Manipur में महिलाओं से दरिंदगी पर दिल्ली से दो टूक सवाल?

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ANI
कमलेश पांडे । Jul 21 2023 12:43PM

देश की सभी अप्रत्याशित घटनाओं के पीछे इनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका अक्सर संदिग्ध पाई जाती हैं! चाहे यह बात उन्हें पता हो या न हो, पर पब्लिक डोमेन में उनकी भूमिकाओं पर चर्चाएं होती रहती हैं। शायद संवैधानिक रूप से विभाजित किए हुए समाज का यह विकृत असर हो।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील पूर्वोत्तर के सात बहन राज्यों में से एक अहम राज्य मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने की घटना सामने आने के बाद अब सारा देश आक्रोशित हो उठा है। सरकार और विपक्ष से लेकर उच्चतम न्यायालय तक ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है। सबने इसे देश को शर्मसार करने वाली घटना बताया है। लेकिन यहां पर सबसे बड़ा और सुलगता हुआ सवाल यह है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधिगण और सर्वोच्च न्यायालय के मुखिया इसी शर्मसार कर देने वाली 'हृदयविदारक' घटना का बेसब्री पूर्वक इंतजार कर रहे थे! 

सवाल यह भी है कि क्या इससे पूर्व इस देश के विभिन्न राज्यों में इससे भी ज्यादा बड़ी और दिल दहला देने वाली लोमहर्षक व रोमहर्षक घटनाएं नहीं हुई हैं? और यदि हुई हैं तो फिर उसके बाद हमारे जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका क्या रही है, न्यायालय ने उन घटनाओं को कानून की कसौटी पर कैसे लिया है और स्वतः संज्ञान लेते हुए या फिर दर्ज मामलों के दोषियों को क्या सजा मुकर्रर की गई है, इस बारे में देशवासियों को जानने का पूरा हक है। इसलिए इस मसले पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को एक श्वेतपत्र जारी करना चाहिए। अखबारों और अन्य मीडिया माध्यमों में विज्ञापन जारी करके देश को बताना चाहिए, कि उसने किस मामले में कितनी सख्त दंडात्मक कार्रवाई की है और यदि नहीं कर पाई तो उसका कारण क्या रहा है?

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इस बात में कोई दो राय नहीं कि 'नारी अस्मिता' से खेलने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती और ऐसा करने वालों को सख्त से सख्त सजा अविलम्ब देनी चाहिए। लेकिन हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक, प्रशासनिक व अन्य कारणों से जबतक हमलोग 'मानवीय अस्मिताओं' को रौंदने वालों को क्षमा करते रहेंगे, तबतक ऐसी अप्रत्याशित घटनाएं अपनी प्रकृति बदल बदल कर सामने आती रहेंगी! और यह सभ्य समाज कुछ दिन तक हायतौबा मचाने के बाद पुनः उसी ढर्रे पर लौट जाएगा, जो इस देश की एक आदिम प्रवृति समझी जाती है।

लिहाजा, आज आजादी के अमृत कालखण्ड की सबसे बड़ी जरूरत है कि संवैधानिक कारणों से पैदा हुए सामाजिक असंतोष की शिनाख्त की जाए और उसे भड़काने वाले सियासतदानों, प्रशासनिक अधिकारियों, न्यायविदों और मीडिया प्रमुखों की स्पष्ट पहचान की जाए और समान रूप से उनकी पात्रताएँ निरस्त की जाएं, क्योंकि देश की सभी अप्रत्याशित घटनाओं के पीछे इनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका अक्सर संदिग्ध पाई जाती हैं! चाहे यह बात उन्हें पता हो या न हो, पर पब्लिक डोमेन में उनकी भूमिकाओं पर चर्चाएं होती रहती हैं। शायद संवैधानिक रूप से विभाजित किए हुए समाज का यह विकृत असर हो।

मुझे यहां पर यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि हमारे संविधान निर्माता अव्वल दर्जे के 'कालिदास' (महामूर्ख!) निकले, जिन्होंने समान मताधिकार से इतर जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग के आधार पर हुई अपनी नुमाइंदगी को परिपुष्ट करते हुए जिन जिन विषमता मूलक वैचारिक विष-पौध (आरक्षण, अल्पसंख्यक आदि) का प्रतिरोपण किया, वो 75 साल बाद विशालकाय विष-वृक्ष बनकर हमारे सामाजिक और साम्प्रदायिक सौहार्द को ललकार रही हैं। .....और हम इतने नाकाबिल हो चुके हैं कि उन्हें रोकने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं, बल्कि सिर्फ घड़ियाली आंसू ही बहा पाने में सक्षम प्रतीत हो रहे हैं!

