Gyan Ganga: श्रीहनुमानजी के किन प्रश्नों के जाल में उलझ कर रहा गया था अभिमानी रावण?

Gyan Ganga: श्रीहनुमानजी के किन प्रश्नों के जाल में उलझ कर रहा गया था अभिमानी रावण?
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श्रीहनुमान जी ने प्रश्न किया, कि हे रावण! क्या तुम्हें किसी भी स्त्री को श्रृँगार किए देखना प्रिय लगता है न? रावण ने कहा कि हाँ भई, श्रृँगार से सजी स्त्री भला किसे प्रिय नहीं होगी। और मुझे तो ऐसी स्त्री विवेश रूप से प्रिय है। लेकिन यह सब पूछने का तुम्हारा ध्येय समझ में नहीं आ रहा।

श्रीहनुमान जी रावण को जो उपदेश दे रहे हैं, वे मात्र केवल रावण पर ही क्रियावन्त हेतु नहीं हैं। अपितु जिस-जिस का भी मन प्रभु से विमुख है, और अभिमान में सर्वदा चूर है, वे सब श्रीहनुमान जी के इस श्रेष्ठ व पावन संदेश के अधिकारी हैं। रावण की समस्या का मूल क्या है? एक अहंकार ही तो उसे प्रभु मार्ग की ओर जाने से रोक रहा है न? अन्यथा रावण जैसे कुल, तपस्या अथवा संपत्ति इत्यादि की पूरे संसार में कहाँ कोई काट नहीं। श्रीहनुमान जी द्वारा दिए गए उदाहरण कितने प्रासंगिक हैं, यह देखते ही बनता है। श्रीहनुमान जी कहते हैं-

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‘राम नाम बिनु गिरा न सोहा।

देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।

बसन हीन नहिं सोह सुरारी।

सब भूषन भूषित बर नारी।।’

श्रीहनुमान जी रावण पर ऐसे शब्दों के बाण चला रहे हैं, कि रावण पर इसका प्रभाव होना ही बनता था। रावण तो था ही कामी व स्त्री मोह से ग्रसित। और श्रीहनुमान जी ठहरे अखण्ड ब्रह्मचारी। उनके मुख से निश्चित ही ऐसा उदाहरण, आज प्रथम और अंतिम बार निकल रहा था। क्योंकि किसी नारी के बारे में श्रीहनुमान जी द्वारा, ऐसे निम्न से भासित होने वाले शब्दों का उच्चारण करना, एक परिकल्पना-सी लगता है। श्रीहनुमान जी ने रावण से पूछा, कि क्या उसने किसी स्त्री को नग्न अवस्था में देखा है? अब रावण से यह प्रश्न पूछना कुछ ऐसे था, मानो किसी बिल्ली से पूछा जा रहा था, कि क्या उसने कभी किसी चूहे का शिकार किया है, अथवा कभी दूध के कटोरे को देख कर, जिह्वा से लार तो नहीं टपकी? इसका प्रतिऊत्तर क्या है, पाठक गण भलिभाँति जानते हैं। रावण ने देखा कि वाह! वानर तो बड़ा रसिक प्रवृति का है। लेकिन तनिक भोला-सा भी है। भला मुझसे ऐसा प्रश्न पूछने की नादानी क्यों की जा रही है। चलो कोई नहीं। पर इसे मेरी आँखों की चमक देख कर स्वयं ही समझ लेना चाहिए, कि मैंने किसी नग्न स्त्री का दर्शन किया है, अथवा नहीं। श्रीहनुमान जी ने रावण का उत्तर उसके ललचाये नेत्रों से पढ़ ही लिया था।

