क्या है वह रोशनी एक्ट जिसके तहत करोड़ों के जमीन घोटाले को अंजाम दिया गया

  •  ललित गर्ग
  •  नवंबर 28, 2020   13:29
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क्या है वह रोशनी एक्ट जिसके तहत करोड़ों के जमीन घोटाले को अंजाम दिया गया

अब केन्द्र शासित जम्मू-कश्मीर में यह उम्मीद जगी है कि न्यायपालिका के दबाव में सरकारी जमीन पर हुए इन अवैध कब्जों को हटाया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सीबीआई जांच में और परतें खुलेंगी और लाभार्थियों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा।

जम्मू-कश्मीर के आजादी के बाद के राजनीतिक जीवन एवं शासन-व्यवस्था में कितने ही भ्रष्टाचार, घोटाले, गैरकानूनी कृत्य एवं आर्थिक अपराध परिव्याप्त रहे हैं। अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद एवं वहां स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया को अग्रसर करते हुए अब इनकी परतें उघड़ रही हैं। एक बड़ा घोटाला जम्मू-कश्मीर में रोशनी एक्ट की आड़ में 25 हजार करोड़ का सामने आया है। असल में नाम से यह एक विद्युत से जुड़ा घोटाला प्रतीत होता है, लेकिन यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति एवं शासन-व्यवस्था की अंधेरगर्दी से जुड़ा सबसे बड़ा जमीन घोटाला है। आजादी के बाद से राजनैतिक एवं सामाजिक स्वार्थों ने कश्मीर के इतिहास एवं संस्कृति को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया है, भ्रष्ट, विघटनकारी एवं आतंकवादी संस्कृति को एक षड्यंत्र के तहत पनपाया गया। लेकिन अपनी मूल संस्कृति को रौंद कर किसी भी अपसंस्कृति को बड़ा नहीं किया जा सकता। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कश्मीर के जीवन के हर पक्ष पर हावी हो रही अराजकता, स्वार्थ की राजनीति, आतंक की कालिमा को हटाया जा रहा है ताकि इस प्रांत के चरित्र के लिए खतरा बने नासूरों को खत्म किया जा सके, आदर्श शासन व्यवस्था स्थापित हो सके।

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जम्मू-कश्मीर के इस सबसे बड़े घोटालों में सीबीआई जांच के दौरान कई बड़े नेताओं, अफसरों और व्यापारियों के नाम सामने आए हैं। जिनमें पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू, पूर्व गृह मंत्री सज्जाद किचलू, पूर्व मंत्री अब्दुल मजीद वानी और असलम गोनी, नेशनल कांग्रेस के नेता सईद आखून और पूर्व बैंक चेयरमैन एमवाई खान के नाम प्रमुख हैं। जम्मू-कश्मीर की लगभग 21 लाख कनाल भूमि पर लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था। तत्कालीन सरकारों ने अवैध कब्जे हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए कानून बना दिया जिसे रोशनी एक्ट या रोशनी स्कीम का नाम दिया गया। मगर एक्ट का फायदा उठा कर राजनेताओं, नौकरशाहों और व्यावसायियों ने सरकारी और वन भूमि की बंदरबांट की। अब केन्द्र शासित जम्मू-कश्मीर में यह उम्मीद जगी है कि न्यायपालिका के दबाव में सरकारी जमीन पर हुए इन अवैध कब्जों को हटाया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सीबीआई जांच में और परतें खुलेंगी और लाभार्थियों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा।

जम्मू-कश्मीर की राजनीति का चरित्र कई प्रकार के अराष्ट्रीय दबावों से प्रभावित रहा है, जिसमें आर्थिक अपराधों की जमीन को मजबूती देने के साथ आतंकवाद को पोषण दिया जाता रहा है। विडम्बना तो यह है कि इस प्रांत एवं प्रांत की जनता को राजनेता अपने आर्थिक लाभों-स्वार्थों के लिये लगातार हिंसा, अराजकता एवं आतंकवाद की आग में झोंकते रहे हैं, जिसमें प्रांत की सरकार को केन्द्र की सरकार से संरक्षण एवं आर्थिक सहायता भी मिलती रही है। अब अगर जम्मू-काश्मीर में चरित्र निर्माण, विकास, शांति और अमन का कहीं कोई प्रयत्न हो रहा है, आवाज उठ रही है तो इन भ्रष्ट राजनेताओं को लगता है यह कोई विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुसाया जा रहा है। जिस मर्यादा, सद्चरित्र और सत्य आचरण पर हमारा राष्ट्रीय चरित्र एवं संस्कृति जीती रही है, सामाजिक व्यवस्था बनी रही है, जीवन व्यवहार चलता रहा है वे इस प्रांत में जानबूझकर लुप्त किये गये। उस वस्त्र को जो इस प्रांत के अस्तित्व एवं अस्मिता एवं शांतिपूर्ण जीवन को ढंके हुए था, कुछ तथाकथित राजनेताओं एवं घृणित राजनीति ने उसको उतार कर खूंटी पर टांग दिया। मानो वह पुरखों की चीज थी, जो अब इस प्रांत के भ्रष्ट एवं अराष्ट्रीय नेताओं के लाभ एवं स्वार्थ की सबसे बड़ी बाधा बन गयी। इस बड़े घोटाले की परतें खुलने से जम्मू-कश्मीर का भाग्यविधाता मानने वाले भ्रष्ट राजनेताओं की नींद उड़ गयी है। नींद तो उनकी अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद से ही उड़ी हुई है। तभी तो नेशनल कांफ्रैंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और अन्य नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं और उन्होंने कश्मीरियों के अधिकारों के लिए लड़ने और अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए गुपकर संगठन भी बना लिया है। इन राजनेताओं की बौखलाहट इतनी अधिक उग्र है कि फारूक अब्दुल्ला अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए चीन की मदद लेने की बात करते हैं तो महबूबा तिरंगे का अपमान करती हैं। इस तरह की अराष्ट्रीय घटनाओं एवं विसंगतिपूर्ण बयानों से न केवल प्रांत बल्कि समूचे राष्ट्र का चिंतित होना स्वाभाविक है।

