Gyan Ganga: सभी लोग मनु की संतानें हैं, जो ऐसा नहीं मानते वे आखिर किसकी संतान हैं?

Gyan Ganga: सभी लोग मनु की संतानें हैं, जो ऐसा नहीं मानते वे आखिर किसकी संतान हैं?

दिति नाम की जो पत्नी है, दैत्यों (असुरों) की माता है। एक बार कश्यप जी सूर्यास्त के समय संध्या वंदन कर रहे थे, उसी समय देवी दिति कश्यप के पास आईं और रति याचना की। कश्यप जी ने कहा— देखो, देवी ‘एषा घोर तमो बेला’।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥ 

प्रभासाक्षी के भागवत-कथा प्रेमियों ! पिछले अंक में हमने पढ़ा था कि जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की इच्छा प्रकट की तब चार ब्राह्मण कुमार सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने इनसे सृष्टि विस्तार करने को कहा तो चारों कुमारों ने मना कर दिया था। आइए ! आगे की कथा प्रसंग में चलते हैं।

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अब ब्रह्मा ने रुद्र रूप भगवान शंकर से सृष्टि का विस्तार करने को कहा, तो भोलेबाबा ने भूत-प्रेत पिचास हाकिनी-डाकिनी की सृष्टि आरंभ कर दी। ब्रह्मा ने कहा बस करो महाराज ! मुझे ऐसी सृष्टि नहीं करवानी है। बैठकर भजन करो। भोले बाबा भजन में बैठ गए। अब क्या करें। अबकी बार ब्रह्मा ने दस ऋषियों को प्रकट किया। मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पूलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, सप्त और देवर्षि नारद। 

अपनी वाणी से परम सुंदरी कन्या सरस्वती को और छाया से कर्दम मुनि को प्रकट किया। ये सब मानस सृष्टि हैं। इसके बाद अपने वाम अंग से कन्या और दक्षिण अंग से पुरुष को जन्म दिया। जिनका नाम मनु सतरुपा हुआ। मनु सतरुपा से ही मानव सृष्टि का विस्तार हुआ इसलिए मनु पुत्र होने के कारण हम मानव कहलाते हैं। जो लोग हमें मनुवादी कहकर पुकारते हैं इसका मतलब वे अपने को मनु नहीं मानते तो वे हिसाब लगा लें कि वे किसकी संतान हैं? अरे! सम्पूर्ण मानव मनु पुत्र हैं। 

मनु सतरुपा से पाँच संतानें हुईं। दो बेटे और तीन बेटियाँ। बेटों के नाम प्रियव्रत और उत्तानपाद। बेटियों के नाम आहुति, देवहुति और प्रसूति। 

  

एक दिन मनु महाराज ने ब्रह्मा से प्रार्थना की, कि पितामह ! मैं सृष्टि का विस्तार कैसे करूँ? एक राक्षस पृथ्वी का ही हरण करके ले गया है। ब्रह्मा जी ने ध्यान लगाया, ध्यान लगाते ही उनको बड़ी तेज छींक आई। छींकते ही उनकी नासिका से वराह भगवान का प्राकट्य हुआ,

बोलिए वराह भगवान की जय-----------

                  

हिरण्याक्ष की जन्म कथा

देखते-देखते वराह भगवान का शरीर पर्वताकर हो गया। देवताओं ने उनकी स्तुति की। हिरण्याक्ष का वध करके भगवान ने पृथ्वी का उद्धार किया। विदुर जी ने पूछ दिया, मैत्रेय जी ! ये हिरण्याक्ष कौन था? जो पृथ्वी को ही उठा के ले गया। ये किसका बेटा था? मैत्रेय जी कहते हैं-- विदुर जी महाराज ! महामुनि कश्यप जी की अनेक पत्नियाँ हैं। 

दिति, अदिति, तनु, कास्ता, सुरसा आदि।  

दिति नाम की जो पत्नी है, दैत्यों (असुरों) की माता है। एक बार कश्यप जी सूर्यास्त के समय संध्या वंदन कर रहे थे, उसी समय देवी दिति कश्यप के पास आईं और रति याचना की। कश्यप जी ने कहा— देखो,  देवी ‘एषा घोर तमो बेला’। शाम का वक्त है भगवान रुद्र अपने गणों के साथ विचरण करते हैं, इसलिए भगवान भोले बाबा की पूजा शाम को की जाती है। सूर्यास्त के समय गर्भ धारण करने वाली स्त्री की संतान दुष्ट होती है। समझाने पर भी जब दिति नहीं मानी तब कश्यप जी ने भगवान की इच्छा मानकर उसका मनोरथ पूर्ण किया। कामज्वर शांत होने पर दिति को पश्चाताप हुआ। मैत्रेय मुनि कहते हैं- विदुर ! दिति ने सौ वर्षों तक अपने बच्चों को जन्म नहीं दिया, परिणाम यह हुआ कि उनके शरीर से इतना तेज निकलने लगा कि स्वर्ग तक जलने लगा। देवताओं ने ब्रह्मा जी से कारण पूछा, कहाँ से तेज आ रहा है? हम तो जले जा रहे हैं। ब्रह्मा जी ने कहा, देवताओं ! घबराओ मत मेरे जो ये मानस पुत्र हैं सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार। एक बार ये चारों बैकुंठ में नारायण के दर्शन के लिए गए थे। जैसे ही प्रवेश करने लगे भगवान के पार्षदों ने दरवाजे पर ही रोक दिया, अंदर नहीं जाने दिया। क्रोध में आकर ब्राह्मण कुमारों ने तीन जन्म तक राक्षस योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। पाँच वर्ष के ये बालक पूर्वजों के भी पूर्वज हैं। इनकी प्रतिभा का क्या कहना।

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जय और विजय दोनों चरणों मे गिरकर प्रार्थना करने लगे। थर-थर काँपने लगे। खट-पट की आवाज सुनकर भगवान नारायण अंत;पुर से बाहर आए चारों ब्राह्मण कुमारों को प्रणाम किया। भगवान की अनुपम छ्टा को देखकर और उनके चरणों में चढ़ी हुई तुलसी मंजरी की सुगंध ग्रहण करते ही चारों भाइयों का क्रोध शांत हो गया। प्रभु ने कहा- 

एतौ तौ पार्षदो महयम जयो विजय एव च 

कदर्थी कृत्य मां यद्वो बहव्क्रातामतिक्रमम॥

यहाँ आप थोड़ा भगवान की कुशलता देखिए, उन्होंने एक बार भी नहीं कहा- चलिए महाराज! घर के भीतर पवित्र कीजिए। बाहर से ही खूब प्रशंसा करके विदा कर दिया। भगवान ने चारों ब्राह्मण कुमारों की जबरदस्त तारीफ की। शब्द शैली देखिए। एतौ तौ पार्षदौ ये दोनों मेरे पार्षद हैं, भगवान सनकादि कुमारों को महत्व दे रहे हैं और जय-विजय को डांट रहे हैं। इसका संकेत यह है कि इन्होंने गलती की तो इनको दंड देकर बहुत अच्छा किया। मैं तो कहता हूँ मुझे भी दंड दीजिए। सेवक का अपराध स्वामी का अपराध है। आपका पालतू कुत्ता किसी के घर में उत्पात मचा दे तो उसकी तो पिटाई होगी ही आपको भी गाली कम नहीं मिलेगी। मैं सत्य कहता हूँ मेरे हाथ से भी किसी ब्राह्मण का अपराध हो जाए तो मैं उसे काट कर फेंक दूँगा। भगवान कहते हैं, मेरे दो मुख हैं ब्राह्मण और अग्नि। 

ब्राह्मणस्य मुखामसित। दूसरी ओर मुखाद्ग्निरजायत। भगवान के मुख से इन दोनों का जन्म हुआ है। तुलना करके पूछा जाए कि किस मुख से पाना (भोजन करना) अच्छा लगता है। भगवान को दोनों मुखों से खिलाया जाता है। अग्नि के मुख से स्वाहा और ब्राह्मण के मुख से आहा। ब्राह्मण गरम-गरम मालपूआ और रबड़ी पाते हैं तो डकार लेकर गद-गद हो जाते हैं।

नाहं तथाद्मि यजमान हविर्वितानेश्च्योतद्घृतप्लुतमदन हुतभुंगमुखेन। 

यद्ब्राहमणस्य मुखतश्चरतोsनुघासम तुष्टस्य मय्यवहितै: निजकर्म पाकै:॥  

क्रमश: अगले अंक में --------------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

- आरएन तिवारी