श्रीहनुमान जी ने अगला प्रश्न किया, कि हे रावण! क्या तुम्हें किसी भी स्त्री को श्रृँगार किए देखना प्रिय लगता है न? रावण ने कहा कि हाँ भई, श्रृँगार से सजी स्त्री भला किसे प्रिय नहीं होगी। और मुझे तो ऐसी स्त्री विवेश रूप से प्रिय है। लेकिन यह सब पूछने का तुम्हारा ध्येय समझ में नहीं आ रहा। यह सुन श्रीहनुमान जी ने कहा, कि बस---बस। एक अंतिम प्रश्न और। वह यह कि अगर वह श्रृँगार किसी नग्न स्त्री पर कर दिया जाये। गहनों से उसका पूरा तन सजा दिया जाये। तो क्या वे आभूषण उस नग्न स्त्री पर शोभायमान होंगे? तुम्हारी मुखाकृति स्पष्ट कह रही है, कि तुम भी ऐसे किसी श्रृँगार का समर्थन नहीं करते। यह निश्चित ही आकर्षण हीन होने के साथ-साथ, अमर्यादित भी होगा। हे रावण, ठीक इसी प्रकार, भले ही तुम्हारी लंका में पग-पग पर सोना मढ़ा हो। समस्त लोक पाल, दिकपाल तुम्हारे चाकर हों। तुमने काल को भी वश में कर लिया हो। लेकिन तब भी, अगर तुम्हें श्रीराम नाम की धुन नहीं लगी, व तुम्हारे रोम-रोम में मायापति नहीं, अपितु माया है, तो यह दृढ़ भाव से मान कर चलना, कि तुम्हारा समस्त वैभव व कीर्ति भी उस नग्न स्त्री के श्रृँगार के ही मानिंद है।

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रावण ने जब यह सुना, तो वह दंग रह गया। कि यह वानर तो बातों का जाल ही बिछा देता है। इसकी बातों में तो कोई भी उलझ कर रह जाये। लेकिन श्रीहनुमान जी को रावण की थोड़ी न सुननी थी, अपितु उसे सुनानी थी। श्रीहनुमान जी ने फिर कहा, कि हे रावण, माना कि तुम्हारे पास इस धरा की अथाह धन संपदा है। वह तो होगी ही, कारण कि तुमने तीनों लोकों पर विजय जो प्राप्त कर ली है। यह इतनी संपत्ति है, कि अगर तुम अपनी बीसों भुजाओं से भी, आठों पहर इसे लुटाते रहो, तो सौ कल्प तक भी यह संपत्ति समाप्त नहीं होगी। लेकिन यह भी सत्य मानना, कि अगर तुम ऐसे ही राम विमुख बने रहे, तो तुम्हारी प्रभुता और संपत्ति ऐसे चली जायेगी, जैसे मुठ्ठी में पकड़ी बालु की रेत फिसल कर निकल जाती है। समझ लो कि ऐसी संपत्ति का तुम्हारे पास होना, अथवा न होना, एक समान है। कारण कि जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं होते, अर्थात जिन्हें केवल बरसात का ही सहारा होता है, वे बरसात बीत जाने पर, फिर तुरन्त ही सूख जाती हैं-

‘राम बिमुख संपत्ति प्रभुताई।

जाइ रही पाई बिनु पाई।।

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।

बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं।।’

इसलिए हे रावण, मेरी कही पर विश्वास करो और श्रीराम जी का भजन करो। मुझे पता है, कि तुम्हारा अभिमान ही तुम्हारे कल्याण में बाधा है। अभिमान भी कोई ऐसे थोड़ी न होता है। महाप्रलयकारी मोह ही इसका मूल है। तो क्यों न बहुत पीड़ा देने वाले, तमरूप अभिमान का त्याग कर दो और रघुकुल के स्वामी, कृपा के समुद्र भगवान श्रीरामचन्द्र जी का भजन करो-

‘मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।’

श्रीहनुमान जी निःसंदेह भक्ति, ज्ञान व वैराग्य से भरपूर उपदेश दे रहे थे। जिन्हें सुन विषयी से विषयी व्यक्ति का भी हृदय द्रवित हो जाये। लेकिन रावण है कि पिघलता ही नहीं। कारण कि रावण ने, श्रीहनुमान जी को अब एक ऐसी बात कह डाली, कि श्रीहनुमान जी के स्थान पर, कोई अन्य भक्त होता, तो निश्चित ही रावण का वध कर डालता।

रावण ने ऐसा क्या कह डाला, कि वह निःसंदेह निंदनीय माना गया? यह जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती