रथ यात्रा निकालकर भारत में की थी हिन्दुत्व की राजनीति की शुरुआत, 92 के हुए आडवाणी

  •  अंकित सिंह
  •  नवंबर 8, 2019   12:51
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रथ यात्रा निकालकर भारत में की थी हिन्दुत्व की राजनीति की शुरुआत, 92 के हुए आडवाणी
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वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए भले ही यह कहा जा सकता है कि आडवाणी युग का अंत हो गया। पर यह बात भी सच है इस इस दौर में वहीं आगे है जिनकों आडवणी ने राजनीति का ककहरा सिखलाया था।

भारतीय राजनीति के समय-समय पर एक नए युग का उदय होता रहा है और इन युगों में नए-नए किरदार भी उभरते रहे। उन किरदारों में से एक हैं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी। लालकृष्ण आडवाणी एक नेता नहीं बल्कि कुशल संगठनकर्ता, स्पष्टवादी दृष्टा और भारतीय राजनीति के लौह पुरुष हैं। एक ऐसे नेता जिसने अछूत कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी को ना सिर्फ राष्ट्रीय स्तर तक लेकर आए बल्कि इसे लोगों की भावनाओं से भी जोड़ा। कभी पार्टी के कर्णधार कहे गए, कभी लौह पुरुष तो कभी पार्टी का असली चेहरे के तौर पर सबके सामने आये। लेकिन किया वही जो पार्टी के हित में रहा। भाजपा के साथ-साथ भारतीय राजनीति के भी अहम अध्याय हैं लालकृष्ण आडवाणी। 

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए भले ही यह कहा जा सकता है कि आडवाणी युग का अंत हो गया। पर यह बात भी सच है इस इस दौर में वहीं आगे है जिनकों आडवणी ने राजनीति का ककहरा सिखलाया था। तभी तो, उनकें 92वें जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो या फिर अमित शाह, एक से एक दिग्गज नेता उनके आवास पहुंच कर उन्हें जन्मदिन की बधाई दे रहै हैं। लालकृष्ण आडवाणी का जन्म आठ नवंबर, 1927 को अविभाजित भारत के कराची में हुआ था। कराची में ही शिक्षा दीक्षा ग्रहण करने के बाद आडवाणी ने वहीं अध्यापक के तौर पर पढ़ाना शुरू कर दिया था। वे 14 साल की ही उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए और कराची प्रांत में प्रचारक का काम करने लगे। विभाजन के बाद आडवाणी का पूरा परिवार मुंबई आ गया और मुंबई से ही आडवाणी ने वकालत की पढ़ाई की। यहीं उनका विवाह ने 1965 में कमला आडवाणी से शादी की थी। 

आडवाणी के राजनीतिक सफर की बात करें तो इसकी शुरुआत 1951 में होती है जब वह भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संपर्क में आएं। जन संघ की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए आडवाणी राजनीति के सफर में आगे बढ़ते गए। आडवाणी ने सबसे पहले संसद का रास्ता 1970 में नापा जब उन्हें दिल्ली से राज्यसभा के लिए भेजा गया। आडवाणी 1970 से 1989 तक के चार कार्यकाल के लिए राज्यसभा पहुंचें। 1973 से 1977 तक वह जनसंघ के अध्यक्ष रहे। आपातकाल के दौर में सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया और जनता पार्टी के महासचिव रहे। 1989 में वह पहली बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 

मोरारजी देसाई के नेतृत्व में भारत में पहली गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा लालकृष्ण आडवाणी को दिया गया। हालांकि जनता पार्टी में गुटबाजी की वजह से यह कुनबा बिखरता गया और आडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हो लिए। एक बात और थी कि अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी दोनों ही संघ की पृष्ठभूमि से आते थे। इसलिए दोनों ने एक साथ आगे बढ़ना शुरू किया। 1980 में भारतीय जनसंघ के लोगों ने एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया जिसका नाम था भारतीय जनता पार्टी। 1986 में आडवाणी भाजपा के अध्यक्ष बने और उनके ही कार्यकाल से भाजपा भारतीय राजनीति में एक नई दिशा में आगे बढ़ने लगी।