इसलिये आज 'मर्माहत राष्ट्र' की पुकार है कि 'बहुमत आधारित लोकतंत्र' को समाप्त किया जाए और 'सर्वसम्मति वाले लोकतंत्र' को बढ़ावा दिया जाए, प्रशासनिक रूप से अनियंत्रित होते जा रहे इस देश व समाज को नियंत्रित किया जा सके। जातीय, सांप्रदायिक व चुनावी हिंसा-प्रतिहिंसा को घटनाओं को थामा जा सके। हमारे राजनीतिक संस्थाओं, प्रशासनिक संस्थाओं, न्यायिक संस्थाओं और मीडिया प्रतिष्ठानों के साथ साथ बाजारू व कारोबारी घरानों को इतना काबिल बनाया जा सके कि वह संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के बजाय राष्ट्र के व्यापक हित में और हरेक भारतीय के दूरगामी हित में संवैधानिक हल ढूंढें। 

यदि वो जरूरत महसूस करें तो संवैधानिक संशोधन करवाने का माहौल बनाएं और वैसे हरेक संवैधानिक अनुच्छेद या उपबन्ध को तिलांजलि दे दें, जो दूसरे भारतीयों का हक किसी भी रूप में छिनता हो या उसे चिढ़ाता आया हो। क्योंकि आज स्थिति इसलिए दिन ब दिन जटिल होती जा रही है कि विधि व्यवस्था व प्रशासनिक व्यवस्था के सवाल को भी यह तंत्र राजनैतिक नजरिये से देखने का आदि हो चुका है, जिससे समाज के बहुसंख्यक लोगों का तो भला हो जा रहा है, लेकिन अल्पसंख्यक लोगों का उत्पीड़न आम बात हो चली है। 

यहां पर अल्पसंख्यक शब्द का अर्थ किसी धर्म से नहीं बल्कि गांव-मोहल्ले या क्षेत्रीय संख्याबल में कमी से है और उनकी रक्षा करने में प्रशासनिक विफलता ही तमाम विरोधाभासों के बढ़ने की मौलिक वजह है। इसके उलट हर क्षेत्र में संख्या बल में कम पर आर्थिक और बौद्धिक रूप से संपन्न एक शातिर जमात मिलती है, जो पर्दे के पीछे से ऐसे घिनौने खेल खेलती आई हैं, जिन पर सहसा कोई विश्वास नहीं कर सकता! सच कहूं तो ऐसे लोग निजी स्वार्थ के लिए आपराधिक प्रवृत्ति के लोग पैदा करते हैं, उन्हें संरक्षण देते हैं। मेरी राय में इनकी शिनाख्त करने और ऐसे तत्वों को सजा दिलाने में स्थानीय प्रशासन की बहुत बड़ी जवाबदेही होती है। 

हालांकि, चर्चा जनित अनुभव यह बताता है कि राजनीतिक व अन्य कारणों से प्रशासन भी यहां पर विवेकसम्मत कार्रवाई करने के अपने मौलिक दायित्व से जी चुराता है। यही वजह है कि जब छोटी छोटी चीजें उग्र जनसमर्थन पाकर विकराल रूप धारण कर लेती हैं, तो हमारा प्रशासन भी उसे मॉब लिंचिंग बताकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। इसलिए जब तक यह लोकतंत्र जनप्रतिनिधिक, प्रशासनिक, न्यायिक और मीडिया की जवाबदेही को सुनिश्चित नहीं करेगा, हरेक प्रकरण को निबटाने के लिए समयावधि सुनिश्चित नहीं करेगा, तबतक सुख-शांति भरे समाज को स्थापित करना मुश्किल है, जो कि भारत कहलाने की पहली शर्त समझी जाती है। 

दो टूक शब्दों में कहें तो घटना छोटी हो या बड़ी, उसे कभी भी राजनीतिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसे प्रशासनिक नजरिए से आंकना चाहिए। विधि व्यवस्था भंग होने के बाद सम्बन्धित घटना के दोषी कौन लोग हैं और उन्हें संरक्षण कौन लोग दे रहे हैं, इसकी स्पष्ट प्रशासनिक पड़ताल होनी चाहिए, और दोषियों व उनके प्रोत्साहकों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए, अन्यथा बदमाशी की प्रवृत्ति वाले लोगों के मनोबल बढ़ेंगे और वो देर सबेर सामाजिक अशांति के ही कारक बनेंगे।इसलिए सरकार को खुद सोचना चाहिए कि यहां पर प्रस्तुत नजरिए की पृष्ठभूमि में उसकी उपलब्धि क्या है, यदि नहीं है तो फिर क्यों नहीं है, यह यक्ष प्रश्न है! 

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की एक सराहनीय टिप्पणी आई है कि पत्रकार होना कानून तोड़ने के लिए लाइसेंस मिलना नहीं है। इसी के दृष्टिगत उसे जनप्रतिनिधियों या उनके शागिर्दों को भी यह सख्त सन्देश दे देना चाहिए कि राजनीतिक दलों के सदस्य होना या निर्वाचित जनप्रतिनिधिगण होना या उनसे जुड़ा होना, अपने सियासी विरोधियों को कुचलने का लाइसेंस नहीं है और ऐसे मामलों में सत्ता पक्ष के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करने के लिए विपक्ष के शासन के आने का इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि कानून अपना काम करेगा। वहीं, ऐसे विवादों में यदि कार्यपालिका से जुड़े लोगों की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो ऐसे लोगों को हमेशा के लिए उनके पद से बर्खास्त कर दिया जाएगा। इससे कम की कोई भी सजा नहीं होगी! 

