस्बे की स्थानीय पाठशाला में एक शिक्षक थे। बाद में थाने तथा पूना जिले में सरकारी स्कूलों में सहायक इंस्पेक्टर बन गये। पिता के सहयोग के फलस्वरूप वे संस्कृत, गणित और व्याकरण जैसे विषयों में अपनी आयु के बालकों में बहुत आगे थे। मेधावी होने के कारण उन्होंने दो वर्षों में तीन कक्षाएं भी उत्तीर्ण कीं।
 
तिलक का विवाह 15 वर्ष की आयु में ही हो गया। उनके विवाह के कुछ समय पश्चात ही उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। माता−पिता के निधन के पश्चात तिलक के पालन पोषण का भार उनके चाचा पर पड़ गया। तिलक ने सन् 1872 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सन 1876 में बीए की परीक्षा पास की तथा 1879 में एलएबी की परीक्षा पास की। लोकमान्य तिलक का जब राजनैतिक पर्दापण हुआ तब देश में राजनैतिक अंधकार छाया हुआ था। दमन और अत्याचारों के काले मेघों से देश आच्छादित था। जनसाधारण में इतना दासत्व उत्पन्न हो गया था कि स्वराज और स्वतंत्रता का ध्यान तक उनके मस्तिष्क में नहीं था। उस वक्त आम जनता में इतना साहस नहीं था कि वह अपने मुंह से स्वराज का नाम निकाले। ऐसे कठिन समय में लोकमान्य तिलक ने स्वतंत्रता के युद्ध की बागडोर संभाली।
 


सन् 1891 में उन्होंने केसरी और मराठा दोनों ही पत्रों का संपूर्ण भार स्वयं खरीदकर अब इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रकाशित करना शुरू कर दिया। अपनी प्रतिभा लगन और अदम्य कार्यशक्ति के बल पर शीघ्र ही जनक्षेत्र में अपना स्थान बना लिया। उनकी लौह लेखनी से ही केसरी और मराठा महाराष्ट्र के प्रतिनिधि पत्र बन गये। केसरी के माध्यम से समाज में होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने पर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। तिलक को राजद्रोही घोषित कर 6 वर्ष का कालापनी और एक हजार रुपये का अर्थदंड उनको दिया गया। इस दंड से सारे देश में क्रोध की लहर दौड़ गयी। जनता द्वारा सरकार का विरोध किया गया। बाद में सरकार ने थोड़ा झुकते हुए उन्हें साधारण सजा सुनायी। उन्हें कुछ दिन बाद अहमदाबाद तथा बाद में बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया।
 
जब तिलक को सजा सुनायी जा रही थी उस समय भी उनके मन में घबराहट नहीं हुई। उस समय भी उन्होंने यही कहा था कि य़द्यपि ज्यूरी ने मेरे खिलाफ राय दी है फिर भी मैं निर्दोष हूं। वस्तुतः मनुष्य की शक्ति से भी अधिक शक्तिशाली दैवी शक्ति है। वही प्रत्येक व्यक्ति और राष्ट्र के भविष्य की नियंत्रणकर्ता है। हो सकता है कि देश की यही इच्छा हो कि स्वतंत्र रहने के बजाय कारागार में रहकर कष्ट उठाने से ही मेरे अभिष्ट कार्य की सिद्धि में अधिक योग मिले। उन्होंने एक बार कहा था कि साक्षात् परमेश्वर भी मोक्ष प्रदान करने लगे तो मैं उनसे कहूंगा पहले मुझे मेरे देश को परतंत्रता से मुक्त देखना है।
 
इसी प्रकार उन्होंने घोषित किया था कि, "स्वतंत्रता तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है"। जब तक यह भाव मेरे दिल में है मुझे कौन लांघ सकता है। मेरी इस भावना को काट नहीं सकते। आग उसको भस्म नहीं कर सकती मेरी आत्मा अमर है। यह उनका संदेश था जो भारत के एक−एक भारतीय को झकझोर गया। जेल यात्रा के दौरान उन्होंने लगभग पांच सौ ग्रंथों का गहन अध्ययन किया तथा गीता रहस्य नामक ग्रंथ की अमर रचना की। लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस की लंदन शाखा का भी संगठन किया। तिलक के स्वदेश लौटते ही उन्हें एक लाख की थैली भेंट की गयी। उन्होंने अपना सारा धन होमरूल आंदोलन को देकर अपने देशप्रेम का अद्भुत परिचय दिया। इसके थेड़े ही दिन बाद वे बीमार पड़ गये और 31 जुलाई 1920 की रात को सदा के लिए अंतिम सांस ली। इस प्रकार भारतीय राजनैतिक गगन का यह सूर्य अस्त हो गया।
 


उनका अंतिम संदेश यही था कि, "देश व भारतीय संस्कृति के लिए जिसने अपने जीवन को बलिदान कर दिया मेरे हृदय मंदिर में उसी के लिए स्थान है।" जिसके हृदय में माता की सेवा के लिए भाव जागृत है वही माता का सच्चा सपूत है। इस नश्वर शरीर का अंत तो होना ही है। हे भारत माता के नेताओं और सपूतों मैं आप लोगों से अंत में यही कहना चाहता हूं कि मेरे इस कार्य को उत्तरोत्तर बढ़ाना। उनका धैर्य कभी कम नहीं हुआ और निराशा उनके जीवन को छू तक न सकी। उनके अलौकिक गुणों को धारण करना ही उनका स्मरण है। ऐसे देशभक्त एवं वीर पुरुषों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को देश तथा समाज के कल्याण में लगाना चाहिए ताकि भारत की स्वतंत्रता, एकता व अखंडता कायम रहे।

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