संक्रांति पर गंगासागर का है खास महत्व, गंगा का होता है सागर से मिलन

  •  रमेश सर्राफ धमोरा
  •  जनवरी 14, 2021   10:36
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संक्रांति पर गंगासागर का है खास महत्व, गंगा का होता है सागर से मिलन

गंगासागर में मकर संक्रान्ति से पन्द्रह दिन पहले ही मेला शुरू हो जाता है। मेले में दुनिया के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री, साधु-संत आते हैं और संगम में स्नान कर सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं। मेले की विशालता के कारण लोग इसे मिनी कुंभ मेला भी कहते हैं।

भारत के तीर्थों में गंगासागर एक महातीर्थ हैं। मकर संक्रान्ति पर यहां प्रतिवर्ष बहुत बड़ा मेला लगता है। जिसमें दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु गंगा सागर स्नान के लिए आते हैं। गंगासागर की तीर्थयात्रा सैकड़ों तीर्थयात्राओं के समान मानी जाती है। भारत में सबसे पवित्र गंगा नदी गंगोत्री से निकल कर पश्चिम बंगाल में सागर से मिलती है। गंगा का जहां सागर से मिलन होता है उस स्थान को गंगासागर के नाम से जाना जाता है। इस स्थान को सागरद्वीप के नाम से भी जाना जाता है। 

कुम्भ मेले को छोडकर देश में आयोजित होने वाले तमाम मेलों में गंगासागर का मेला सबसे बड़ा मेला होता है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में इसकी चर्चा मोक्षधाम के तौर पर की गई है। जहां मकर संक्रान्ति के मौके पर दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु मोक्ष की कामना लेकर आते हैं और सागर-संगम में पुण्य की डुबकी लगाते है। कोरोना के कारण 2021 के मकर संक्रान्ति स्नान के अवसर पर यहां आने वाले लोगों की संख्या पहले की तुलना में कम ही रहेगी।

पहले गंगासागर जाना हर किसी के लिये सम्भव नहीं होता था। तभी कहा जाता था कि सारे तीरथ बार-बार गंगासागर एक बार। हालांकि यह पुराने जमाने की बात है जब यहां सिर्फ जल मार्ग से ही पहुंचा जा सकता था। आधुनिक परिवहन साधनों से अब यहां आना सुगम हो गया है। पश्चिम बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले में स्थित इस तीर्थस्थल पर कपिल मुनि का मंदिर बना हुआ हैं। जिन्होंने भगवान राम के पूर्वज और इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के 60 हजार पुत्रों का उद्धार किया था। मान्यता है कि यहां मकर संक्रान्ति पर पुण्य-स्नान करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। 

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गंगासागर में मकर संक्रांति से पन्द्रह दिन पहले ही मेला शुरू हो जाता है। मेले में दुनिया के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री, साधु-संत आते हैं और संगम में स्नान कर सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं। मेले की विशालता के कारण लोग इसे मिनी कुंभ मेला भी कहते हैं। मकर संक्रान्ति के दिन यहा सूर्यपूजा के साथ विशेष तौर कपिल मुनि की पूजा की जाती है।

ऐसी मान्यता है कि ऋषि-मुनियों के लिए गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन वर्जित होता है। भगवान विष्णु जी के कहने पर कपिलमुनी के पिता कर्दम ऋषि ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। उन्होने विष्णु भगवान से शर्त रखी कि भगवान विष्णु को उनके पुत्र रूप में जन्म लेंना होगा। भगवान विष्णु ने शर्त मान ली फलस्वरुप कपिलमुनी का जन्म हुआ जिन्हें विष्णु का अवतार माना गया। 

आगे चल कर गंगा और सागर के मिलन स्थल पर कपिल मुनि आश्रम बना कर तप करने लगे। इस दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया। इस के बाद यज्ञ के अश्वों को स्वतंत्र छोड़ा गया। ऐसी परिपाटी है कि ये जहां से गुजरते हैं वे राज्य अधीनता स्वीकार करते है। अश्व को रोकने वाले राजा को युद्ध करना पड़ता है। राजा सगर ने यज्ञ अश्वों के रक्षा के लिए उनके साथ अपने 60 हजार पुत्रों को भेजा। 