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जम्मू-कश्मीर के फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, गुलाम नबी जैसे नेताओं ने प्रांत के धन को जितना अधिक अपने लिए निचोड़ा जा सके, निचोड़ लिया। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार इन्हें पीड़ा नहीं देता था। सबने अपने-अपने निजी सिद्धांत बना रखे थे, भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी थी। इस तरह की ओछी एवं स्वार्थ की राजनीति करने वाले प्रांत एवं समाज के उत्थान के लिए काम नहीं करते बल्कि उनके सामने बहुत संकीर्ण मंजिल थी सत्ता पाने एवं धन कमाने की। ऐसी रणनीति अपनाना ही उनके लिये सर्वोपरि था, जो उन्हें बार-बार सत्ता दिलवा सके। नोट एवं वोट की राजनीति और सही रूप में सामाजिक उत्थान की नीति, दोनों विपरीत ध्रुव हैं। एक राष्ट्र को संगठित करती है, दूसरी विघटित। लेकिन इन नेताओं ने दूसरी नीति पर चलते हुए न केवल कश्मीर को लूटा, घोटाले किये, प्रांत को कंकाल किया, बल्कि हिंसा-आतंकवाद के दंश दिये।

अनुच्छेद 370 के चलते आज तक केन्द्र की सरकारों ने जम्मू-कश्मीर में इतना धन बहाया है कि उसका कोई हिसाब-किताब नहीं। प्रांत के तथाकथित नेताओं एवं अलगाववादियों ने सरकारी धन एवं पाकिस्तान और खाड़ी देशों से मिले धन से देश-विदेश में अकूत सम्पत्तियां बना लीं, जबकि कश्मीरी बच्चों के हाथों में पत्थर और हथियार पकड़वा दिए, उनकी मुस्कान छीन ली, विकास के रास्ते अवरूद्ध कर दिये। गरीबों के घर रोशन करने के नाम पर बनाए गए कानून की आड़ लेकर करोड़ों की सरकारी जमीन हड़प ली। शांति की वादी एवं उपजाऊ भूमि को बंजर एवं अशांत कर दिया। जबसे जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, इनकी दुकानें बंद होने से ये अराजकता एवं अलोकतांत्रिक घटनाओं पर उतर आये हैं, अभी तो एक रोशनी घोटाला उजागर होने पर इनकी यह बौखलाहट है, आगे अभी बहुत से कारनामे खुलेंगे।

जम्मू-कश्मीर देश का शायद एक मात्र ऐसा राज्य होगा जहां सरकारी जमीन पर धड़ल्ले से राजनीतिक संरक्षण में बड़े पैमाने पर कब्जे हुए हैं। सरकारों ने अवैध कब्जे हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001 बनाया। इसके तहत सरकारी जमीनों पर गैर कानूनी कब्जों को कानूनी तौर पर मालिकाना हक देने का षड्यंत्र हुआ। यह स्कीम 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने लाते समय कहा कि जमीनों के कब्जों को कानूनी किए जाने से जो फंड जुटेगा, उससे राज्य में पावर प्रोजैक्टों का काम किया जाएगा, इसलिए इस कानून का नाम रोशनी रखा गया जो मार्च 2002 से लागू हुआ। एक एकड़ में 8 कनाल होते हैं और इस लिहाज से ढाई लाख एकड़ से ज्यादा अवैध कब्जे वाली जमीन हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई। भ्रष्टता की चरम पराकाष्ठा एवं अंधेरगर्दी यह थी कि इस सरकारी भूमि को बाजार मूल्य के सिर्फ 20 प्रतिशत मूल्य पर सरकार ने कब्जेदारों को सौंपी।

