राजस्थान में कांग्रेस ने चिंतन शिविर तो कर लिया मगर राज्य में पार्टी की चिंताएं नहीं दूर हुईं

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25 सितंबर को जयपुर में आयोजित विधायक दल की बैठक का कुछ विधायकों द्वारा बहिष्कार करने के बाद से ही राजस्थान कांग्रेस में बिखराव की सी स्थिति बनी हुई है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है।

कांग्रेस पार्टी ने उदयपुर में आयोजित अपने चौथे चिंतन शिविर में पार्टी के गिरते जनाधार को रोकने व पार्टी की नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव के लिए कई अहम प्रस्ताव पारित किए थे। जिसके लिए चिंतन शिविर में उपस्थित सभी बड़े नेताओं ने एक सुर में समर्थन करते हुए उन्हें सख्ती से लागू करने की बात कही थी। कांग्रेस के चिंतन शिविर को संपन्न हुए कई महीने बीत चुके हैं। मगर फिर भी वहां लिए गए कई प्रस्तावों पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है। राजस्थान कांग्रेस कमेटी चिंतन शिविर की आयोजक थी। मगर राजस्थान में ही उस शिविर में लिए गए प्रस्तावों पर अमल नहीं हो पा रहा है।

उदयपुर चिंतन शिविर में सबसे मुख्य प्रस्ताव एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत का लिया गया था। जिसमें तय किया गया था कि गांधी परिवार को छोड़कर बाकी पार्टी के सभी नेताओं पर एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत लागू होगा तथा सभी नेताओं को पार्टी के इस सिद्धांत को मानना होगा। मगर राजस्थान में एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत की पालना आज तक नहीं हो पाई है। राजस्थान कांग्रेस में बहुत से ऐसे बड़े नेता हैं जो एक से अधिक पदों पर काबिज हैं। मगर उन्हें किसी ने भी दूसरे पद से नहीं हटाया है। एक से अधिक पदों पर रहने वाले नेताओं का पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध भी किया जा रहा है। मगर उनके विरोध का कोई असर नहीं हो पा रहा है। पार्टी नियमों के विपरीत एक व्यक्ति द्वारा एक से अधिक पद पर रहने से दूसरे कार्यकर्ताओं में निराशा व्याप्त होती है। जमीनी स्तर पर काम करने वालों वाले कार्यकर्ताओं को लगता है कि पार्टी में कई नेताओं को तो दो पदों पर बैठा दिया गया है। वहीं उन जैसे आम कार्यकर्ताओं को एक पद भी नसीब नहीं हो पाया है। ऐसा भेदभाव क्यों किया जाता है?

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25 सितंबर को जयपुर में आयोजित विधायक दल की बैठक का कुछ विधायकों द्वारा बहिष्कार करने के बाद से ही राजस्थान कांग्रेस में बिखराव की सी स्थिति बनी हुई है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है। दोनों ही नेताओं के समर्थक एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे हैं। राजस्थान में पार्टी नेताओं की बढ़ती आपसी गुटबाजी व बयानबाजी को रोकने के लिए पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक एडवाइजरी भी जारी की थी। जिसमें सभी नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ किसी भी तरह की बयानबाजी नहीं करने की हिदायत दी गई थी। मगर उस एडवाइजरी का भी पालन नहीं हो रहा है।

गहलोत सरकार में राज्य मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा खुलकर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि चार साल का समय बीत चुका है और यदि अभी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के विधायकों की संख्या दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाएगी। विधायक दिव्या मदेरणा ने भी गुढ़ा की बात का समर्थन करते हुए कहा कि प्रदेश में अफसरशाही इतनी हावी हो गई है कि विधायकों व मंत्रियों तक की बात नहीं सुनी जाती है। ऐसे में आम कांग्रेस जन का तो हाल ही बेहाल है।

विभागीय सचिवों की गोपनीय रिपोर्ट लिखने को लेकर भी खाद्य एवं रसद मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने अपनी ही सरकार की खिंचाई की है। खाचरियावास का कहना है कि विभागीय सचिवों की रिपोर्ट लिखने का अधिकार जब तक मंत्रियों के पास नहीं होगा तब तक मंत्रियों द्वारा अधिकारियों की नकेल नहीं कसी जा सकेगी। खाचरियावास के बयान पर जलदाय मंत्री महेश जोशी ने पलटवार करते हुए कहा कि मैं तो अपने विभाग के अधिकारियों की रिपोर्ट भरता हूं और राजस्थान में अन्य मंत्री भी भरते हैं। इस बात को लेकर खाचरियावास व जोशी में खुलकर बयानबाजी भी हो चुकी है।