अचानक यज्ञ अश्व गायब हो गया। खोजने पर यज्ञ का अश्व कपिल मुनि के आश्रम में मिला। फलतः सगर पुत्र साधनरत ऋषि से नाराज हो उन्हे अपशब्द कहने लगे। ऋषि ने नाराज हो कर उन्हे शापित करते हुये अपने नेत्रों के तेज से भस्म कर दिया। मुनि के श्राप के कारण उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकी। काफी वर्षों के बाद राजा सगर के पौत्र राजा भागीरथ कपिल मुनि से माफी मांगने पहुंचे। कपिल मुनि राजा भागीरथ के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होने कहा कि गंगा जल से ही राजा सगर के 60 हजार मृत पुत्रों का मोक्ष संभव है। राजा भागीरथ ने अपने अथक प्रयास और तप से गंगा को धरती पर उतारा। अपने पुरखों के भस्म स्थान पर गंगा को मकर संक्रान्ति के दिन लाकर उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति दिलाई। यही स्थान गंगासागर कहलाया। इसलिए यहां स्नान का इतना महत्व है। 

हिन्दू मान्यता के अनुसार साल की 12 संक्रान्तियों में मकर संक्रान्ति का सबसे महत्व ज्यादा है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य मकर राशिन में आता हैं और इसके साथ देवताओं का दिन शुरु हो जाता है। गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु समुद्र को नारियल और यज्ञोपवीत भेंट करते हैं। समुद्र में पूजन एवं पिण्डदान कर पितरों को जल अर्पित करते हैं। गंगासागर में स्नान-दान का महत्व शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है। मान्यतानुसार जो युवतियां यहां पर स्नान करती हैं। उन्हें अपनी इच्छानुसार वर तथा युवकों को स्वेच्छित वधु प्राप्त होती है। मेले में आये लोग कपिल मुनि के आश्रम में उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मन्दिर में गंगा देवी, कपिल मुनि तथा भागीरथ की मूर्तियां स्थापित हैं।

सुन्दरवन निकट होने के कारण गंगासागर मेले को कई विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है। तूफान व ऊंची लहरें हर वर्ष मेले में बाधा डालती हैं। इस द्वीप में ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां दलदल, जलमार्ग तथा छोटी छोटी नदियां, नहरें भी है। बहुत पहले इस स्थान पर गंगा जी की धारा सागर में मिलती थी। किंतु अब इसका मुहाना पीछे हट गया है। अब इस द्वीप के पास गंगा की एक बहुत छोटी सी धारा सागर से मिलती है। यह मेला पांच दिन चलता है। इसमें स्नान मुहूर्त तीन दिनों का होता है। यहां अलग से गंगाजी का कोई मंदिर नहीं है। मेले के लिये एक स्थान निश्चित है। कहा जाता है कि यहां स्थित कपिल मुनि का प्राचीन मंदिर सागर की लहरें बहा ले गयी थी। मन्दिर की मूर्ति अब कोलकाता में रहती है और मेले से कुछ सप्ताह पूर्व यहां के पुरोहितों को पूजा अर्चना के लिये मिलती है।

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गंगासागर वास्तव में एक टापू है जो गंगा नदी के मुहाने पर स्थित है। यहां बंगला भाषी आबादी रहती है। यह पूरी तरह से ग्रामीण ईलाका है। यहां आने वाले तीर्थयात्रियों के रहने के लिए यहां पर होटल, आश्रम व धर्मशालायें है। अब पूरे वर्ष लोग यहां लोगों का आवागमन लगा रहता है। कोलकाता से पूरे मार्ग में सडक बनी हुयी है मात्र 8 किलोमीटर पानी में नाव का सफर करना पड़ता है। गंगासागर में मकर संक्रांति के दिन 14 व 15 जनवरी को मुख्य मेला लगता है। जिसमें लाखों लोग स्नान और पूजा करने आते हैं। 

गंगासागर की कायापलट में जुटी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गंगासागर के लिए मुरिगंगा में ब्रिज का निर्माण करवाने को प्रयासरत है। इस ब्रिज के बनने से श्रद्वालु सडक मार्ग से कचुबेरिया तक आ सकेगें। लोगों को यहां जल मार्ग से नहीं आना पड़ेगा। गंगासागर मेला किसी भी तरह कुम्भ मेले से कम नहीं है। यहां दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं। इस कारण गंगासागर मेले को भी कुंभ मेले जैसा दर्जा मिलना चाहिये। ताकि यहां के विकास के लिये कुम्भ मेले की तरह अलग से बजट उपलब्ध हो। जिससे इस क्षेत्र का समुचित विकास सम्भव हो पाये। 