अब्दुल्ला सरकार ने ही इस बड़े भूमि घोटाले की मलाई नहीं खाई बल्कि 2005 में सत्ता में आई मुफ्ती सरकार और उसके बाद गुलाम नबी आजाद सरकार ने खूब जमकर अपनी जेबें भरीं। इन लोगों ने रोशनी एक्ट का फायदा उठाते हुए अपने खुद के नाम या रिश्तेदारों के नाम जमीन कब्जा ली। इस घोटाले की गहराई का अंदाजा इस बात से लगता है कि श्रीनगर शहर के बीचोंबीच खिदमत ट्रस्ट के नाम से कांग्रेस के पास कीमती जमीन का मालिकाना हक पहुंचा तो नेशनल कांफ्रैंस का भव्य मुख्यालय तक ऐसी ही जमीन पर बना हुआ है, जो इस भूमि घोटाले से तकरीबन मुफ्त के दाम हथियाई गई। जब सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए तो उनकी अगुवाई वाली राज्य प्रशासनिक परिषद ने रोशनी एक्ट को रद्द कर दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस एक्ट की आड़ में जम्मू-कश्मीर से पलायन कर गए कश्मीरी पंडितों के खाली पड़े मकानों और दुकानों को भी हड़पा गया। इस घोटाले में जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों के लोग शामिल रहे है, अब इनसे मुक्ति ही कश्मीर की वास्तविक फिजाएं लौटा पायेंगी।

-ललित गर्ग

पत्रकार, स्तंभकार, लेखक







प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का लोकतंत्र और मजबूत हुआ

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 22, 2021   11:24
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का लोकतंत्र और मजबूत हुआ

मूल्यों की राजनीति करने वालों के सम्मुख बड़ा संकट है। जबकि राजनीति को सत्ता का हथियार मानने वाले समाधान के लिए कदम उठाने में भय महसूस कर रहे हैं। डर है सत्ता से विमुख हो जाने का। पर यदि दायित्व से विमुखता की स्थिति बनी तो यह लोकतंत्र के लिये ज्यादा बड़ा खतरा है।

लोकतंत्र के रूप में दुनिया में सबसे अधिक सशक्त माने जाने वाले एवं सराहे जाने वाले अमेरिका के ताजा घटनाक्रम के बाद भारत के लोकतंत्र को दुनिया अचंभे की तरह देख रही है। बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत का लोकतंत्र सशक्त हो रहा है और तमाम बाधाओं के लोकतंत्र का अस्तित्व अक्षुण्ण दिखाई दे रहा है। देश की आम-जनता को प्रधानमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी पर भरोसा है और वह भारत के भाग्यविधाता के रूप में उभर कर ईमानदारी, सेवा, समर्पण भाव से राष्ट्र को सशक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। गत सात वर्षों में एक भी आरोप उन पर नहीं लग सका तो अब उनके देशहित के निर्णयों की छिछालेदार करने के प्रयास हो रहे हैं, फिर भी उनके नेतृत्व में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है।

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कोई किसी का भाग्य विधाता नहीं होता। कोई किसी का निर्माता नहीं होता। भारतीय संस्कृति के इस मूलमंत्र को समझने की शक्ति भले ही वर्तमान राजनीतिज्ञों में न हो, पर इस नासमझी से सत्य एवं लोकतंत्र की अस्मिता एवं अस्तित्व का अंत तो नहीं हो सकता। अंत तो उसका होता है जो सत्य का विरोधी है, अंत तो उसका होता है जो जनभावना के साथ विश्वासघात करता है, अंत तो उसका होता है जिसने राजनीतिक मर्यादाओं को लांघा है। जनमत एवं जन विश्वास तो दिव्य शक्ति है। उसका उपयोग आदर्शों, सिद्धांतों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए हो। तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। तभी होगा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान। तभी होगी अपनत्व और विश्वास की पुनः प्रतिष्ठा। वरना राजनीतिक मूल्यों की लक्ष्मण रेखा जिसने भी लांघी, वक्त के रावण ने उसे उठा लिया। कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा ही प्रतीत होता है।

भारत की राजनीति के उच्च शिखर पर नेतृत्व करने वाले अभी भी जीवनदानी, घर-द्वार छोड़ने वाले ऐसे राजनेता हैं, जिन पर भारत की जनता को भरोसा है। परन्तु एक कहावत है, ’अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।’ अन्यथा ऐसा ही चलता रहा तो भारत की राजनीति में समर्पित व जीवनदानी राजनेताओं का अकाल हो जायेगा। वैसे भी लोकतंत्र में सबका साथ-सबका विकास का दर्शन निहित है। कहा जाता है कि 'अच्छे लोग’ राजनीति में आयें। प्रश्न यह है कि ’अच्छे लोग’ की परिभाषा क्या है? योग्य, कर्मठ, ईमानदार, ’न खायेंगे न खाने देंगे’ के सिद्धान्तों पर चलने वाले, क्या इन्हें अच्छे लोग कहा जायेगा? लेकिन इनके पास धन-बल और बाहुबल नहीं होगा, फलतः वे चुनाव नहीं जीत सकेंगे। इसलिये वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इन्हें अयोग्य कहा जाने लगा है। तब फिर प्रश्न उठता है कि राजनीति की दशा व दिशा सुधरेगी कैसे ? लोकतंत्र में ईमानदारी का वर्चस्व कैसे स्थापित होगा ?

