Film Dhurandhar में दिखाये गये Lyari शहर में अब कैसे हालात हैं? क्या अब भी वहां पहले जैसी गैंगवार होती है?

ल्यारी का वह दौर याद कीजिए जब हर गली मौत का रास्ता लगती थी। रहमान डकैत, उजैर बलोच और अर्शद पप्पू जैसे नाम किसी कहानी के किरदार नहीं थे, बल्कि उस इलाके के असली हुक्मरान थे। वहां कानून का राज नहीं था, बंदूक का राज था।
पाकिस्तानी शहर कराची का ल्यारी इलाका फिल्म धुरंधर के बाद से सबकी जुबान पर है। फिल्म धुरंधर के दोनों भागों में हालांकि इस इलाके में होने वाली आपराधिक और आतंकी गतिविधियों के बारे में विस्तार से बताया गया है लेकिन सवाल यह है कि अब वहां के हालात क्या हैं। सवाल उठता है कि क्या ल्यारी में अपराध और आतंकवाद का वह अंधेरा खत्म हो गया है, या अब भी जिंदा है? हम आपको बता दें कि ल्यारी कभी एक जिंदा जख्म था जख्म जिसमें खून, डर और सत्ता के गंदे खेल की परतें एक के ऊपर एक जमती चली गईं। जिस पर बनी फिल्म ने लोगों को चौंकाया, लेकिन असलियत उससे कहीं ज्यादा काली, ज्यादा बेरहम और ज्यादा खतरनाक रही है।
ल्यारी का वह दौर याद कीजिए जब हर गली मौत का रास्ता लगती थी। रहमान डकैत, उजैर बलोच और अर्शद पप्पू जैसे नाम किसी कहानी के किरदार नहीं थे, बल्कि उस इलाके के असली हुक्मरान थे। वहां कानून का राज नहीं था, बंदूक का राज था। दिनदहाड़े हत्याएं होती थीं, लोगों को उठा लिया जाता था, नशे का कारोबार खुलकर चलता था और हर छोटे बड़े व्यापारी से रंगदारी वसूली जाती थी।
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यह सिर्फ अपराध नहीं था, यह एक समानांतर सत्ता थी। गैंग सिर्फ डर नहीं फैलाते थे, वह चुनाव जितवाते थे, इलाकों की सीमाएं तय करते थे और अपनी अदालत चलाते थे। पूरा शहर इस जहर से प्रभावित था और ल्यारी उसका सबसे खतरनाक केंद्र बन चुका था। जब हालात हद से ज्यादा बिगड़ गए तो सरकार को मजबूरन सख्त कार्रवाई करनी पड़ी। बड़े स्तर पर अभियान चला, गैंगों के ठिकाने तोड़े गए, कई बड़े नाम या तो मारे गए या सलाखों के पीछे पहुंचे। धीरे धीरे वह खुला गैंग युद्ध खत्म होने लगा जिसने कराची को सालों तक खून में डुबोए रखा था। लेकिन यहां कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
आज का ल्यारी बाहर से शांत दिखता है। पहले जैसी गोलियों की गूंज अब सुनाई नहीं देती। सड़कों पर पहले जैसा खुला आतंक नहीं है। यह देखकर कोई भी कह सकता है कि हालात सुधर गए हैं। मगर यह सिर्फ सतह है। अंदर का सच अब भी सुलग रहा है। अपराध खत्म नहीं हुआ, उसने बस अपना तरीका बदल लिया है। पहले रंगदारी खुलेआम ली जाती थी, अब फोन और संदेश के जरिए मांगी जाती है। पहले गैंग सरगना सड़कों पर दिखते थे, अब वे दूर बैठकर अपने नेटवर्क चलाते हैं। छोटे छोटे गिरोह अब भी सक्रिय हैं और मौके मिलते ही टकराव भी होता है। यानी गोली की आवाज कम हुई है, लेकिन अपराध की सांस अब भी चल रही है।
अगर अपराध के स्तर को साफ शब्दों में समझें तो बड़ा गैंग युद्ध लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन छोटे स्तर का अपराध अभी भी जिंदा है। रंगदारी, स्थानीय झगड़े और छोटे गैंग संघर्ष अब भी होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह सब पहले जितना खुला और बेकाबू नहीं है। सबसे खतरनाक बदलाव यह है कि अपराध अब सड़कों से उठकर सिस्टम के अंदर घुस चुका है। पहले अपराधी दिखते थे, अब वह छिपे हुए हैं। पहले डर सामने होता था, अब वह अदृश्य है। यही इसे और ज्यादा खतरनाक बनाता है, क्योंकि जब दुश्मन नजर ही न आए तो उससे लड़ना और मुश्किल हो जाता है।
इस पूरी तस्वीर में सबसे अहम और दुखद पहलू है गरीबी और उपेक्षा। ल्यारी आज भी कराची के सबसे गरीब इलाकों में गिना जाता है। तंग गलियां, जर्जर मकान, कमजोर ढांचा और सीमित सुविधाएं, यह सब वहां की रोजमर्रा की हकीकत है। जब किसी जगह पर शिक्षा कमजोर हो, रोजगार के अवसर ना हों और लोगों का व्यवस्था पर भरोसा टूट चुका हो, तो अपराध खत्म नहीं होता, वह बस छिप जाता है और सही मौके का इंतजार करता है। यही वजह है कि ल्यारी को समझना हो तो सिर्फ उसकी शांति को मत देखिए, उसके अतीत और उसकी जड़ों को देखिए।
आज का ल्यारी वैसा नरक नहीं रहा जैसा एक दशक पहले था, लेकिन यह कोई आदर्श जगह भी नहीं बना है। यह एक ऐसा इलाका है जो अपने अतीत के बोझ के साथ जी रहा है, जहां अपराध दबा हुआ है और जहां भविष्य अभी भी अनिश्चित है। अगर सख्ती कम हुई, अगर हालात पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वही गैंग, वही खून और वही दहशत फिर लौट सकती है। बहरहाल, ल्यारी की कहानी खत्म नहीं हुई है। वह बस थोड़ी देर के लिए शांत हुई है, जैसे तूफान से पहले का सन्नाटा।
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