Gyan Ganga: हनुमानजी ने आखिर मेघनाथ का रथ क्यों तोड़ दिया था?

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सुखी भारती । Apr 21, 2022 12:35PM
श्रीहनुमान जी ने मेघनाद का रथ तोड़ा, तो यह भी मेघनाद के लिए एक संदेश ही था। वह यह कि हे मेघनाद तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं, कि किसी संत से भेंट करने जाओ, तो अपने रथ पर चढ़ कर थोड़ी न जाते हैं। कारण कि रथ तो जीव के अहंकार व वैभव का प्रतीक होता है।

रावण ने जब सुना, कि उसका पूत्र अक्षय कुमार भी काल की भेंट चढ़ गया है। तो वह क्रोध से तिलमिला उठा। उसे तो इस बात की स्वप्न में भी कल्पना नहीं थी, कि कोई वानर इस अभेद्य लंका नगरी में आयेगा, और ऐसा साहस करेगा, कि मेरी मूँछ का बाल ही उखाड़ कर ले जायेगा। यह कोई यूँ ही भुला देने वाली घटना नहीं थी। अबकी बार रावण को लगा, कि बैरी सचमुच ही बलवान है। रावण को इच्छा हुई, कि निश्चित ही ऐसे वानर को देखना चाहिए। वध तो उसका मैं कभी भी कर डालूंगा। लेकिन पहले मैं उसकी सूरत तो देख लूँ, कि वह वानर कैसा प्रतीत होता है। इसलिए मैं अब अपने पुत्र मेघनाद को भेजता हूँ और उसे ठोक कर कहता हूँ, कि वह अबकी बार उस वानर को मारे नहीं, अपितु उसे पकड़ कर मेरे पास लेकर आये-

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‘सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।

पठएसि मेघनाद बलवाना।।

मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।

देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।’

बस फिर क्या था, इन्द्र को जीतने वाला अतुलित योद्धा मेघनाद पूरे बल व शौर्य को साथ ले चला। मेघनाद भी अपने भाई के मारे जाने से अतिअंत क्रोध में था। किसी भयंकर कोबरे की भाँति ही, मेघनाद भी फुंफकारता हुआ अशोक वाटिका में प्रवेश करता है। श्रीहनुमान जी ने देखा, कि अबकी बार रावण ने बड़ा भारी योद्धा भेजा है। तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े-

‘चला इन्द्रजित अतुलित जोधा।

बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

कपि देखा दारुन भट आवा।

कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।’

श्रीहनुमान जी ने के लड़ने का तरीका ही बड़ा विलक्षण है। वे अपनी गदा का प्रयोग कर ही नहीं रहे। अन्यथा मेघनाद की क्या बिसात थी, कि वह श्रीहनुमान जी के मार्ग पर एक कदम भी बढ़ पाता। कारण कि अगर श्रीहनुमान जी सहज ही अपनी गदा को लंका की धरा पर पटक देते, तो पूरी लंका नगरी के गुम्बद ढह जाने थे। फिर मेघनाद की क्या हस्ती, कि वह श्रीहनुमान जी के समक्ष खड़ा भी रह पाता। लेकिन श्रीहनुमान जी हैं कि अपनी गदा का प्रयोग कर ही नहीं रहे। वे तो बस अशोक वाटिका के वृक्षों को उखाड़-उखाड़ कर ही राक्षसों का संहार किए जा रहे हैं। मानो श्रीहनुमान जी का क्रोध राक्षसों के साथ-साथ, अशोक वाटिका के वृक्षों पर भी बरस रहा था। वह इसलिए, क्योंकि इन वृक्षों में भी बला का छल था। माता सीता जी जिस वृक्ष के नीचे विराजमान थी। वह भी मात्र नाम का ही ‘अशोक वृक्ष’ था। वह वास्तव में किसी को शोक से रहित थोड़ी न कर पा रहा था। अपितु वह तो माता सीता जी के दुख का आठों प्रहर साक्षी बना रहा। और एक क्षण के लिए भी, सीता मईया का कष्ट हरण नहीं कर पाया। वाह री लंका नगरी, नाम कुछ ओर, और काम कुछ ओर। तो क्या करना ऐसे प्रपंची व पाखंड़ी वृक्षों का, जो अपने नाम के अनुसार व्यवहार ही नहीं कर पा रहे हों। श्रीहनुमान जी रावण को यही संदेश देना चाह रहे थे, कि हे रावण यह बात अपने हृदय में ठीक से धारण कर लो कि तुम्हारा छल व कपट तब तक ही अस्तित्व में है, जब तक तुम्हारा सामना संत से नहीं हो जाता। संत ऐसे कपट से भरे धूर्तों को यूँ ही जड़ से उखाड़-उखाड़ कर फेंकते हैं। मानो श्रीहनुमान जी कहना चाह रहे हों, कि हे रावण जैसे मैं इन वृक्षों को उखाड़-उखाड़ कर फेंक रहा हूँ, ठीक ऐसे ही मैं तुम्हें और तुम्हारे प्रत्येक दुष्ट राक्षस को उखाड़-उखाड़ कर नष्ट करूँगा। श्रीहनुमान जी ने मेघनाद को देख कर जो वृक्ष उखाड़ा था, उन्होंने उस वृक्ष का ऐसा प्रहार किया, कि मेघनाद का रथ ही तोड़ डाला, और उसे बिना रथ के कर डाला। मेघनाद नीचे गिर गया। और श्रीहनुमान जी मेघनाद के संग आये राक्षसों को अपने शरीर के साथ मसल-मसल कर प्राणहीन करने लगे-

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‘अति बिसाल तरु एक उपारा।

बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

रहे महाभट ताके संगा।

गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा।।’

श्रीहनुमान जी ने मेघनाद का रथ तोड़ा, तो यह भी मेघनाद के लिए एक संदेश ही था। वह यह कि हे मेघनाद तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं, कि किसी संत से भेंट करने जाओ, तो अपने रथ पर चढ़ कर थोड़ी न जाते हैं। कारण कि रथ तो जीव के अहंकार व वैभव का प्रतीक होता है। और संत के पास अहंकार का त्याग करके जाते हैं, न कि अहंकार पर सवार हो कर। लेकिन तुम्हें इन संस्कारों से क्या वास्ता। कारण कि सुसंस्कारों से तो, तुम लंका वासियों का कोई दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। इसलिए चलो मैं स्वयं ही तुम्हें रथहीन कर देता हुँ। क्या पता तुम कुछ समझ ही जाओ। पर श्रीहनुमान जी को भी क्या पता था, कि मेघनाद तो रावण से भी बड़ा अहंकारी था। कारण कि, उसने तो वह कर दिखाया था, जो रावण भी नहीं कर सका था। और वह था, स्वर्ग को जीतना। मेघनाद ने स्वर्ग नरेश इन्द्र को न केवल पराजित किया था, अपितु उसे बंदी बना कर, उसका लंका नगरी में जुलूस निकालते हुए, भरी सभा में रावण के समक्ष प्रस्तुत किया था। जिसके कारण मेघनाद को एक नया नाम ‘इन्द्रजीत’ मिला था। और ऐसा ही आदेश रावण ने फिर से मेघानद को दिया था, कि जाओ पुत्र मेघनाद! उस वानर को बाँध कर मेरे समक्ष ले आओ।

क्या इन्द्रजीत श्रीहनुमान जी को बाँध पाने में सफल हो पाता है, अथवा नहीं? जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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