उदयपुर के चिंतन शिविर में कांग्रेस ने एक व्यक्ति एक पद का संकल्प लिया था। इसी के तहत मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस के अध्यक्ष के लिये नामांकन के बाद राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। मगर राजस्थान में अब भी कई नेता हैं जो एक से ज्यादा महत्वपूर्ण पदों पर हैं। इनमें कैबिनेट मंत्री शांति धारीवाल, महेश जोशी और गोविंद राम मेघवाल समेत कई बड़े नाम शामिल हैं। इस सूची में गहलोत और पायलट, दोनों गुट के नेता शामिल हैं।

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शांति धारीवाल की गिनती राजस्थान सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में होती है। वे गहलोत के सबसे करीबी हैं और विधानसभा में सरकार की पूरी रणनीति बनाते हैं। वे नगरीय विकास के साथ संसदीय कार्य मंत्री हैं। इसके अलावा वे हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन भी बने हुये हैं। जिस पर किसी अन्य पार्टी नेता को नियुक्त किया जा सकता है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के एक और करीबी कैबिनेट मंत्री महेश जोशी 2020 में पायलट गुट की बगावत के दौरान गहलोत के समर्थन में काफी सक्रिय थे। सरकार में वे मुख्य सचेतक थे। पिछले साल उन्हें मंत्रिमंडल विस्तार में कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया था। फिलहाल उनके पास दोनों पद हैं। आपदा प्रबंधन मंत्री गोविंद राम मेघवाल बीकानेर के खाजूवाला से विधायक हैं और दलित चेहरे के रूप में सरकार में शामिल हैं। मेघवाल प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद पर भी बने हुये हैं।

जल संसाधन और योजना विभाग के कैबिनेट मंत्री महेंद्रजीत मालवीय प्रदेश कांग्रेस कमेटी में उपाध्यक्ष भी हैं। रामलाल जाट के पास राजस्व जैसा महत्वपूर्ण विभाग है। जाट कैबिनेट मंत्री होने के साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष भी हैं। फतेहपुर के विधायक हाकम अली खान प्रदेश कांग्रेस कमेटी महासचिव हैं। अब उन्हें वक्फ विकास परिषद का चेयरमैन भी बनाया गया है। धीरज गुर्जर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सचिव व उत्तर प्रदेश के सह-प्रभारी हैं। इसके साथ ही उन्हें राजस्थान में स्टेट सीड्स कॉरपोरेशन लिमिटेड का चेयरमैन भी बनाया गया हैं। रेहाना रियाज लम्बे समय से प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। इस साल हुई राजनीतिक नियुक्तियों में उन्हें महिला आयोग का चेयरमैन भी बनाया गया। पायलट गुट के विधायक जीआर खटाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव हैं। खटाणा को राजनीतिक नियुक्तियों में भवन एवं अन्य सार्वजनिक निर्माण समिति का चेयरमैन बनाया गया था।

राजस्थान में 25 सितम्बर को पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में हुई विधायकों की बगावत के बाद महासचिव अजय माकन ने मीडिया में कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट को लेकर बयान दिया था। माकन ने कहा था कि अगर कोई अध्यक्ष बनने जा रहा है तो उसे अध्यक्ष बनने से पहले ही दूसरे पद से इस्तीफा देना होगा। क्योंकि अध्यक्ष बनने के बाद अगर वही अपने सरकारी पद के लिए निर्णय करता है तो कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट हो सकता है। यही वजह रही कि मल्लिकार्जुन खड़गे ने नामांकन के तुरंत बाद राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया।

प्रदेश में पिछले साल नवंबर में कांग्रेस के एक पद एक व्यक्ति के फॉर्मूले के तहत ही तीन नेताओं को मंत्री पद से हटना पड़ा था। इन तीनों नेताओं को तीन अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी दी गई थी। इनमें डॉ. रघु शर्मा चिकित्सा मंत्री थे, जिन्हें गुजरात कांग्रेस का प्रभारी बनाने के बाद मंत्री पद से हटाया गया। वहीं गोविंद सिंह डोटासरा ने राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद शिक्षा मंत्री का पद छोड़ा था। जबकि हरीश चौधरी को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के बाद राजस्व मंत्री पद से हटाया गया था।

-रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

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