• सिर्फ पीढ़ीगत परिवर्तन नहीं है दत्तात्रेय होसबोले का आगमन

होसबोले का सरकार्यवाह पद पर आना पीढ़ीगत परिवर्तन के साथ वर्तमान चुनौतियों को भी रेखांकित करता है। यह वह समय है, जब संघ विचार से प्रभावित स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में स्थापित हैं तथा बदलते हुए भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्राणपण से जुटे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जो लोग जानते हैं, उन्हें पता है कि यहां किसी ‘व्यक्ति’ की जगह ‘विचार’ की महत्ता है। यह एक विचार केंद्रित संगठन है, जहां व्यक्ति निष्ठा से बड़ी विचार और ध्येयनिष्ठा है। अपने ध्येय के लिए सतत् चलते हुए काम करना यही संघ का हेतु है और इसी में उसकी मुक्ति है। इसीलिए संघ संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने भगवा ध्वज को स्वयंसेवकों की प्रेरणा बताया और गुरु स्थान पर स्थापित किया। बावजूद इसके श्री दत्तात्रेय होसबोले का सरकार्यवाह चुना जाना, अपेक्षा से अधिक चर्चा में है। शायद इसलिए भी कि इस समय संघ एक पीढ़ीगत परिवर्तन से गुजर रहा है और उससे अपेक्षाएं बहुत बढ़ गयी हैं। भैयाजी जोशी जैसे योग्य संगठनकर्ता, समन्वयकारी विचारों के धनी और गहरे सामाजिक सरोकारों के वाहक स्वयंसेवक के स्थान पर श्री दत्तात्रेय होसबोले का आना दरअसल उसी परंपरा का विस्तार है जिसे भैया जी और उनके पूर्ववर्तियों ने स्थापित किया है। बावजूद इसके अंग्रेजी में स्नातकोत्तर, एक दक्षिण भारतीय छात्रनेता, अप्रतिम संगठनकर्ता जिसने जेपी आंदोलन से अपनी यात्रा प्रारंभ की, का इस तरह संघ के केंद्र में आना साधारण नहीं है। यह संघ में ‘नए विचार’ का आगमन भी है, जिसे ‘न्यू इंडिया’ के संकटों का समाधान भी खोजना है। श्री एचवी शेषाद्रि के बाद वे दूसरे ऐसे कर्नाटकवासी हैं, जिन्हें यह बहुत अहम पद मिला है।

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संघ जैसा समावेशी, उदार और लचीला संगठन ढूंढ़ने से नहीं मिलेगा। अपने में परिवर्तन करने, आत्मसमीक्षा करने और अपना दायरा बढ़ाते जाने के लिए संघ ख्यात रहा है। जिस तरह संघ ने समाज जीवन के सब क्षेत्रों, सब वर्गों में, सभी विचारवंतों में, सभी सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी सेवा भावना से जगह बनाई है, वह उसकी सोच को प्रकट करता है। इस अर्थ में संघ कहीं से जड़वादी संगठन नहीं है, जिसके कारण सांप्रदायिक और दायराबंद सोच पनपती है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, एकल विद्यालय जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने यह स्थापित किया कि समाज को जोड़ना और सेवा के माध्यम से भारत को बदलना ही उसका लक्ष्य है। सभी सरसंघचालकों ने स्वयंसेवकों में यह भाव भरने का प्रयास किया और यह सूक्ति ही उनका ध्येय वाक्य बन गयी- नर सेवा नारायण सेवा।

ऐसे समय में श्री दत्तात्रेय होसबोले का सरकार्यवाह पद पर आना पीढ़ीगत परिवर्तन के साथ-साथ वर्तमान समय की चुनौतियों को भी रेखांकित करता है। यह वह समय है, जब संघ विचार से प्रभावित स्वयंसेवक समाज जीवन के हर क्षेत्र में स्थापित हैं तथा बदलते हुए भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्राणपण से जुटे हैं। संघ की व्यवस्था में सरसंघचालक एक पूज्य मार्गदर्शक स्थान है और सरकार्यवाह ही दैनिक कार्यों का नेतृत्व करता है। ऐसे में भैयाजी का पिछले 12 वर्षों का नेतृत्व, चमत्कारी कार्यकाल ही कहा जाएगा। भैया जी ने स्वयं को बहुत लो-प्रोफाइल रखते हुए, विवादों से बचते हुए संघ और उससे जुड़े संगठनों को व्यापक विस्तार दिया। साथ ही संघ के समर्थक विचारों का राजनीतिक दल, केंद्रीय राजसत्ता में दो चुनावी जीत हासिल कर सत्ता में काबिज हो सका। संघ के संकल्पों में धारा 370 का हटना, गौ-हत्या के लिए कई राज्यों में कानून का बनना, राममंदिर का निर्माण होना ऐसी सूचनाएं हैं जो हर भारतीय को आह्लादित करती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल संघ की हमेशा चिंता में रहे हैं। इन अर्थों में संघ दलगत राजनीति से दूर भले है किंतु वह राष्ट्रीय प्रश्नों पर सार्थक हस्तक्षेप करता है। उसमें घुसपैठ से लेकर हमारी सुरक्षा चिंताएं, भाषा और संस्कृति की रक्षा के सवाल संयुक्त हैं। संघ की प्रतिनिधि सभा में पारित प्रस्तावों के विषय और उनकी भाषा देखें तो संघ का पवित्र मन हमारे ध्यान में आता है। इसलिए संघ के शीर्ष अधिकारी कहते हैं “संघ को जानना है तो संघ के पास आना होगा।” संघ पर उसके वैचारिक विरोधियों द्वारा लिखी गई किताबें आपको कभी सच के करीब नहीं जाने देंगीं।

  

ऐसे में नवनिर्वाचित सरकार्यवाह की चुनौतियां बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि संघ की संगठन के तौर अपनी कोई चुनौती नहीं है। संघ तो समूचे राष्ट्रजीवन और उसके भविष्य का विचार करता है इसलिए इस देश के प्रश्न, उसके संकट ही उसके मुद्दे हैं, चुनौतियां हैं। संघ उन संगठनों में भी नहीं है जो सवाल उठाकर और आंदोलन खड़े कर अपनी भूमिका का अंत मान लेते हैं। संघ सवाल भी उठाता है और उनके समाधान भी सुझाता है। इस मायने में यह उसकी विलक्षणता है। उसके स्वयंसेवक इसलिए समाज जीवन के हर क्षेत्र में सामाजिक व्याधियों का अंत और इलाज करते हुए दिखेंगे। वे आंदोलन करते, सवाल उठाते और सरकारों की घेराबंदी भर करते हुए नहीं दिखते। दत्तात्रेय होसबोले को संघ की इसी भावना का विस्तार करना है। समाजतोड़क गतिविधियों, देशविरोधी प्रयत्नों के विरुद्ध सज्जन शक्ति को ताकतवर बनाना उनका लक्ष्य होगा। जब आपके विचारों से मेल खाती हुई सरकार सत्ता में हो तो चुनौती और बढ़ जाती है।

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दत्ता जी को यह लक्ष्य संधान भी करना होगा कि राजनीति ही उनके कार्यकर्ताओं की मुख्य प्रेरणा न बन जाए। समाज जीवन में संघ के स्वयंसेवक अपनी सेवा भावना से स्वीकृति पाए हुए हैं, उनका परिमाण बढ़े और वे देश के संकटों को कम करने में सहायक बनें। हर संगठन के अपने राजनीतिक विचार होते हैं किंतु संघ ने राजनीति की बजाए ‘बदलाव और सेवा’ पर जोर दिया है। कर्नाटक में जन्मे दत्तात्रेय होसबोले उन लोगों में हैं, जो 13 साल की अल्पायु में संघ की शाखा में गए और पूरी जिंदगी इसी विचार के लिए लगा दी। आपातकाल में 16 माह जेल में रहे होसबोले संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 15 साल राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे। गौहाटी, पटना और लखनऊ जैसे स्थानों पर आपने लंबा समय गुजारा और देश भर में प्रवास किया। इस मायने में देश के युवाओं और विद्यार्थियों के बीच उनकी खास पहचान है। वे संघ का उदार और समावेशी चेहरा भी हैं। कई मायनों में ज्यादा आधुनिक भी। वे बहुभाषी हैं और बहुत अधिकार के साथ अनेक भारतीय और विदेशी भाषाएं बोलते हैं। विदेशों के व्यापक प्रवास ने आपको एक वैश्विक दृष्टि भी प्रदान की है और वे नए भारत की वैश्विक भूमिका को बहुत जिम्मेदारी से रेखांकित करते हैं। ऐसे नेतृत्व का शीर्ष पर आना संघ का एक नए युग में प्रवेश है। देखना है कि परंपरा के साथ सातत्य बनाए रखते हुए कैसे वे ‘न्यू इंडिया’ में अपने संगठन की भूमिका को रेखांकित करते हैं।

-प्रो. संजय द्विवेदी

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली के महानिदेशक हैं।)