Services Sector और Exports के दम पर भारत की GDP Growth 7.8% तक पहुंची, IMF ने सराहा

वैश्विक ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत रही है। आईएमएफ ने सेवा क्षेत्र और निर्यात के बेहतर प्रदर्शन को इस आर्थिक मजबूती का मुख्य आधार बताया है। संस्था के अनुसार, बाहरी दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में उभरकर सामने आई है।
भारत की अर्थव्यवस्था ने ऐसे समय में बेहतर प्रदर्शन किया है, जब दुनिया के कई हिस्से ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के दबाव से जूझ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने गुरुवार को भारत की 7.8 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि को उम्मीद से बेहतर बताया और कहा कि सेवा क्षेत्र तथा निर्यात की मजबूती ने इस प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाई है।
आईएमएफ की प्रवक्ता जूली कोजैक ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि संस्था के कर्मचारियों के अनुमान से ऊपर रही है। उनके मुताबिक, पहली तिमाही में सेवा क्षेत्र और निर्यात ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, जिसका सीधा असर देश की कुल आर्थिक वृद्धि पर पड़ा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान 7.8 प्रतिशत रही है। यह आंकड़ा केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय की ओर से जारी किया गया है। इस आंकड़े ने कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अनुमानों को पीछे छोड़ा है।
गौरतलब है कि इस बार सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में किए गए संशोधन और उत्पादक मूल्य सूचकांक की नई श्रृंखला को भी शामिल किया गया है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों से आर्थिक गतिविधियों का आकलन बेहतर तरीके से किया जा सकेगा और सकल घरेलू उत्पाद के अनुमान की गुणवत्ता में सुधार होगा।
हालांकि, आंकड़ों के जारी होने के बाद इनके भरोसे और गणना की पद्धति को लेकर देश-विदेश में चर्चा भी हुई है। खास तौर पर नई गणना पद्धति और संशोधित आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए गए। केंद्र सरकार ने इन चिंताओं पर सफाई देते हुए कहा है कि जारी किए गए वृद्धि आंकड़े सही हैं और वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की गणना के लिए इस्तेमाल की गई पद्धति भी उचित है।
आईएमएफ की प्रवक्ता जूली कोजैक ने भारत के प्रदर्शन को ऊर्जा संकट के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जब तेल या दूसरी ऊर्जा वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं तो ऊर्जा आयात करने वाले देशों के भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ता है। इसके साथ ही सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी इसका असर पड़ सकता है।
भारत के मामले में ऊर्जा कीमतों का यह झटका ऐसे समय आया है जब अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में मजबूत स्थिति में है। कोजैक ने कहा कि आईएमएफ भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ी हुई तेल कीमतों के प्रभाव पर नजर रख रहा है और भारत के लिए अपने नए आर्थिक अनुमान अक्टूबर में जारी करेगा।
बता दें कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी की पृष्ठभूमि पश्चिम एशिया में बढ़े सैन्य तनाव से जुड़ी है। ईरान के साथ युद्ध और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही प्रभावित होने की आशंकाओं ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ाई है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए लंबे समय तक महंगा तेल आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।
इसके बावजूद आईएमएफ ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख विकास इंजन बताया है। संस्था के अनुसार, मौजूदा आंकड़े यह दिखाते हैं कि बाहरी झटकों के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मजबूती बनी हुई है। हालांकि, आगे महंगे तेल की स्थिति कितनी लंबी रहती है, इसका असर आने वाली तिमाहियों की वृद्धि पर महत्वपूर्ण हो सकता है।
अक्टूबर में आईएमएफ के नए अनुमान से यह तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है कि ऊर्जा कीमतों, वैश्विक व्यापार और घरेलू मांग के बीच भारत की आर्थिक रफ्तार किस दिशा में जाती है। फिलहाल 7.8 प्रतिशत की वृद्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत जरूर दिया है।
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