विश्व जल-संकट में भूगर्भ जल संस्कृति का महत्व

विश्व जल-संकट में भूगर्भ जल संस्कृति का महत्व

राजस्थान में जल संचयन की परम्परागत विधियाँ उच्च स्तर की हैं, जो समूचे विश्व के लिये भूगर्भ जल संरक्षण एवं संवर्धन का माध्यम बन सकती है। इनके विकास में राज्य की धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रमुख योगदान है।

विश्व भूगर्भ जल दिवस 10 जून को मनाया जाता है, पीने योग्य पानी का मुख्य स्रोत भूगर्भ जल ही है, मगर अनियोजित औद्योगीकरण, बढ़ता प्रदूषण, घटते रेगिस्तान एवं ग्लेशियर, नदियों के जलस्तर में गिरावट, पर्यावरण विनाश, प्रकृति के शोषण और इनके दुरुपयोग के प्रति असंवेदनशीलता पूरे विश्व को एक बड़े जल संकट की ओर ले जा रही है। पैकेट और बोतल बन्द पानी आज विकास के प्रतीकचिह्न बनते जा रहे हैं और अपने संसाधनों के प्रति हमारी लापरवाही अपनी मूलभूत आवश्यकता को बाजारवाद के हवाले कर देने की राह आसान कर रही है। प्रतिवर्ष लोगों के बीच भूगर्भ जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये 10 जून को “विश्व भूगर्भ जल दिवस” मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व के सभी देशों में स्वच्छ एवं सुरक्षित जल की उपलब्धता सुनिश्चित करवाना है साथ ही जल संरक्षण के महत्व पर भी ध्यान केंद्रित करना है। आप सोच सकते हैं कि एक मनुष्य अपने जीवन काल में कितने पानी का उपयोग करता है, किंतु क्या वह इतने पानी को बचाने का प्रयास करता है?

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भारत में मानसून की अनियमितता के कारण सम्पूर्ण देश में कहीं-न-कहीं अनावृष्टि, अतिवृष्टि एवं आंशिक वृष्टि का खतरा बना रहता है। परन्तु राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में परम्परागत तरीकों से राज्य के निवासियों ने अपने क्षेत्र के अनुरूप जल भण्डारण के विभिन्न ढाँचों को बनाया है। ये पारम्परिक जल संग्रहण की प्रणालियाँ काल की कसौटी पर खरी उतरीं। ये प्रणालियाँ विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों के कारण अपने प्रभावशाली स्वरूप में उभरीं। साथ ही इनका विकास भी स्थानीय पर्यावरण के अनुसार हुआ है एवं इन्हीं के माध्यम से जल आपूर्ति संभव हो पाती है। इसलिये सम्पूर्ण भारत में राजस्थान की जल संचयन विधियाँ अपनी अलग एवं अनूठी विशेषता रखती हैं। इनके विकास में ऐतिहासिक तत्वों के साथ ही विविध भौगोलिक कारकों का प्रभाव भी है। वस्तुतः राजस्थान एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ वर्ष भर बहने वाली नदियाँ नहीं हैं। यहाँ पानी से सम्बन्धित समस्याएँ, अनियमित तथा कम वर्षा और नदियों में अपर्याप्त पानी को लेकर उत्पन्न होती हैं। यहाँ प्रकृति तथा संस्कृति एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। राजस्थान में भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। राजस्थान में पीने के पानी का 87 प्रतिशत हिस्सा भूजल से ही लिया जाता है। साथ ही सिंचाई में भी भूजल का उपयोग बहुत तेजी से बढ़ा है। राज्य के सिंचित क्षेत्र का 60 प्रतिशत हिस्सा भूजल से ही होता है। ऐसी स्थिति में भूजल का दोहन बहुत तेजी से हो रहा है। भूजल के संरक्षण के प्रति उदासीनता ने समस्या को गहराया है।

भूजल का दोहन पिछले 30 वर्षों मे बड़ी तेजी से बढ़ा है। उसमें किसी का भी दोष निकालना बड़ी नाइन्साफी है, क्योंकि तेजी से बढ़ते विकास और लोगों के जीवन स्तर से सभी चीजें प्रभावति होती हैं। इससे यह क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है एवं अन्धा-धुन्ध पानी का भी दोहन शुरू हो गया है। साथ ही सुविधाएं बढ़ने से आम आदमी का अपने मूलभूत उपयोगी जल संचय से ध्यान हट गया है एवं हर कोई इसके उपयोग में शामिल हो गया है। राजस्थान के भूजल की तस्वीर देखने से आदमी सिहर जाता है, क्योंकि राज्य के 203 ब्लाक डार्क जोन में आते हैं बाकी बचे हुए 30 ब्लाक सेफ जोन में हैं तथा 6 ब्लाक सेमी क्रिटिकल जोन में है। यदि इस तस्वीर को और गहराई के साथ देखेंगे ता पाएंगे कि ये 30 ब्लाक खारा है। आप राजस्थान के नक्शे पर देखेंगे तो सुरक्षित क्षेत्र उत्तर में गंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के ब्लॉक है जहां पर इन्दिरा गांधी कैनाल से सिंचाई की जाती है। दूसरी तरफ दक्षिण में बांसवाड़ा व डूंगरपुर जिले हैं जहां तीन बांधो के द्वारा सिंचाई की व्यवस्था है। इन चारों जिलों के कुल मिलाकर 22 ब्लाक सुरक्षित व एक ब्लाक अर्धसुरक्षित है। इसके बाद राजस्थान में सिर्फ 8 ब्लाक सुरक्षित क्षेत्र में आते हैं, ये प्रायः उस क्षेत्र में स्थित है जहां पानी खारा है या बहुत ही नीचे जलस्तर है। जैसे बाड़मेर।