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1990 का दौर भारत और भारतीय राजनीति के लिए कई मायनों में अहम है। 1990 का ही दौर था जब आडवाणी के नेतृत्व में सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथ यात्रा का आयोजन किया गया और इसी दौरान आडवाणी की गिरफ्तारी भी होती है। बाबरी विध्वंस मामले में भी लालकृष्ण आडवाणी का नाम आता है हालांकि इन सबके बीच एक चेहरा भारतीय राजनीति में लगातार चमकना शुरू कर देता है जो है लालकृष्ण आडवाणी का। लालकृष्ण आडवाणी का नाम सत्ता के सबसे शीर्ष नाम के लिए सबसे आगे रहने लगा यानी कि उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए भी लिया जाने लगा। हालांकि आडवाणी ने खुद को पीछे रखे अटल बिहारी वाजपेयी को आगे किया। गृह मंत्री एवं उप प्रधानमंत्री होने के नाते आडवाणी ने कई ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं जो लोकतंत्र और भारतीय राजनीति को हमेशा नई दिशा और दशा प्रदान करती रहेगी। 







वफादार, मददगार और रणनीतिकार...ऐसे थे कांग्रेस के ‘अहमद भाई’

  •  अनवारुल हक
  •  नवंबर 25, 2020   13:08
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वफादार, मददगार और रणनीतिकार...ऐसे थे कांग्रेस के ‘अहमद भाई’
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पांच बार राज्यसभा और तीन बार लोकसभा के सदस्य रहे पटेल का जन्म 21 अगस्त, 1949 को गुजरात के भरूच में मोहम्मद इसहाकजी पटेल और हव्वाबेन पटेल के घर हुआ था। अहमद पटेल के पिता भी कांग्रेस में थे और एक समय भरूच तालुका पंचायत सदस्य थे।

आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस विरोधी माहौल अपने चरम पर था, लेकिन गुजरात के भरूच से 28 साल के एक नौजवान ने इस माहौल को मात देते हुए जीत दर्ज की। अहमद पटेल नामक यही नौजवान बाद में दशकों तक कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में एक अहम किरदार रहा। मृदुभाषी, सरल स्वभाव, मिलनसार, वफादार, मददगार और बेहतरीन रणनीतिकार, पटेल के लिए ऐसी कई उपमाओं का उपयोग कांग्रेस के अधिकतर नेता और उनके करीबी करते हैं। पटेल का बुधवार को 71 साल की उम्र में निधन हो गया। वह अपने जीवन के आखिरी समय तक कांग्रेस की कश्ती के खेवनहार बने रहे। कांग्रेस प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य शक्ति सिंह गोहिल का कहना है, ‘‘पटेल के जाने से कांग्रेस ने तूफ़ान में नाव पार लगाने वाला एक मांझी खो दिया है। यही नहीं, राजनीति ने भला इंसान खो दिया। गुजरात ने गुजरातियों के लिए मर-मिटनेवाला सपूत खो दिया।’’ 

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पांच बार राज्यसभा और तीन बार लोकसभा के सदस्य रहे पटेल का जन्म 21 अगस्त, 1949 को गुजरात के भरूच में मोहम्मद इसहाकजी पटेल और हव्वाबेन पटेल के घर हुआ था। अहमद पटेल के पिता भी कांग्रेस में थे और एक समय भरूच तालुका पंचायत सदस्य थे। अहमद पटेल को राजनीतिक कॅरियर बनाने में पिता से बहुत मदद मिली। हालांकि अहमद पटले के दोनों बच्चे फैसल और मुमताज राजनीति से दूर हैं। कांग्रेस एवं सियासी गलियारे में ‘अहमद भाई’ के नाम से पुकारे जाने वाले पटेल ने 1976 में गुजरात से भरूच में स्थानीय निकाय में किस्मत आजमाने के साथ ही राजनीतिक पारी की शुरुआत की। फिर आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जब इंदिरा गांधी की अगुवाई में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा तो पटेल 28 साल की उम्र में भरूच से पहली बार लोकसभा पहुंचे। इसके बाद वह इस सीट से 1980 और 1984 में भी निर्वाचित हुए। अपनी राष्ट्रीय राजनीति के शुरुआती दिनों में ही वह इंदिरा गांधी के करीबी बन गए। बाद में वह राजीव गांधी के बेहद करीबी और खास रहे। पटेल को 1980 के दशक में कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। वह राजीव गांधी के संसदीय सचिव भी रहे। 

