भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सीजन 27 अप्रैल और 19 मई दो ऐसे दिन रहे, जब धरती के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी भारत के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट हमें चेताती है कि देश के 50% से ज्यादा शहरों में भीषण गर्मी का खतरा 'अधिक' से लेकर 'बेहद अधिक' के स्तर तक पहुंच चुका है।
हमारे देश का राजनीतिक तापमान तो वर्षपर्यंत उच्च रहता आया है और चुनावी इलाकों में इसके वैचारिक हीट स्ट्रोक से सिस्टम का झुलसना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन जब मई-जून के महीने में मौसमी तापमान जानलेवा स्तर तक खतरनाक रूप से चढ़ता जाता है तो लोग बाग परेशान हो उठते हैं। फिर अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गलतियों पर पछतावा के अलावा कुछ नहीं मिलता, क्योंकि विकास के नाम पर आधुनिक भारतीय सभ्यता विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त हमारे हुक्मरान तमाशबीन बने बैठे हैं, क्योंकि हरेक आपदा को अवसरों में बदलकर अपनी कमाई बढ़ाने का धंधा उन्होंने सीख लिया है। बेशक अपवाद भी होंगे, लेकिन अल्पमत में, जिनकी लोकतंत्र में कम कद्र होती आई है।
वहीं, भारत में बढ़ती खतरनाक गर्मी केवल “मौसमी बदलाव” नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण, जंगलों की कटाई और प्रदूषण का संयुक्त परिणाम बन चुकी है। हाल के वर्षों में उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में 46°C–48°C तक तापमान दर्ज हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश का एक बड़ा हिस्सा इस समय भट्ठी बना हुआ है। हमारे शहर हीट आइलैंड में तब्दील होते जा रहे हैं। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक, ज्यादातर शहरों में औसत तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चल रहा है। कहीं कहीं तो पिछले 14-15 वर्षों के रिकॉर्ड टूट चुके हैं। कोढ़ में खाज यह कि फिलहाल राहत के संकेत नहीं है, क्योंकि अल-नीनो की वजह से मौसम आगे और कड़ी परीक्षा ले सकता है।
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अलबत्ता आप मानें या न मानें, लेकिन गर्मी की बढ़ती प्रवृति में भविष्य के लिए सबसे बड़ा संदेश छिपा हुआ है। वह यह कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत में गर्मी केवल असुविधा नहीं बल्कि “राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट” बन सकती है। लिहाजा, आने वाले वर्षों में जल संरक्षण, हरित विकास और स्वच्छ ऊर्जा ही सबसे बड़े समाधान होंगे।
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सीजन 27 अप्रैल और 19 मई दो ऐसे दिन रहे, जब धरती के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी भारत के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट हमें चेताती है कि देश के 50% से ज्यादा शहरों में भीषण गर्मी का खतरा 'अधिक' से लेकर 'बेहद अधिक' के स्तर तक पहुंच चुका है। और तो और, साल 2015 से 2020 के दरम्यान लू वाले दिनों का औसत 7.4 दिन से बढ़कर 32.2 दिन हो गया है, और यह लगातार बढ़ रहा है। इसका गहरा दुष्प्रभाव हमारी सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ने के आसार प्रबल हैं।
हमारे शहरों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि वो अंधाधुंध विकास की होड़ में अपनी हरियाली उजाड़कर उन्हें कंक्रीट के जंगलों में तब्दील करते जा रहे हैं। लिहाजा, भारत में गर्मी अब हर साल एक नया रेकॉर्ड बना रही है। चिंताजनक बात यह है कि दिन तो तपते ही हैं, अब रातें भी तपने लगी हैं और राहत देने वाली नहीं रहीं। इस 20 मई को दिल्ली ने मई महीने में 13 साल की सबसे गर्म रात देखी, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा। 21 मई को स्थिति उससे भी ज्यादा बुरी हुई।इस प्रकार से हाल के बरसों में हीटवेव की तीव्रता, उसका समय और सीमा अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इससे शहरों पर संकट ज्यादा है, जो घटती हरियाली, बढ़ते कंक्रीट स्ट्रक्चर और प्रदूषण की वजह से अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट' झेल रहे हैं।
इससे हमारे कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ चुका है, क्योंकि मौसम की यह मार दोतरफा है- सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ चुकी है। नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2025 में हीट स्ट्रोक के सात हजार से ज्यादा सस्पेक्टेड केस सामने आए थे। हालांकि माना जाता है कि भारत में हीट स्ट्रोक और उससे होने वाली मौतों का सही आंकड़ा रिपोर्ट नहीं हो पाता। क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी मौसम का सीधा वार झेलती रहती है। इनमें गिग वर्कर्स, दिहाड़ी मजदूर, स्ट्रीट वेंडर्स वगैरह भी शामिल हैं। चूंकि घर बैठने से न इनका काम चलेगा और न अपने देश का। लिहाजा इस मौसम में ये सबसे ज्यादा जोखिम में ये लोग ही होते हैं। किसान और मजदूर भी इन्हीं जैसे होते हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते है, जैसे सार्वजनिक शेल्टर, पेयजल की व्यवस्था और जहां संभव हो वहां काम के घंटों और चरित्र में बदलाव। इसे गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जा सकता है।
चूंकि बढ़ती हुई गर्मी से हमारी आपकी कार्यक्षमता पर सीधा असर पड़ता है, काम के घंटे कम होते हैं और प्रॉडक्टिविटी भी घट जाती है। लिहाजा यह बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। एक आकलन के मुताबिक, यदि यही हाल रहा तो 2030 तक गर्मी की वजह से भारत की जीडीपी का 4.5 प्रतिशत प्रभावित होगा। ये सारे आंकड़े एक गंभीर चेतावनी हैं। चूंकि क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम के और बिगड़ने की आशंका है, इसलिए बेहतर रहेगा अगर हमलोग अपनी तैयारी पहले से कर लें।
# भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण जानिए
भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं- पहला, जलवायु परिवर्तन: धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार मानव गतिविधियों से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग ने भारत में हीटवेव को अधिक लंबा और तीव्र बना दिया है। दूसरा, जंगलों की कटाई: पेड़ प्राकृतिक “कूलिंग सिस्टम” होते हैं। लिहाजा बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से नमी कम हो रही है, वर्षा चक्र प्रभावित हो रहा है, जमीन अधिक गर्म हो रही है। तीसरा, शहरी हीट आइलैंड प्रभाव :कंक्रीट, डामर, वाहन, एसी और उद्योग शहरों को “हीट ट्रैप” बना रहे हैं। शहर रात में भी गर्म बने रहते हैं। चौथा, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसें: कोयला, पेट्रोल-डीजल, फैक्ट्रियों और वाहनों से निकलने वाली गैसें वातावरण में गर्मी रोकती हैं। पांचवां, कमजोर मानसून और एल-नीनो: एल-नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाएँ भारत में सूखा और गर्म हवाएँ बढ़ाती हैं। छठा, भूजल की कमी और सूखी जमीन जब मिट्टी में नमी कम होती है तो धरती तेजी से गर्म होती है। इससे लू और अधिक खतरनाक हो जाती है। सातवां, अनियोजित विकास: खुले मैदान कम होना, झीलों और तालाबों का खत्म होना, अत्यधिक कंक्रीट निर्माण इनसे स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ रहा है।
# गर्मी से होने वाले खतरे को समझिए
गर्मी से होने वाले खतरे निम्नलिखित हैं:- हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट और बीपी की समस्या, बच्चों और बुजुर्गों में मृत्यु जोखिम, फसल नुकसान, बिजली और पानी संकट श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी, भारत में हीटवेव से स्वास्थ्य संकट तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
# ये हैं व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान
व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान इस प्रकार हैं- पहला, दोपहर में बाहर निकलने से बचें, विशेषकर 12 बजे से 4 बजे तक। दूसरा, पर्याप्त पानी पिएँ, ओआरएस, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी। तीसरा, हल्के सूती कपड़े पहनें, गहरे रंग और टाइट कपड़ों से बचें। चौथा, शरीर को ठंडा रखें, सिर ढकें, छाता प्रयोग करें, गीला कपड़ा रखें। पांचवां, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान, उन्हें बंद और गर्म कमरों में न रखें।
# हमें सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए
सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए- पहला, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण- यह सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है। दूसरा, तालाब और जलस्रोत बचाना: स्थानीय तापमान कम करने में मदद मिलती है। तीसरा, “कूल रूफ” अभियान: सफेद या परावर्तक छतें घरों को ठंडा रखती हैं। चौथा, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना: पार्क ग्रीन कॉरिडोर, छायादार सड़कें। पांचवां, प्रदूषण नियंत्रण: स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक परिवहन को बढ़ावा देना। छठा, हीट एक्शन प्लान: कई शहर अब हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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