रमेश सर्राफ धमोरा

स्वतंत्र पत्रकार







Gyan Ganga: भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था- प्रत्येक कर्म समाज हित में होना चाहिए

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 22, 2021   17:45
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Gyan Ganga: भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था- प्रत्येक कर्म समाज हित में होना चाहिए

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ तथा समस्त जीवात्माओं का परमेश्वर हूँ, फिर भी मैं अपनी महामाया को अधीन करके अपनी योग-माया से प्रकट होता हूँ। भगवान यहाँ स्पष्ट करना चाहते हैं कि साधारण मनुष्यों की तरह उनका जन्म-मरण नहीं होता।

गीता प्रेमियों ! यह संसार परमात्मा का है, किन्तु हम मनुष्य भूल से इसको अपना मान लेते हैं और सांसरिक बंधन में बंध जाते हैं। श्रीमद्भागवत गीता यही सिखाती है कि संसार को अपना समझना ही पतन है और अपना न समझना उत्थान है। 

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं- पिछले अंक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से सम्पूर्ण मानव जाति को यही उपदेश दिया कि हमारा प्रत्येक कर्म समाज के हित में ही होना चाहिए, यही कर्म योग है।

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श्रीभगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ 

श्री भगवान ने कहा– हे अर्जुन ! मैंने इस अविनाशी कर्म-योग- का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था। हम देख सकते हैं आज भी सूर्य देव नि:स्वार्थ भाव से अपने कर्म-योग में लीन रहते हैं। सूर्य देव ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया (मनु की संतान होने के कारण ही हम मानव कहलाते हैं) मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया। भगवान ने जिन सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु राजाओं का उल्लेख किया है, वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रम में रहते हुए ही कर्म-योग के द्वारा परम सिद्धि प्राप्त की थी। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास, इन चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम मुख्य है। मनुष्य गृहस्थाश्रम में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करके आसानी से परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। 

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ 

हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस विज्ञान सहित ज्ञान को राज-ऋषियों ने विधि-पूर्वक समझा, किन्तु समय के प्रभाव से यह श्रेष्ठ ज्ञान इस संसार से प्राय: लुप्त हो गया। आज मनुष्य रात-दिन अपनी सुख-सुविधा और सम्मान की प्राप्ति में लगा हुआ है। दूसरों की सेवा की तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। परोपकार के लिए यह मानव-तन मिला है, उसे भूल जाना ही कर्मयोग का लुप्त होना है।  

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ॥ 

आज मैं वही प्राचीन योग (आत्मा का परमात्मा से मिलन का विज्ञान) तुमसे कहा रहा हूँ क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय मित्र भी है, अत: तू ही इस उत्तम रहस्य को समझ सकता है।

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देखिए ! जो बात सखा से भी नहीं कही जा सकती वह बात भक्त के समक्ष प्रकट कर दी जाती है। पाँचों पांडवों में अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति विशेष लगाव था, तभी तो अर्जुन ने सर्व सम्पन्न “नारायणी सेना” का त्याग करके अकेले भगवान को अपने सारथी के रूप में स्वीकार किया था। 

भगवान की बात सुनकर अर्जुन को आश्चर्य हुआ कि जो अभी मेरे सामने बैठे हैं, वे सृष्टि के आरंभ में सूर्य को उपदेश कैसे दे सकते हैं? इसे अच्छी तरह समझने के लिए अर्जुन ने भगवान से प्रश्न पूछा।  

अर्जुन उवाच

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ 

अर्जुन ने जिज्ञासा व्यक्त की- आपका अवतार तो अब हुआ है और सूर्य देव का जन्म तो बहुत ही पुराना है, तो फ़िर मैं कैसे समूझँ कि सृष्टि के आरम्भ में आपने ही सूर्य देव को इस योग का उपदेश दिया था? 

अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में अपने अवतार का रहस्य प्रकट करते हुए भगवान कहते हैं-  

श्रीभगवानुवाच

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ 

श्री भगवान ने कहा- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, मुझे तो वे सभी जन्म याद हैं लेकिन तुझे कुछ भी याद नही है। 

देखिए ! अर्जुन के मन में भगवान के जन्म-रहस्य को जानने की प्रबल इच्छा थी, इसलिए भगवान अर्जुन के सामने मित्र और भक्त के नाते अपने जन्म का रहस्य प्रकट कर देते हैं। यह नियम है कि श्रोता की प्रबल इच्छा और श्रद्धा होने पर वक्ता अपने को छिपा कर नहीं रख सकता। इसीलिए संत-महात्मा और घर के बूढ़े-बुजूर्गों में जो श्रद्धा रखता है उसके सामने वे अपना सब रहस्य प्रकट कर देते हैं।  

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌ ।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ तथा समस्त जीवात्माओं का परमेश्वर हूँ, फिर भी मैं अपनी महामाया को अधीन करके अपनी योग-माया से प्रकट होता हूँ। भगवान यहाँ स्पष्ट करना चाहते हैं कि साधारण मनुष्यों की तरह उनका जन्म-मरण नहीं होता। साधारण लोग जन्म लेते हैं तो उनका शरीर पहले बालक होता है, फिर बड़ा होकर युवा हो जाता है, फिर वृद्ध हो जाता है और अंत में मर जाता है। परंतु भगवान में ये परिवर्तन नहीं होते। वे अवतार लेकर बाल-लीला करते हैं फिर (पंद्रह-सोलह की अवस्था) किशोरावस्था तक बढ़ने की लीला करते हैं। सैंकड़ों वर्ष बीतने पर भी भगवान वैसे ही सुंदर स्वरूप में रहते हैं। इसलिए भगवान के जितने भी चित्र बनाए जाते हैं, उसमें उनकी दाढ़ी-मूछें नहीं होतीं और न ही उनको बूढ़ा चित्रित किया जाता। इस प्रकार दूसरे प्राणियों की तरह न तो भगवान का जन्म होता है, न परिवर्तन होता है और न ही मृत्यु होती है।

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हम मूढ़ मानव अपनी अज्ञानता के कारण भगवान का प्रभाव साक्षात् सामने होने पर भी समझ नहीं पाते। द्रौपदी का चीर-हरण के लिए महा बलशाली दु:शासन अपनी पूरी शक्ति लगाता है, उसकी दोनों भुजाएँ थक जाती हैं, पर साड़ी का अंत नहीं होता। द्रौपदी के पुकारने मात्र से ही भगवान ने अपना प्रभाव साक्षात् प्रकट कर दिया। दुर्योधन और कर्ण भी वहाँ मौजूद थे, वे भी भगवान के इस करिश्मा को नहीं समझ सके। एक स्त्री का चीरहरण भी नहीं कर सके तो और क्या कर सकते हैं ! इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया।

गीता का यही गूढ़ उपदेश है- जो मनुष्य भगवान से विमुख रहता है उसके सामने भगवान अपनी योगमाया में छिपे रहते हैं और एक साधारण मनुष्य की तरह दिखते हैं, लेकिन जो भगवान के सम्मुख होता है, भगवान उसके सामने प्रकट हो जाते हैं।

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण...

-आरएन तिवारी







Gyan Ganga: भगवान श्रीरामजी और सुग्रीव के बीच का रोचक वार्तालाप

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 21, 2021   18:56
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Gyan Ganga: भगवान श्रीरामजी और सुग्रीव के बीच का रोचक वार्तालाप

ऐसा ही प्रश्न भक्त त्रिलोचन जी के मन में आया था। जब वे भक्त नामदेव की भक्ति के महान किस्से सुनकर उनके दर्शन हेतु गए तो उनका यह मिथ्या भ्रम टूट कर चकनाचूर हो गया। क्योंकि उन्होंने तो यह सुना था कि भक्त नामदेव चौबीसों घंटे भक्ति−साधना में ही लीन रहते हैं।