मूल्यों की राजनीति करने वालों के सम्मुख बड़ा संकट है। जबकि राजनीति को सत्ता का हथियार मानने वाले समाधान के लिए कदम उठाने में भय महसूस कर रहे हैं। डर है सत्ता से विमुख हो जाने का। पर यदि दायित्व से विमुखता की स्थिति बनी तो यह देश के लोकतंत्र के लिये ज्यादा बड़ा खतरा है। इसी तरह, हरेक सफल लोकतंत्र अपने नागरिकों से भी कुछ अपेक्षाएं रखता है। उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि संवाद के जरिए हरेक विवाद सुलझाएं जाएं, ताकि कानून-व्यवस्था के लिए कोई मसला न खड़ा हो और समाज के ताने-बाने को नुकसान न पहुंचे। भारत जैसे बहुलवादी देश में तो संवादों की अहमियत और अधिक है। फिर असहमति और मुखर विरोध किस कदर प्रभावी हो सकते हैं, किसान आन्दोलन इसका ताजा सुबूत है। मगर देश के रचनात्मक माहौल को ऐसे विवादों एवं आन्दोलनों से कोई नुकसान न पहुंचे, यह सुनिश्चित करना सरकार से अधिक विभिन्न राजनीतिक दलों, विचारधाराओं एवं नागरिक समाज की जिम्मेदारी है। एक खुले और विमर्शवादी देश-समाज में ही ऐसी संभावनाएं फल-फूल सकती हैं। उदारता किसी धर्म की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा संबल होती है, यह बात उससे बेजा लाभ उठाने की धृष्टता करने वालों और उसके रक्षकों, दोनों को समझने की जरूरत है।

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लोकतंत्र में अतिश्योक्तिपूर्ण विरोध और दमनचक्र जैसे उपाय किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। इस मौलिक सत्य व सिद्धांत की जानकारी से आज का राजनीतिक वर्ग अनभिज्ञ है। सत्ता के मोह ने, वोट के मोह ने शायद उनके विवेक का अपहरण कर लिया है। कहीं कोई स्वयं शेर पर सवार हो चुका है तो कहीं किसी नेवले ने सांप को पकड़ लिया है। न शेर पर से उतरते बनता है, न सांप को छोड़ते बनता है। धरती पुत्र, जन रक्षक, पिछड़ों के मसीहा और धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर का मुखौटा लगाने वाले आज जन विश्वास का हनन करने लगे हैं। जनादेश की परिभाषा अपनी सुविधानुसार करने लगे हैं। देश के राष्ट्रवादी, चिन्तनशील, ईमानदार आम जनमानस को एकजुट होना होगा। दूरदृष्टि के साथ भारत के भविष्य की चिन्ता करनी होगी। राजनीतिक क्षेत्र के नकारात्मक व सकारात्मक सोच का भेद समझना होगा। उन्माद, अविश्वास, राजनैतिक अनैतिकता, दमन एवं संदेह का वातावरण उत्पन्न हो गया है। उसे शीघ्र कोई दूर कर सकेगा, ऐसी सम्भावना दिखाई नहीं देती। ऐसी अनिश्चय और भय की स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए संकट की परिचायक है। जिनकी भरपाई मुश्किल है। भाईचारा, सद्भाव, निष्ठा, विश्वास, करुणा यानि कि जीवन मूल्य खो रहे हैं। मूल्य अक्षर नहीं होते, संस्कार होते हैं, आचरण होते हैं, इनसे ही लोकतंत्र सशक्त बनता है।

राजनीति गिरावट का ही परिणाम है कि भारत के साथ आजादी पाने वाले अनेक देश समृद्धि के उच्च शिखरों पर आरोहण कर रहे हैं जबकि भारत गरीबी उन्मूलन और आम आदमी को संपन्न बनाने की दिशा में अभी भी संघर्ष ही कर रहा है। राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और सरकार में महत्वपूर्ण पद संभालने वालों की गुणवत्ता को देखकर इसका स्पष्ट आभास होता है कि भारतीय लोकतंत्र के संचालन में व्यापक गिरावट आयी है। बताया जाता है कि देश में फिलहाल 36 प्रतिशत सांसद और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। पारिवारिक मिल्कियत जैसे राजनीतिक दल, धार्मिक हितों से जुड़े समूह, धनबल-बाहुबल और उत्तराधिकार की महत्ता खासी बढ़ गई है। यहां तक कि अगर कुछ विषय विशेषज्ञ पेशेवरों को भी सरकार में महत्वपूर्ण पद मिलते हैं तो अधिकांश मामलों में वे भी पद प्रदान करने वाली पार्टी के अहसान तले ही दबे रहते हैं और किसी वाजिब मसले पर एक राजनेता के रूप में अपनी आवाज बुलंद करने से हिचकते हैं। जबकि सरकार में होने का तकाजा ही यही होता है कि नेता एक राजनेता के रूप में उभरकर अधिक से अधिक लोगों की भलाई के लिए कदम उठाएं, न कि अपने राजनीतिक दल के हितों को पोषित करें।