राजस्थान देश का सबसे बड़ा सूखा प्रदेश है जहां वर्षा का औसत बहुत कम है। देश के औसत का लगभग आधा है, उस स्थिति में जब वर्षा बहुत कम होती है, क्षेत्र का तापमान भी काफी ज्यादा रहता है तो भूजल की स्थिति देखने के बाद केन्द्र सरकार व राजस्थान सरकार को सचेत हो जाना चाहिए तथा हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। हमें कुछ भी सुरक्षित करने से पहले राज्य में पानी की सुरक्षा के बारे में आम आदमी को उसके उपयोग तथा महत्व को समझाना बहुत जरूरी है। राजस्थान के भूजल को समझने के साथ राजस्थान में प्राकृतिक रिचार्ज को समझना भी उतना ही जरूरी है। जल का संकट एवं विकट स्थितियां अति प्राचीन समय से बनी हुई है। इसी कारण राजस्थान में स्थापत्य कला के प्रेमी राजा-महाराजाओं तथा सेठ-साहूकारों ने अपने पूर्वजों की स्मृति में अपने नाम को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से इस प्रदेश के विभिन्न भागों में कलात्मक बावड़ियों, कुओं, तालाबों, झालरों एवं कुंडों का निर्माण करवाया। राजस्थान में पानी के कई पारम्परिक स्रोत हैं, जैसे- नाड़ी, तालाब, जोहड़, बन्धा, सागर, समंद एवं सरोवर।

कुएँ पानी के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। राजस्थान में कई प्रकार के कुएँ पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त बावड़ी या झालरा भी है जिनको धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मेरा बचपन राजस्थान के नागौर जिले के लाडनूं में बीता, लाडनूं, सुजानगढ़, छापर, चाडवास, चूरु, बीकानेर जिले में भूगर्भ जल एवं वर्षा के जल को संरक्षित एवं सुरक्षित करने की परम्परा हर व्यक्ति एवं हर घर में देखने को मिलेगी, वहां के घरों में वर्षा के जल को संरक्षित करने के लिये हर घर में कुंए हैं, सभी घरों का निर्माण इस तरह किया गया है कि सम्पूर्ण वर्षा जल इन कुंओं में इकट्ठा किया जाता है। कई जगह इसको कुछ निकासी छिद्रों द्वारा नीचे गिरने दिया जाता है लेकिन अधिकांश भवनों में इसे पाइप के द्वारा भू-तल में बने कुंओं में उतारा जाता है।

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राजस्थान में जल संचयन की परम्परागत विधियाँ उच्च स्तर की हैं, जो समूचे विश्व के लिये भूगर्भ जल संरक्षण एवं संवर्धन का माध्यम बन सकती है। इनके विकास में राज्य की धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रमुख योगदान है। जहाँ प्रकृति एवं संस्कृति परस्पर एक दूसरे से समायोजित रही हैं। राजस्थान के किले तो वैसे ही प्रसिद्ध हैं पर इनका जल प्रबन्धन विशेष रूप से देखने योग्य है और अनुकरणीय भी हैं। जल संचयन की परम्परा वहाँ के सामाजिक ढाँचे से जुड़ी हुई हैं तथा जल के प्रति धार्मिक दृष्टिकोण के कारण ही प्राकृतिक जलस्रोतों को पूजा जाता है। यहाँ के स्थानीय लोगों ने पानी के कृत्रिम स्रोतों का निर्माण किया है। जिन्होंने पानी की प्रत्येक बूँद का व्यवस्थित उपयोग करने वाली लोक-कथाएँ एवं आस्थाएँ विकसित की हैं, साहित्य में भी जल संरक्षण की व्यापक चर्चा है, जिनके आधार पर ही प्राकृतिक जल का संचय करके कठिन परिस्थितियों वाले जीवन को सहज बनाया है। जल उचित प्रबन्धन हेतु पश्चिमी राजस्थान में आज भी सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पराती में चैकी रखकर उस पर बैठकर स्नान करते हैं जिससे शेष बचा पानी अन्य उपयोग में आ सके। तेरापंथ के एक श्रावक हुए हैं रूपचन्दजी, जिनके बारे में प्रचलित है कि वे 72 तोले जल से स्नान करते थे, यानी एक लोटा से भी कम।

उदयपुर में विश्व प्रसिद्ध झीलों में जयसमंद, उदयसागर, फतेहसागर, राजसमंद एवं पिछोला में काफी मात्रा में जल संचय होता रहता है। इन झीलों से सिंचाई के लिये जल का उपयोग होता है। इसके अतिरिक्त इनका पानी रिसकर बावड़ियों में भी पहुँचता है जहाँ से इसका प्रयोग पेयजल के रूप में करते हैं। कुएँ, बावड़ी व तालाबों की विरासत हमारे पुरखों ने हमें सौंपी है। अतः पुराने जलस्रोतों की सार-सम्भाल करना हमारा दायित्व है। वैज्ञानिक अब पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर पहले पानी की खोज को प्राथमिकता देते हैं। पानी के बिना जीवन जीवित ही नहीं रहेगा। इसी कारणवश अधिकांश संस्कृतियाँ नदी के किनारे विकसित हुई हैं। इस प्रकार ‘जल ही जीवन है’ का अर्थ सार्थक है। असाधारण आवश्यकता को पूरा करने के लिए, जलाशय सिकुड रहे हैं, जल विश्व की बड़ी एवं विकट समस्या है। इन बातों से साफ हो जाता है कि भूजल की स्थिति आने वाले वक्त में क्या होगी? इसे गम्भीरता से लेने की जरूरत है? इस दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय भूगर्भ जल दिवस पर व्यापक चिन्तन-मंथन होना चाहिए।

- ललित गर्ग







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