अब सवाल है कि क्या संसद और विधानमंडल के सदस्यगण अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने वाले कानून बनाएंगे, और यदि नहीं तो क्या सर्वोच्च न्यायालय इस संदर्भ में उन्हें कोई स्पष्ट निर्देश देने में सक्षम है। यदि नहीं तो फिर ऐसी अंतहीन घटनाओं को रोकने के लिये रास्ता क्या बचता है? क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में आये दिन घट रहीं  अराजकतामय लोकतांत्रिक घटनाओं और उनसे प्रभावित घटनाओं में रोज ब रोज इजाफा हो रहा है। इसके समानांतर उत्तरप्रदेश का प्रशासन निरन्तर 6 वर्षों से यह प्रशासनिक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है कि यदि प्रशासनिक इच्छा शक्ति मजबूत हो तो इस देश में कुछ भी मुश्किल नहीं है। 

मेरा मानना है कि यदि किसी राज्य में राजनीतिक, सामाजिक या चुनावी हिंसा होती है तो वहां पर राष्ट्रपति शासन लागू करना केंद्र का प्राथमिक कर्तव्य है। इसकी न्यायिक समीक्षा की प्रवृति लोकतंत्र के लिए खतरानाक है और यदि न्यायालय ऐसा करता है तो उसे परवर्ती सभी हिंसाओं को रोकने की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। मसलन, राष्ट्रपति शासन के मामलों में हाल के दशकों में दिखाई दिए न्यायालय के रुख से भले ही राष्ट्रपति शासन लगाने की प्रवृति थम गई हो, लेकिन किसी भी राज्य में निरंतर हत्या व जनसंघर्ष की घटनाओं के बावजूद राज्य सरकारों को निरंकुश बने रहने की छूट देना केंद्र सरकार की काबिलियत और न्यायिक दूरदर्शिता दोनों को सन्देश के कठघरे में खड़ा करता है। 

ऐसा इसलिए कि हमारा अंतिम लक्ष्य शांति व सुरक्षा होनी चाहिए, चाहे वह जैसे भी स्थापित हो! इसमें विलम्ब प्रशासनिक व न्यायिक अयोग्यता प्रदर्शित करता है। मौजूदा परिवेश में हमें यह साबित करना होगा कि हम इस देश पर शासन करने के काबिल हैं भी या नहीं, क्योंकि भारतीय संविधान की आड़ लेकर जिस आत्मघाती जातीय व साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह प्रलयंकरकारी है। यह सरकार की काबिलियत को कठघरे में खड़ा करता है। जब आमलोगों के दमन पर उठते सवालों की अनुगूंज बहुत दूर तक सुनाई दे और कार्रवाई नदारत, तो फिर आप समझ सकते हैं कि समकालीन लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है! शायद उस दिशा की ओर जो हमने अफगानिस्तान में हाल के वर्षों में देखा-सुना-समझा है। इसे रोक सकते हैं तो रोक लीजिए, अन्यथा इतिहास खुद को दोहराएगा ही।

यह ठीक है कि सर्वोत्तम न्यायालय ने केंद्र सरकार और मणिपुर सरकार को तुरंत सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि "वीडियो देखकर हम बहुत व्यथित हैं। मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि सरकार वाकई में आगे आये और कार्रवाई करे, क्योंकि जो हो रहा है वह पूरी तरह अस्वीकार्य है। हम सरकार को कार्रवाई के लिए समय देंगे, इसके बाद जमीनी स्तर पर कुछ नहीं किया जाता है तो फिर हम कार्रवाई करेंगे।" 

देखा जाए तो उनका यह स्टैंड वक्त का तकाजा है, लेकिन यदि वह दो कदम आगे बढ़कर बीते 75 साल के चर्चित जनउत्पीडन और उसके दृष्टिगत प्रशासनिक व सियासी भूमिका की जांच करने के लिए कोई एसआईटी गठित करते हैं, तो इतना निश्चित है कि भविष्य की प्रशासनिक व सियासी भूमिका को नियंत्रित किया जा सकता है, जो इन दिनों बेलगाम होती प्रतीत हो रही है। समकालीन लोकतंत्र में न्यायालय का डर/खौंफ सबमें है, बस इसे सकारात्मक रूप से जनहित में सदुपयोग करने/करवाने की जरुरत है। इसलिए हमने भी अपनी बात बेबाकी पूर्वक यहां रखी है, ताकि स्पष्ट जनमत कायम हो, सरकार पर सच्चा दबाव बढ़े।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार और स्तम्भकार

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