अफसोस की बात यही है कि परिपक्व लोकतंत्रों में भी ईमानदार, चरित्र सम्पन्न एवं नैतिक राजनेताओं की प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। राजनीतिक दलों में संख्या-बल का बढ़ना एक सूत्री कार्यक्रम बन गया और गुणवत्ता-बल दोयम दर्जे पर हो गया है। राजनैतिक दल भी चुनाव जीतने का एक सूत्री कार्यक्रम बना चुके हैं जो उनकी मजबूरी भी है। चुनाव भी राजनीति का एक सक्रिय भाग है। विपक्ष में वे रहना ही नहीं चाहते और आदर्श विपक्ष की भूमिका का निर्वहन वे जानते ही नहीं हैं। सत्ता से पैसा तथा पैसे से सत्ता अर्जित करने का क्रम बन गया है और भ्रष्टाचार ने अपना विराट व विकृत स्वरूप बना लिया है। अहम बात तो यह है कि राजनीति में प्रवेश के पहले वे क्या थे और फिर क्या से क्या हो गये ? कितने ही राजनेता भ्रष्टाचार के कारण जेल जा चुके हैं, जो पकड़ा गया वो चोर है और जिसे नहीं पकड़ पा रहे हैं वे मौज कर रहे हैं, नीति-नियंता, भारत के भाग्य विधाता बने हैं।

-ललित गर्ग







तांडव मचा रहे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कानूनी लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है

  •  प्रो. सुधांशु त्रिपाठी
  •  जनवरी 21, 2021   13:31
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तांडव मचा रहे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कानूनी लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है

तांडव वेब सीरीज विवाद के वातावरण में एक प्रश्न साफ तौर पर उठता है कि हिंदु जाति या हिंदू धर्म को आहत करने से इस वेब निर्देशक अली अब्बास जफर या ऐसे कलाकारों या ऐसे अन्य मुसलमानों को तथा इसी प्रकार के कुछ अन्य लोगों को क्या मिलता है।

तांडव वेब सीरीज और अन्य कई ऐसी सीरीजों ने हिंदू धर्म की आस्था और धार्मिक भावनाओं को एक बार फिर जानबूझ कर चोट पहुंचायी है। इस सीरीज में भगवान शिवजी को एक अत्याधुनिक पुरूष के रूप में आड़ी तिरछी रेखाओं का चेहरा बनाये हुए दिखाया गया है जिसमें उनके मजाक उड़ाने की बात किसी से छिपी नहीं है। सभी जानते हैं कि भगवान शिवजी का स्थान हिंदू धर्म में स्वीकार किये गये एकमात्र पूर्ण, सर्वशक्तिमान, सर्वव्याप्त एवं अविनाशी ब्रह्म के तीन रूपों- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश या शिव में से एक तथा उन्हीं के समान सर्वोच्च एवं पवित्रतम है। हिंदू धर्म के अनुसार तीनों ईश्वर एक ही ब्रह्म के तीन रूप हैं जहाँ सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्माजी, पालनकर्ता विष्णुजी तथा संहारकर्ता शिवजी अनादि काल से स्थापित हैं। अतः भारत तथा संपूर्ण विश्व में रह रहे लाखों करोड़ों हिंदुओं की कालातीत आस्था के प्रतीक ऐसे सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान पूर्ण ब्रह्म को एक साधारण नाटकीय रूप में दिखाना निश्चय ही उनका मजाक उड़ाना तथा उन आस्थावान हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं पर गंभीर कुठाराघात करना नहीं है तो और क्या है। इसी प्रकार से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कई अन्य वेब सीरीज दिखाई जा रही हैं जिनमें अभद्रता और अश्लीलता का नंगा नाच दर्शकों को दिखाया जा रहा है जिनका लक्ष्य कहीं न कहीं हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक कर्मकाण्ड आदि का उपहास करना ही होता है।