सज्जनों विगत अंकों से हम पढ़ रहे हैं कि श्री हनुमान जी जीव को ब्रह्म से मिलाने हेतु प्रतिक्षण तत्पर रहते हैं। श्रीराम अपनी वन यात्रा में श्री हनुमान जी से भी मिलन करते हैं और सुग्रीव से भी। सुग्रीव से मुलाकात में भगवान श्रीराम की वार्तालाप का आप अवलोकन करेंगे तो इस वार्ता का विषय वैसा बिलकुल भी नहीं जैसे श्री हनुमान जी विशुद्ध आध्यात्मिक नाता गांठने के लिए जाने जाते हैं। क्योंकि श्रीराम जी से जब भी जीव का नाता बनता है तो वह भक्ति का ही नाता बनता है। जिसमें संसार का समस्त माया−मोह परे छूट जाता है। और केवल ईश्वर ही ईश्वर का बोलबाला होता है। लेकिन श्रीराम जब सुग्रीव से मिले तो उसको कहीं भी कुछ ऐसा नहीं कहते कि सुग्रीव संसार तो माया है, बंधन है और मुझे पाने के लिए तुझे इसका मोह त्यागना ही होगा। फिर शायद यह भी कह देते कि चलो आधी माया−मोह तो तुम्हारी पहले से ही समाप्त हो गई है क्योंकि तुम्हारा राज्य व पत्नी तो बालि ने पहले से ही छीन रखे हैं। तो अब मेरी भक्ति करने में तुम पूर्णतः स्वतंत्र हो। प्रभु श्रीराम जी ने सुग्रीव से यह भी नहीं कहा कि चलो यह भी अच्छा ही हुआ कि तुम तो पहले ही वनों में निवास कर रहे हो। वरना भक्ति करने हेतु तो बड़े−बड़े तपस्वी भी वनों का ही रूख कर रहे हैं। उलटे प्रभु श्रीराम जी तो सुग्रीव से यह कहते हैं कि सुग्रीव! भला तुम वनों में क्या कर रहे हो− 'कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव' अर्थात तुम वनों में आखिर क्या कर रहे हो? क्योंकि श्री हनुमान जी तो मुझे यह कह कर लाए हैं कि यहाँ उनके राजा रहते हैं। और राजा तो राजमहल में होते हैं। यूं कंन्दराओं में नहीं! क्योंकि कंदराएँ तो बनवासियों का प्रिय स्थल हुआ करती हैं। यूं ही प्रभु यह कहते हैं तो सुग्रीव उनके समक्ष अपनी संपूर्ण गाथा कह सुनाता है कि कैसे बालि ने उसकी पत्नी और राज्य उससे छीन लिए और उसे वनों में छुपकर रहने के लिए विवश कर दिया−

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रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। 

हरि लीन्हसि सर्बसु अरु नारी।।

कहा कि उसने मुझे बहुत अधिक मारा भी। तो प्रभु कहते हैं कि सुग्रीव अब तुम किंचित मात्र भी चिंता न करो। क्योंकि मैं आ गया हूँ। मेरे बल के भरोसे तुम अपनी समस्त चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारी सहायता करूँगा और बालि ने तुम्हें मारा है न, तो ठीक है फिर मैं एक ही बाण में बालि का वध कर डालूंगा−

सुनु सुग्रीव मारिहऊँ बालिहि एकहिं बान।

ब्रह्म रूद्र सरनागत गऊँ न उबरिहिं प्रान।।

देखिए श्रीराम सुग्रीव के साथ कितनी मनोवैज्ञानिक उपचार पद्यति का प्रयोग कर रहे हैं। उन्हें पता है कि सुग्रीव बालि से अत्यंत भयभीत हैं एवं इतना भयभीत कि मेरे और लक्ष्मण में भी बालि के ही किसी षड्यंत्र की परछाई देख रहा है। ऐसे में मैं इसे ब्रह्म का उपदेश कहाँ समझ आएगा। इसलिए पहले तो मैं इसका यह भ्रम दूर करूँ और उन्होंने सुग्रीव को कह दिया कि मैं बालि को केवल एक ही बाण से मार डालूंगा। एवं ऐसा मारूंगा कि भागकर वह ब्रह्मा, विष्णु या महेश जी की शरण भी गया तो उसकी कहीं पर भी रक्षा नहीं हो पाएगी। प्रभु ने सोचा कि चलो सुग्रीव का भय तो अब मेरी इस घोषणा से ठीक हो ही गया होगा। लेकिन बालि ने सुग्रीव की पत्नी जो छीन ली है इसका दुख वह भूल ही नहीं पा रहा है। फिर पत्नी के पश्चात् और भी कई गुप्त−प्रकट दुःख होंगे जो सुग्रीव अभी हमसे कह नहीं पायेंगे। तो क्यों न मै कह दूं कि चलो सुग्रीव एक−दो पक्ष में मैं क्या सहायता का वचन दूँ। लो मैं तो तुम्हारी सब और से ही अब सहायता करूँगा−

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सखा सोच त्यागहु बल मोरे। 

सब बिधि घटब काज मैं तोरे।।

आप सोचिए सुग्रीव कितना सहमा, डरा व असुरक्षित महसूस कर रहा होगा कि प्रभु भक्ति व साधना की कोई बात ही नहीं कर रहे। बस भरोसा करवा रहे हैं कि तू चिंता भला क्यों करता है। मैं हूँ न, मैं सब विधि से तुम्हारे काम आऊँगा। हालांकि उनका मूल उद्देश्य तो यही है कि सुग्रीव को आध्यात्मिक जीवन में उतीर्ण करना है। नर व नारायण सेवा में संलग्न करना है। लेकिन सुग्रीव पहले इस के योग्य बने तो सही। क्योंकि निःसंदेह जीव के मानव जीवन का एक ही मूल उद्देश्य है और वह है ईश्वर की भक्ति। लेकिन आवश्यक नहीं कि यह माया त्यागने के पश्चात ही शुरू होती है। अपितु माया व राज−पाट मिलने के पश्चात् भी भक्ति करना अति सुलभ है। बस एक ही शर्त है कि अपनी समस्त माया का प्रयोग ईश्वरीय पथ की साधना के निमित्त प्रयोग करते हुए आगे बढ़ें−

न जग छोड़े न हरि त्यागो, ऐसे रहो जिंदगानी में।

दुनिया में ऐसे रहो जैसे कमल रहता है पानी में। 

कमल अपनी खुराक कीचड़ से ही लेता है। वहीं पलता−बढ़ता है, लेकिन सदा कीचड़ से निर्लिप्त रहता है। क्योंकि वह अपना संबंध सीधे सूर्य से जोड़े रखता है। यद्यपि हो सकता है कि हमारे मन में यह प्रश्न आ जाए कि भला संसार की माया में रहकर भी कोई, कैसे ईश्वर की सेवा व भक्ति कर सकता है ? ऐसा ही प्रश्न एकदा भक्त त्रिलोचन जी के मन में भी आया था। जब वे भक्त नामदेव की भक्ति के महान किस्से सुनकर उनके दर्शन हेतु गए तो उनका यह मिथ्या भ्रम टूट कर चकनाचूर हो गया। क्योंकि उन्होंने तो यह सुना था कि भक्त नामदेव चौबीसों घंटे भक्ति−साधना में ही लीन रहते हैं। और यहाँ तो मैं सुबह से ही देख रहा हूँ कि नामदेव जी तो कपड़ा छपाई में ही लीन हैं। रात होने को है और वे अभी भी शायद और काम करने की धुन में हों। अवश्य ही चारों ओर इनके बारे में झूठ फैलाया गया कि नामदेव जी आठों पहर भक्ति में ही लीन रहते हैं। यह तो धेखा है, पाप है। लेकिन कुछ भी हो मैं उन्हें अवश्य ही प्रश्न करूँगा−

नामा माइआ मोहिआ कहै त्रिलोचनु मीत।। 

काहे छीपहु छाइलै राम न लावहु चीतु।।

अर्थात् हे नामदेव जी! आपको तो माया ने मोह रखा है। आप यह छपाई का कार्य कर रहे हो। क्या आप राम जी के ध्यान में अपना चित्त नहीं लगाते? यह सुनकर नामदेव जी मुस्कुरा पड़े। और भक्त त्रिलोचन जी को संबोधित करते हुए फुरमान करने लगे−

नामा कहै त्रिलोचना मुख ते रामु सम्हालि।।

हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि।।

अर्थात् हे त्रिलोचन भाई! अपना मन निरंतर प्रभु से जोड़कर रखें और हाथ पैर से काम भी करता रह। भगवान श्रीराम सुग्रीव को इसी साधना−पद्धति की ओर लेकर जा रहे हैं। लेकिन क्या सुग्रीव तुरंत श्रीराम जी की सीख मान लेता है? अथवा नहीं! जानने के लिए अगला अंक अवश्य पढ़ें...क्रमशः... जय श्रीराम

-सुखी भारती







महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:35
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महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा।

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पावन नाम हमारे गौरवशाली इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज भी उन्हें सरबंसदानी, दानवीर, क्रांतिवीर एवं संत−सिपाही के रूप में याद किया जाता है। यों तो हमारे देश में अनेकों दानवीर हुए हैं जिन्होंने मानवता को त्रास मुक्त करने के लिए अनेकों बलिदान दिए। जैसे महर्षि शिबि ने इस संसार को राक्षसों के आतंक से बचाने के लिए जीते जी अपनी हडि्डयों का दान तक दे डाला। लेकिन दुनिया के इतिहास को बांचने पर कोई भी ऐसा उद्धरण नहीं मिलता जहाँ पर किसी ने अपने माता−पिता, पुत्रों एवं अपने सर्वस्व का दान दिया हो। मानवता की रक्षा हेतु गुरु जी अपने 7 और 9 साल के बच्चों का बलिदान देने से भी नहीं घबराए।

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हमारे विद्वतजनों का कथन है कि पूत के पैर पालने में ही पहचाने जाते हैं। जिस समय उनका जन्म हुआ तो पीर भीखण शाह जी ने पश्चिम दिशा में सिजदा करने की बजाय पूर्व दिशा में सिजदा किया। जब उनके शिष्यों ने उनकी इस उल्टी रीति का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि इस संसार के दुःख, संताप हरने वाला अवतार धरण कर चुका है। मैंने पूर्व दिशा से उठ रहे उसी इलाही नूर को सिजदा किया है। आप सब देखेंगे कि वो अपने दिव्य बल−शौर्य, कुर्बानी और संतत्व से इस संसार का काया कल्प करके रख देगा। और उनकी इस बात को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 9 साल की छोटी-सी अवस्था में ही सिद्ध कर दिया था। जिस समय कश्मीरी पंडित श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास आकर उन्हें औरंगज़ेब द्वारा उन पर किए जा रहे अत्याचारों से अवगत कराते हैं। तो उनकी बात सुनकर श्री गुरु तेग बहादुर जी अत्यंत गंभीर होकर वचन करते हैं कि इसके लिए तो किसी महापुरुष को अपनी कुर्बानी देनी पड़ेगी। उस समय बाल गोबिंद भी श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास ही बैठे थे, कहने लगे−पिता जी आप से बड़ा महापुरुष इस संसार में भला और कौन हो सकता है? वह जानते थे कि महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुर्बानियां भी महान ही देनी पड़ती हैं। इसलिए बाल गोबिंद 9 साल की अल्प आयु में ही मानवता की रक्षा हेतु अपने गुरु पिता का बलिदान देकर क्रांति का आगाज़ करते हैं। वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि समाज में फैले अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार की जड़ें जमा चुकी गहरी मलीनता को साफ करने लिए किसी महान क्रांति की ही आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि क्रांति ही वह मशाल है जो जुल्म और जालिमों द्वारा फैलाई कालिमा को दूर कर सकती है। महान कवि नामधरी सिंह दिनकर भी क्रांति की परिभाषा देते हुए कहते हैं− 'जब अचानक से आई कोई परिवर्तन की लहर इस संसार की दशा व दिशा को तेजी से बदल दे उसे क्रांति कहा जाता है। क्रांति वह धधकती ज्वाला है जो मानव के अंदर पल रहे अन्याय के भय को समाप्त कर इसके खिलाफ लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।' और गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऐसी ही क्रांति का आगाज़ करते हुए कहा−'चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं। तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।। 

क्रांति को अंग्रेजी में Revolution कहा जाता है जो लैटिन भाषा के शब्द revolutio से निकला है जिसका अर्थ होता है a turn around अर्थात् किसी अवस्था का बिलकुल ही पलट जाना। अगर हम अवस्था की बात करें तो संसार में रहने वाले जीवों की मुख्यतः दो अवस्थाएं होती हैं। एक है बाह्य और दूसरी है आंतरिक। बाह्य अवस्था में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक आदि कारण आते हैं। परंतु आंतरिक कारणों में मानव का चिंतन, नैतिकता, चरित्र आदि जैसे गुण आते हैं। 