पटेल 1989 में लोकसभा चुनाव हार गए और फिर 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद उन्हें राजनीतिक जीवन में कठिन समय का सामना करना पड़ा। हालांकि 1993 में वह राज्यसभा में पहली बार पहुंचे और इसके बाद लगातार ऊपरी सदन के सदस्य बने रहे। सोनिया गांधी के बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद पटेल का सियासी ग्राफ एक बार फिर बढ़ा और पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल हो गए। फिर वह सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव बने। कहा जाता है कि सोनिया गांधी और कांग्रेस के फैसलों में उनकी स्पष्ट छाप होती थी। साल 2004 में मनमोहन सिंह की अगुवाई में संप्रग सरकार बनने के बाद पटेल के कद एवं भूमिका में और भी इजाफा हो गया। उस वक्त उन्हें कांग्रेस संगठन, सहयोगी दलों और सरकार के बीच सेतु का काम करने वाला नेता माना जाता था। कहा जाता है कि पटेल ने अपने राजनीतिक जीवन में कई मौकों पर सरकार का हिस्सा बनने की पेशकशों को ठुकराया और कांग्रेस संगठन के लिए काम करने को तवज्जो दी।

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गुजरात प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल ने कहा, ‘‘पटेल जी नि:स्वार्थ भाव से राजनीति करते थे और यही वजह थी कि उन्होंने कभी सरकार में कोई पद नहीं लिया। युवाओं को उनसे यही सीख मिलती है। उनका सपना था कि गुजरात में कांग्रेस की फिर से सरकार बने। हम उनका सपना पूरा करने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे।’’ कांग्रेस के 2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद जब उसके लिए मुश्किल दौर शुरु हुआ तो भी पटेल पूरी मजबूती से पार्टी के साथ खड़े रहे और रणनीतिकार की अपनी भूमिका को बनाए रखा। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस फिर हारी तब भी उन्होंने अपनी भूमिका को निभाना जारी रखा। वह 2018 में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष बने थे और आखिरी समय तक इस भूमिका में रहे। अपनी पार्टी के लिए कई मौकों पर संकटमोचक की भूमिका निभाने वाले पटेल मीडिया की चकाचौंध से दूर रहे। 2017 के गुजरात के राज्यसभा चुनाव, फिर विधानसभा चुनाव और हालिया सचिन पायलट प्रकरण एवं 23 नेताओं के पत्र से जुड़े विवाद के समय तथा कई अन्य अवसरों पर भी पटेल ने खुद के बेहतरीन रणनीतिकार होने और संकटमोचक की भूमिका का बखूबी परिचय दिया।







भारतीय मूल्यों की प्रखर प्रवक्ता थीं पूर्व राज्यपाल व साहित्यकार मृदुला सिन्हा

  •  गिरीश पंकज
  •  नवंबर 20, 2020   18:06
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भारतीय मूल्यों की प्रखर प्रवक्ता थीं पूर्व राज्यपाल व साहित्यकार मृदुला सिन्हा
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मृदुलाजी समग्र लेखन की विशेषता यही है कि उनमे नयापन तो है लेकिन परम्परा और संस्कृति के प्रति गहन लगाव है, रागात्मक बोध भी है। वे महानगरों में रहने वाली जड़ से कटी लेखिकाओं में से नहीं है। मृदुला जी के लेखन मे पश्चिमीकरण नहीं है।

गोवा की पूर्व राज्यपाल प्रख्यात लेखिका मृदुला सिन्हा का 18 नवंबर को दुखद निधन हो गया। उनके साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक अवदान को लोग निरंतर याद रखेंगे। मैं अक्सर जिन मानवीय और भारतीय मूल्यों के साथ चल कर स्त्री-विमर्श को देखने की बात करता हूँ, वे समस्त मूल्य अगर किसी एक लेखिका में गरिमापूर्ण दीखते थे, उस विदुषी का नाम था, मृदुला सिन्हा। यह मुँहदेखी बात नहीं है। उनका समग्र लेखन इस बात की खुली गवाही है। इसलिए अगर मैं उनको भारतीय मूल्यों की प्रखर प्रवक्ता कहूँ, तो यह असंगत न होगा। स्त्री-मुक्ति की वकालत भी वे निरंतर करती थीं लेकिन मुझे वे महादवी वर्मा की परम्परा की ही लेखिका लगती रहीं। महादेवी वर्मा के अवदान से हम परिचित हैं। उनके जीवन के संघर्ष को भी हम सब जानते हैं। उन्होंने एक जगह लिखा भी है कि मैं भारतीय संस्कृति की परिधि में रह कर ही स्त्री-मुक्ति की बात करती हूँ। इसका मतलब यह कि जो कुछ हमारे श्रेष्ठ सनातनी मूल्य हैं, महादेवी जी उनके साथ है। अपने वक्तव्यों में मृदुला जी भी आधुनिकता की बात करती रहीं, लेकिन उसकी जड़ में भारतीय सांस्कृतिक-बोध भी सन्निहित होता था। यही कारण है कि इस वक्त के स्त्री लेखन में जिन दो-चार लेखिकाओं में नैतिकता की प्रखरता दिखती है, उनमें मृदुला जी शीर्ष पर दिखाई देती हैं। बांग्ला की आशापूर्णा देवी भी इसी परम्परा की थी। अपने समय में सुभद्राकुमारी चौहान जैसी कुछ लेखिकाएं भी थी, जिन्होंने भारतीय मूल्यों की अनदेखी कभी नहीं की। मृदुलाजी में ऐसी ही श्रेष्ठ लेखिकाओं का विस्तार दीखता है। यह कम बड़ी बात नहीं कि उन्होंने पूर्णकालिक लेखन के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी और जीवन सृजन को समर्पित कर दिया।

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परम्परा और संस्कृति के प्रति गहन लगाव 

मृदुलाजी समग्र लेखन की विशेषता यही है कि उनमे नयापन तो है लेकिन परम्परा और संस्कृति के प्रति गहन लगाव है, रागात्मक बोध भी है। वे महानगरों में रहने वाली जड़ से कटी लेखिकाओं में से नहीं है। मृदुला जी के लेखन मे पश्चिमीकरण नहीं है। उनके लेखन में  पूरब की लाली है जिसकी आभा में उनका साहित्य दीप्त होता रहता है। नाम के अनुरूप ही वे मृदुल है। मृदुभाषी भी है और मितभाषी भी। उनसे मेरा कोई अंतरंग परिचय नहीं है। दो एक बार वे रायपुर आई, तब उनसे आत्मीय भेंट हुई। एक कार्यक्रम में उनके साथ मंच पर बैठने का सौभाग्य भी मिला। खुशी इस बात कि वे मेरे काम से थोड़ा-सा परिचित भी थीं। मेरे साहित्यिक मित्र संजय पंकज ने एक रोचक संस्मरण सुनाया। पिछले साल मुझे एक सम्मान मिला। अनेक पत्रिकाओं में उस की खबर प्रकाशित हुई थी। मृदुला जी साहित्यिक पत्रिकाएं तो पढ़ती ही रहती हैं। उन्होंने भी वो खबर देखी थी। एक बार जब संजय जी से उनकी कहीं भेंट हुई तो उन्होंने उनको बधाई दे दी कि आपको फलाँ सम्मान मिला है, तो संजयजी ने कहा, ''मुझे नहीं, गिरीश पंकज को मिला है।'' यह सुनकर वे मुस्करा दी। एक और घटना जो बिलकुल मुझसे जुडी हुई है। वो यह है कि एक केंद्रीय मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के लिए उन्होंने मेरे नाम की अनुशसा की। मंत्रालय से मेरे पास पत्र भी आया कि अपना बायोडाटा भेज दीजिये। तभी मुझे ज्ञात हुआ क्यों कि पत्र में अधिकारी ने लिखा था कि मृदुलाजी ने आपके नाम की अनुशंसा की है। यह उनके राज्यपाल बनने के कुछ समय पहले की ही बात है। इसे अपना सौभाग्य ही मानता हूँ कि देश की एक बड़ी लेखिका बड़ा हृदय भी रखती हैं और वे लोगों को पहचानती भी है। उनमे खासियतें अनंत है। एक लेखक के नाते मैंने जो देखा वो यह कि वे आज भी (महामहिम होने के बावजूद ) लेखकों के बीच जाना पसंद करती थीं और प्रोटोकॉल को भी किनारे रख देती थीं। वे जब किसी साहित्यिक समारोह में जाती, तो विशुद्ध लेखक की तरह ही रहतीं। विश्व पुस्तक मेले में वे लेखकों के बीच लेखक की तरह ही बैठती रहीं। सृजनधर्मियों के बीच कोई बंधन नहीं रहता। वे सबसे प्रेम से मिलती और खुल कर अपनी बात रखती। मौका पड़ने पर लोक गीत भी सुना देतीं। एक जगह उन्होंने सुनाया भी कि ''सरौता कहाँ भूल आई प्यारी ननदिया''। व्यंग्यकारों के बीच आती, तो व्यंग्य भी पढ़ती। सहजता-सरलता ही व्यक्ति को शिखर तक पहुंचा देती थी। विनोद करना मृदुलाजी का सहज स्वभाव था। एक बार उन्होंने कहीं कहा था, ''मेरे बालों पर मत जाइए। इसे तो मैंने सफेद रंग कराया है। मैं तो अभी भी बयालीस साल की उम्र के बराबर ही काम करती हूँ''। 

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भारतीय स्त्री की छवि 

मृदुला जी की पत्रिका 'पाँचवाँ स्तम्भ' के हम लोग नियमित पाठक रहे। पत्रिका का शीर्षक ही उनकी सोच को दर्शाने वाला है पत्रकारिता भी प्रजातंत्र का एक स्तम्भ है। इस पत्रिका में समकालीन समय और समाज के अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे प्रमुखता के साथ सामने आते रहे हैं और उन पर गंभीर विमर्श भी होता रहा है। उनके लेखन की लगन से हम सब परिचित ही है। उनका चर्चित उपन्यास 'ज्यों मेहदी को रंग' तो पाठ्य पुस्तक का हिस्सा भी बना। इसके अतिरिक्त 'घरवास', 'नई देवयानी', 'अतिशय' और 'सीता पुनि बोली' जैसे उपन्यास भी हैं, जिनमे भारतीय स्त्री के जीवन संघर्ष और उसकी अस्मिता के दर्शन हमें होते हैं। भारतीय मनोविज्ञान की सुंदर व्याख्या उनके लेखन का केन्द्रीय तत्व है। उनकी कहानियों और निबंधों में भी हम मिट्टी की सोंधी महक पाते हैं। वे देशज अनुभूतियों से लबरेज लेखिका थीं। महानगर में रहते हुए भी वे अपने लेखन और विचार के द्वारा बार बार गाँव लौटती थीं। अनेक लेखिकाएँ महानगर की कहानियां कह रही हैं और विकृतियों को महिमा मंडित भी कर रही हैं, लेकिन मृदुला जी के यहां विकृतियों को स्वीकृति नहीं मिलती, वरन उसका तिरस्कार ही दीखता है।

- गिरीश पंकज 

छत्तीसगढ़







स्वतंत्रता के लिए बलिदान का संदेश दिया था वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने

  •  डॉ. वंदना सेन
  •  नवंबर 19, 2020   11:10
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स्वतंत्रता के लिए बलिदान का संदेश दिया था वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने
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रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत वीरोचित भाव से झांसी की सुरक्षा करने का संकल्प लिया। इससे यही स्पष्ट होता है कि रानी के मन में गजब की राष्ट्रभक्ति थी। वे अकेले ही अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं।

वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मनोमस्तिष्क में रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरने लगती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना ही थीं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवन काल में ही ऐसा आदर्श स्थापित करके विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। कहा जाता है कि सच्चे वीर को कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से विमुख नहीं कर सकता। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था। उसके मन में अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म स्थापित करने वाली भक्ति हमेशा विद्यमान रही। वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया।

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वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोंपड़ी को चिता का रुप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।

जिन महापुरुषों का मन वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं।

सन् 1850 मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।

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27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ।

रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत वीरोचित भाव से झांसी की सुरक्षा करने का संकल्प लिया। इससे यही स्पष्ट होता है कि रानी के मन में गजब की राष्ट्रभक्ति थी। वे अकेले ही अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं।

उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा अंग्रेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। रानी का घोड़ा बुरी तरह घायल हो गया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ, लेकिन रानी ने साहस नहीं छोड़ा और शौर्य का प्रदर्शन किया। और आखिरकार 18 जून को वह दिन आ ही गया, जब रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की अंतिम आहूति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और स्वतंत्रता के लिए बलिदान का संदेश दिया। उनका समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए दिया गया यह बलिदान निश्चित रूप से समाज के हर व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है, एक आदर्श पाथेय है।

डॉ. वंदना सेन