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लगभग दो दशक पहले देश के एक तथाकथित प्रख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू धर्म के अनुसार विद्या एवं संगीत की देवी माँ सरस्वती का अभद्र चित्र दिखा कर हिंदू धर्म की भावनाओं को आहत किया था। उनके अन्य कुछ चित्रों में भी इसी प्रकार का हिंदू धर्म विरोधी विद्रूप चित्रण देखा गया था जिसका जनता ने पुरजोर विरोध किया था। जैसा देखा जा रहा है कि पिछले कई वर्षों से देश की फिल्म इंडस्ट्री और अन्य मीडिया जगत, जिसमें प्रिंट मीडिया भी शामिल है, इसी प्रकार फिल्मों के माध्यम से या मनोरंजनकारी कार्यक्रमों/ सीरीयल्स द्वारा हिंदू धर्म को नीचा दिखाने और हिंदुओं को अपमानित करने का कार्य करते आ रहे हैं। अभी कुछ महीने पहले रिलीज हुई फिल्म मिर्जापुर में भी एक ब्राह्मण को बहुत बुरा दिखाया गया है जबकि इसके विपरीत दूसरे मुसलमान को बहुत अच्छा प्रदर्शित किया गया है। ऐसा ही परिदृश्य पूर्व की कई फिल्मों में भी दिखाया गया था जहाँ एक मंदिर का हिंदू पुजारी बहुत भ्रष्ट और चरित्रहीन होता है जबकि वहीं एक मौलवी बेहद चरित्रवान और हर प्रकार से पाक साफ दिखलाया जाता है। वस्तुतः अच्छाई और बुराई सभी के अंदर होती है जोकि सामान्य मानव स्वभाव होता है और इसका किसी धर्म विशेष से कोई संबध नहीं है।  

ऐसे वातावरण में एक प्रश्न साफ तौर पर उठता है कि हिंदु जाति या हिंदू धर्म को आहत करने से इस वेब निर्देशक अली अब्बास जफर या ऐसे कलाकारों या ऐसे अन्य मुसलमानों को तथा इसी प्रकार के कुछ अन्य लोगों को क्या मिलता है। इन लोगों का हिंदुओं ने क्या नुकसान किया है जिस वजह से ये लोग हिंदू धर्म से नफरत करते हैं और हिंदुओं से बैर रखते हैं। सभी जानते हैं कि हिंदू बेहद शांत तथा सभी को गले लगाने में विश्वास करते हैं जिस कारण आक्रमणकारी तथा अशांत किस्म के लोग उन्हें कायर तथा अकर्मण्य कहते रहे हैं। निःसंदेह हिंदुओं के प्रति ऐसी धारणा देश और समाज के लिये विभाजनकारी है जो हिंदुओं में भी प्रतिक्रिया को बढ़ावा दे रही है। यद्यपि इस विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी है जिसके अनुसार इस वेब सीरीज को जानबूझ कर विवादित करना तथा इसके द्वारा दर्शकों में उत्सुकता बढ़ा कर ज्यादा से ज्यादा कमाई करना है तथा विरोध किये जाने पर एक लाईन की माफी मांग लेना है जैसा कि इस तांडव के विवाद में भी हुआ है क्योंकि ओटीटी पर प्रदर्शन के संबध में न कोई सेंसर बोर्ड का कैंची है न ही भारत सरकार का कोई दंडात्मक प्रावधान है जिससे ऐसे कार्यक्रमों के निर्माता, निर्देशक और कलाकार डरें और इस प्रकार के वैमनस्य को पैदा कर मुनाफा कमाने का घोर आपराधिक कृत्य कदापि न करें।

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अतः देश में ओटीटी पर ऐसे वेब सीरीजों के प्रदर्शन के संबंध में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्मित दिशा-निर्देशों एवं कठोर कानूनों की तत्काल आवश्यकता है जिससे कोई भी व्यक्ति या समुदाय इस प्रकार के अश्लील चित्रण या प्रदर्शन द्वारा किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात कदापि न कर सके, जिससे भारतीय समाज में अभद्रता फैले और सामाजिक सौहार्द को खतरा पैदा हो या फिर इन कारणों से अकारण ही अशांति का तांडव शुरू हो जाये तथा देश की सामाजिक संस्कृति को गंभीर चोट पहुँचे।

-प्रो. सुधांशु त्रिपाठी

आचार्य- राजनीति विज्ञान

उ0 प्र0 राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय

प्रयागराज, उ0प्र0।







जोखिम भरी होती जा रही हैं सड़कें, सुरक्षा के लिए सरकार को उठाने होंगे और सख्त कदम

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 20, 2021   13:11
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जोखिम भरी होती जा रही हैं सड़कें, सुरक्षा के लिए सरकार को उठाने होंगे और सख्त कदम

निःसंदेह बेहतर सड़कें समय की मांग हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे भीषण दुर्घटनाओं का गवाह बनती रहें। बेहतर हो कि हमारे नीति-नियंता यह समझें कि जानलेवा सड़क हादसे को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है।