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम क्रांति के द्वारा किसी की बाह्य अवस्था तो बदल सकते हैं लेकिन किसी की आंतरिक अवस्था को बदलना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। जैसे आप किसी को रहने के लिए अच्छा घर, अच्छे कपड़े व खाना तो दे सकते हैं लेकिन उसे मानसिक तृप्ति देना आप के वश में नहीं है। वस्तुतः यह व्यक्ति की आंतरिक अवस्था है जो उसके अंदर से उत्पन्न होती है। गुरु गोबिंद सिंह जी इस बात से भिज्ञ थे कि बाह्य क्रांति के द्वारा आप लोगों पर कुछ समय तक शासन तो कर सकते हैं लेकिन उनके अंदर आंतरिक परिवर्तन नहीं ला सकते। एवं किसी में अंदरूनी परिवर्तन लाए बिना उसे बदलना सिर्फ उसका लिबास बदलने के समान है। जिन्हें कुछ समय पश्चात फिर से बदलना पड़ सकता है। इसलिए वही क्रांति सफल मानी जाती है जिससे लोगों की सोच में भी अंतर आ जाए। इसलिए वे खालसा पंथ की सृजना करके एक आध्यात्मिक क्रांति का आगाज़ करते हैं। क्योंकि इसी के द्वारा ही समाज के बिगड़े चेहरे को फिर से संवारा जा सकता है। जिससे जालिम हुकमरानों के पैरों तले रौंदी मानवता को फिर से खुले आसमान में उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, परिणाम स्वरूप बिचित्र सिंह जैसे डरे, सहमे, भीरु लोगों में शौर्य का संचार हो जाता है।

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उस समय औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा। परिणामतः वह न तो लोगों की दशा बदल सका एवं न ही दिशा। अपितु लोगों के अंदर एक डर, भय व सहम पैदा कर दिया। 

लेकिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब खालसे का सृजन किया तो वह उनसे शीश भी मांगते हैं। परंतु गुरु जी को बिना कोई प्रश्न पूछे उनके सेवक अपने शीश कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं। आइए देखते हैं अंतर कहाँ पर है? किसी की सोच बदलने या उसे अपनी सोच छोड़ने के लिए उसे नए एवं श्रेष्ठ विचार प्रदान करने पड़ते हैं। जिस पगडंडी को लोग मार्ग समझ लेते हैं उसकी बजाय उन्हें विशाल मार्ग देना पड़ता है। और इस पगडंडी से विशाल मार्ग पर आगे बढ़ना ही क्रांति से आध्यात्मिक क्रांति का सफर है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 को बैसाखी वाले दिन इसी विशाल आध्यात्मिक क्रांति की स्थापना की एवं लोगों के अंदर नवचेतना का संचार किया। हम इस बात को भलीभांति जानते हैं कि श्री गुरु जी एक महान योद्धा व तलवार के धनी थे। वह तलवार के जोर पर लोगों को खालसा बना सकते थे। लेकिन उन्होंने पहले लोगों की आंतरिक अवस्था को बदलकर आध्यात्मिक क्रांति को पहल दी एवं लोगों के अंदर भक्ति एवं शक्ति के सच्चे सुमेल की स्थापना की और वे संत सिपाही कहलाए। एवं दबे कुचले लोगों धर्म, जाति, देश और खुद की रक्षा के लिए शौर्य पैदा किया। समाज पर भारी पड़ रही आतंकी शक्तियों का समूल नाश किया। सज्जनों इतिहास में ऐसे महान पन्ने किसी आध्यात्मिक पुरुष द्वारा ही लिखे जा सकते हैं। जो विश्व पटल पर संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करते हैं। 

आज सदियां बीत जाने के बाद भी मानव श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना जीवन धन्य कर रहा है। महापुरुष व उनकी शिक्षाएं किसी खास काल के लिए होती अपितु वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तंभ का काम करती हैं। 

इसलिए सज्जनों अगर आज हम भी समाज से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, चरित्रहीनता, जाति−पाति, ईर्ष्या, द्वेष का समूल नाश करना चाहते हैं तो हमें भी अपने अंदर एक संपूर्ण क्रांति अर्थात आध्यात्मिक क्रांति की मशाल जगानी पड़ेगी। क्योंकि यदि हर एक व्यक्ति अपने अंदर से दूषित विचारों का नाश कर दे तो फिर समाज को सुंदर, आनंदमयी एकता के सूत्र में बंधने से कोई भी अमानवीय ताक्त नहीं रोक सकती। इसलिए आओ हम सब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दानवीरता को याद करते हुए उनके श्री चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करें।

-सुखी भारती







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