भारत का सड़क यातायात तमाम विकास की उपलब्धियों एवं प्रयत्नों के असुरक्षित एवं जानलेवा बना हुआ है, सुविधा की खूनी एवं हादसे की सड़कें नित-नयी त्रासदियों की गवाह बन रही है। सड़क सुरक्षा माह के उद्घाटन कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की ओर से दी गई यह जानकारी हतप्रभ करने वाली है कि देश में प्रतिदिन करीब 415 लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाते हैं। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि एक वर्ष में यह संख्या कहां तक पहुंच जाती होगी? इसका कोई मतलब नहीं कि प्रति वर्ष लगभग डेढ़ लाख लोग सड़क हादसों में जान से हाथ धो बैठे। इन त्रासद आंकड़ों ने एक बार फिर यह सोचने को मजबूर कर दिया कि आधुनिक और बेहतरीन सुविधा की सड़कें केवल रफ्तार के लिहाज से जरूरी हैं या फिर उन पर सफर का सुरक्षित होना पहले सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हर सड़क दुर्घटना को केन्द्र एवं राज्य सरकारें दुर्भाग्यपूर्ण बताती हैं, उस पर दुख व्यक्त करती हैं, मुआवजे का ऐलान भी करती हैं लेकिन एक्सीडेंट रोकने के गंभीर उपाय अब तक क्यों नहीं किए जा सके हैं? जो भी हो, सवाल यह है कि इस तरह की तेज रफ्तार सड़कों पर लोगों की जिंदगी कब तक इतनी सस्ती बनी रहेगी? सच्चाई यह भी है कि पूरे देश में सड़क परिवहन भारी अराजकता का शिकार है। सबसे भ्रष्ट विभागों में परिवहन विभाग शुमार है।

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‘दुर्घटना’ एक ऐसा शब्द है जिसे पढ़ते ही कुछ दृश्य आंखों के सामने आ जाते हैं, जो भयावह होते हैं, त्रासद होते हैं, डरावने होते हैं, खूनी होते हैं। खूनी सड़कों में सबसे शीर्ष पर है यमुना एक्सप्रेस-वे। इस पर होने वाले जानलेवा सड़क हादसे कब थमेंगे? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि इस पर होने वाली दुर्घटनाओं और उनमें मरने एवं घायल होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यही नहीं, देश की अन्य सड़कें इसी तरह इंसानों को निगल रही हैं, मौत का ग्रास बना रही हैं। इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। सड़क दुर्घटनाओं में लोगों की मौत यही बताती है कि अपने देश की सड़कें कितनी अधिक जोखिम भरी हो गई हैं। बड़ा प्रश्न है कि फिर मार्ग दुर्घटनाओं को रोकने के उपाय क्यों नहीं किए जा रहे हैं? सच यह है कि बेलगाम वाहनों की वजह से सड़कें अब पूरी तरह असुरक्षित हो चुकी हैं। सड़क पर तेज गति से चलते वाहन एक तरह से हत्या के हथियार होते जा रहे हैं वहीं सुविधा की सड़कें खूनी मौतों की त्रासद गवाही बनती जा रही हैं।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय लोगों के सहयोग से वर्ष 2025 तक सड़क हादसों में 50 प्रतिशत की कमी लाना चाहता है, लेकिन यह काम केवल सड़क सुरक्षा माह के माध्यम से लोगों को जागरूक करने भर से होने वाला नहीं है। सड़क हादसों के प्रति लोगों को सजग करने का अपना एक महत्व है, लेकिन बात तो तब बनेगी जब मार्ग दुर्घटनाओं के मूल कारणों का निवारण करने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे। कुशल ड्राइवरों की कमी को देखते हुए ग्रामीण एवं पिछड़े इलाकों में ड्राइवर ट्रेनिंग स्कूल खोलने की तैयारी सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ करना होगा। हमारी ट्रैफिक पुलिस एवं उनकी जिम्मेदारियों से जुड़ी एक बड़ी विडम्बना है कि कोई भी ट्रैफिक पुलिस अधिकारी चालान काटने का काम तो बड़ा लगन एवं तन्मयता से करता है, उससे भी अधिक रिश्वत लेने का काम पूरी जिम्मेदारी से करता है, प्रधानमंत्रीजी के तमाम भ्रष्टाचार एवं रिश्वत विरोधी बयानों एवं संकल्पों के यह विभाग धड़ल्ले से रिश्वत वसूली करता है, लेकिन किसी भी अधिकारी ने यातायात के नियमों का उल्लघंन करने वालों को कोई प्रशिक्षण या सीख दी हो, नजर नहीं आता। यह स्थिति दुर्घटनाओं के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है।

जरूरत है सड़कों के किनारे अतिक्रमण को दूर करने की, आवारा पशुओं के प्रवेश एवं बेघड़क घुमने को भी रोकने की। दोनों ही स्थितियां सड़क हादसों का कारण बनती हैं, खासकर तब और भी जब ऐसे ठिकानों पर बस, ट्रक और अन्य वाहन खड़े कर दिए जाते हैं। यह ठीक नहीं कि ढाबे भारी वाहनों के लिए पार्किंग स्थल बन जाएं। यह भी समझने की जरूरत है कि सड़क किनारे बसे गांवों से होने वाला हर तरह का बेरोक-टोक आवागमन भी जोखिम बढ़ाने का काम करता है। इस स्थिति से हर कोई परिचित है, लेकिन ऐसे उपाय नहीं किए जा रहे, जिससे कम से कम राजमार्ग तो अतिक्रमण और बेतरतीब यातायात से बचे रहें। इसमें संदेह है कि उलटी दिशा में वाहन चलाने, लेन की परवाह न करने और मनचाहे तरीके से ओवरटेक करने जैसी समस्याओं का समाधान केवल सड़क जागरूकता अभियान चला कर किया जा सकता है। इन समस्याओं का समाधान तो तब होगा जब सुगम यातायात के लिए चौकसी बढ़ाई जाएगी और लापरवाही का परिचय देने अथवा जोखिम मोल लेने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, चालान काटना या नये-नये जुर्माने की व्यवस्था करने से सड़क दुर्घटनाएं रूकने वाली नहीं हैं। यह ठीक नहीं कि जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं का सिलसिला कायम रहने के बाद भी राजमार्गों पर सीसीटीवी और पुलिस की प्रभावी उपस्थिति नहीं दिखती।

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यह गंभीर चिंता का विषय और विडम्बनापूर्ण है कि हर रोज ऐसी दुर्घटनाओं और उनके भयावह नतीजों की खबरें आम होने के बावजूद बाकी वाहनों के मालिक या चालक, सरकार और परिवहन विभाग कोई सबक नहीं लेते। सड़क पर दौड़ती गाड़ी मामूली गलती से भी न केवल दूसरों की जान ले सकती है, बल्कि खुद चालक और उसमें बैठे लोगों की जिंदगी भी खत्म हो सकती है। पर लगता है कि सड़कों पर बेलगाम गाड़ी चलाना कुछ लोगों के लिए मौज-मस्ती एवं फैशन का मामला होता है लेकिन यह कैसी मौज-मस्ती या फैशन है जो कई जिन्दगियां तबाह कर देती है। ऐसी दुर्घटनाओं को लेकर आम आदमी में संवेदनहीनता की काली छाया का पसरना त्रासद है और इससे भी बड़ी त्रासदी सरकार की आंखों पर काली पट्टी का बंधना है। हर स्थिति में मनुष्य जीवन ही दांव पर लग रहा है। इन बढ़ती दुर्घटनाओं की नृशंस चुनौतियों का क्या अंत है? बहुत कठिन है दुर्घटनाओं की उफनती नदी में जीवनरूपी नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना, यह चुनौती सरकार के सम्मुख तो है ही, आम जनता भी इससे बच नहीं सकती।

निःसंदेह बेहतर सड़कें समय की मांग हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे भीषण दुर्घटनाओं का गवाह बनती रहें। बेहतर हो कि हमारे नीति-नियंता यह समझें कि जानलेवा सड़क हादसे को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट भी तल्ख टिप्पणी कर चुका है कि ड्राइविंग लाइसेंस किसी को मार डालने के लिए नहीं दिए जाते। सच्चाई यह भी हैं कि नियमों के उल्लंघन की एवज में पुलिस की पकड़ में आने वाले लोग बिना झिझक जुर्माना चुकाकर अपनी गलती के असर को खत्म हुआ मान लेते हैं। परिवहन नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है, केवल चालान काटना समस्या का समाधान नहीं है। देश में 30 प्रतिशत ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी हैं। परिवहन क्षेत्र में भारी भ्रष्टाचार है लिहाजा बसों का ढंग से मेनटेनेंस भी नहीं होता। इनमें बैठने वालों की जिंदगी दांव पर लगी होती है। देश भर में बसों के रख-रखाव, उनके परिचालन, ड्राइवरों की योग्यता और अन्य मामलों में एक-समान मानक लागू करने की जरूरत है, तभी देश के नागरिक एक राज्य से दूसरे राज्य में निश्चिंत होकर यात्रा कर सकेंगे।

सड़क हादसों में मरने वालों की बढ़ती संख्या ने आज मानो एक महामारी का रूप ले लिया है। इस बारे में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया के अट्ठाईस देशों में ही सड़क हादसों पर नियंत्रण की दृष्टि से बनाए गए कानूनों का कड़ाई से पालन होता है। इंसानों के जीवन पर मंडरा रहे सड़क हादसों के डरावने दृश्य एवं दुर्घटनाओं पर काबू पाने के लिये प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है। तेज रफ्तार से वाहन दौड़ाते वाले लोग सड़क के किनारे लगे बोर्ड़ पर लिखे वाक्य ‘दुर्घटना से देर भली’ पढ़ते जरूर हैं, किन्तु देर उन्हें मान्य नहीं है, दुर्घटना भले ही हो जाए।

-ललित गर्ग







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