370 खत्म करने का फैसला सिर्फ ऐतिहासिक नहीं बल्कि साहसिक भी है

By प्रभात झा | Publish Date: Aug 7 2019 11:27AM
370 खत्म करने का फैसला सिर्फ ऐतिहासिक नहीं बल्कि साहसिक भी है
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अब सरदार वल्लभ भाई पटेल के सपनों को यदि कोई साकार करेगा तो वो गुजरात का बेटा अमित शाह है। गृह मंत्री अमित शाह की खासियत है कि वे जिस कार्य में लगते हैं तो वहां जुनून से लगते हैं।

15 अगस्त को हम आजादी के जश्न के रूप में सन् 1947 से मना रहे हैं। लेकिन अब भारत आने वाले वर्षों में 5 अगस्त 2019 को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाएगा। इसका कारण है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भारत की भावना को समझते हुए पिछले 70 साल की भूल जो भारत को शूल की तरह चुभ रही थी, को 5 अगस्त को समाप्त करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। यह फैसला सिर्फ ऐतिहासिक नहीं है बल्कि साहसिक भी है। सरकार का निर्णय वह होता है जिससे भारतवासियों को लगे कि यह हमारा निर्णय है। भारत का प्रत्येक नागरिक रोटी से ज्यादा चिंता राष्ट्र की करता है।  वर्तमान की नरेन्द्र मोदी सरकार ने यह साफ कर दिया कि उनके सामने राष्ट्र से बड़ा कोई नहीं। धारा 370 को निष्प्रभावी करने का निर्णय न केवल इतिहास रचने वाला है बल्कि भूगोल बदलने वाला है। नरेन्द्र मोदी की सरकार के इस निर्णय ने भारत के प्रत्येक नागरिक की राष्ट्रीयता को जगा दिया। सभी ने देश में कहना शुरु किया कि अब जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है।


राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गृह मंत्री अमित शाह ने 5 जुलाई 2019 को इतिहास रच दिया। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को सरकार द्वारा निष्प्रभावी कर दिया गया। राष्ट्रपति ने संविधान आदेश (जम्मू-कश्मीर के लिए) 2019 पर दस्तखत कर दिए। संसद का सत्र चल रहा है, इस कारण से गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में इससे जुड़ा संकल्प भी पेश किया।  तत्काल बाद सरकार द्वारा अधिसूचना भी जारी कर दी गई। अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होते ही राज्य के पुनर्गठन का रास्ता साफ हो गया।
 
हम सभी को याद रखना होगा कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब धारा 370 लागू की थी तो कहा था कि यह अस्थायी अनुच्छेद है। यह घिसते-घिसते घिस जाएगा। लेकिन 70 साल बाद भी यह अनुच्छेद घिसा नहीं। नेहरू जी ने देश और खासकर जम्मू-कश्मीर के साथ अन्याय किया। संसद में भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने इसे निष्प्रभावी करने का जो संकल्प लाया उससे यह लगा कि राजनैतिक दल जो बातें अपने संकल्प पत्र में लिखते हैं उसे पूरा करने की दिशा में आगे आते हैं।
गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक भी प्रस्तुत कर दिया गया, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा। जैसा कि गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में हंगामे के बीच हुई चर्चा का जवाब देते स्पष्ट कहा है कि हमारा इरादा केंद्र शासित राज्य की व्यवस्था को लंबे समय तक बनाए रखने का नहीं है, उचित समय आने पर फिर राज्य बना दिए जाने के बारे में विचार किया जा सकता है।
 
हम सभी को जानकारी है कि 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह ने विलय संधि पर दस्तखत किए थे। उसी समय अनु्च्छेद 370 की नींव पड़ गई थी, जब समझौते के तहत केंद्र को सिर्फ विदेश, रक्षा और संचार मामलो में दखल का अधिकार मिला था। 17 अक्टूबर 1949 को अनुच्छेद 370 को पहली बार भारतीय संविधान में जोड़ा गया। सदन में गृहमंत्री अमित शाह ने गलत नहीं कहा कि अनुच्छेद 370 के कारण आज जम्मू-कश्मीर के लोग गुरबत की जिंदगी जी रहे हैं और इसकी छाया में 3 परिवारों ने आजादी से लेकर आज तक राज्य को लूटा है। अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में कभी भी लोकतंत्र प्रफुल्लित नहीं हुआ। अनुच्छेद 370 के कारण भ्रष्टाचार फला-फूला, पनपा और चरम सीमा पर पहुंचा। अनुच्छेद 370 के कारण ही गरीबी घर कर गई। 370 धारा की वजह से जम्मू कश्मीर और लद्दाख में लोकतंत्र मजबूत नहीं हो पाया। जम्मू कश्मीर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं अनुच्छेद 370 की वजह से नहीं मिल पाईं। उन्होंने सच ही कहा कि 40 हजार पंच-सरपंच का अधिकार 70 साल तक जम्मू कश्मीर के लोगों से ले लिया। इसका जिम्मेदार है अनुच्छेद 370। राष्ट्रपति शासन के बाद वहां चुनाव हुए और आज 40 हजार पंच-सरपंच वहां के विकास में योगदान दे रहे हैं। एक बड़े अचरज की बात उन्होंने कही कि जम्मू-कश्मीर में जो पाकिस्तान के शरणार्थी गए उन्हें आज तक नागरिकता नहीं मिल पाई है लेकिन देश को 2 प्रधानमंत्री पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने दिए हैं। मनमोहन सिंह और गुजराल जी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं पर उन्हें जम्मू-कश्मीर की नागरिकता नहीं मिल सकती।


 
गृह मंत्री अमित शाह ने सच ही कहा है कि देश के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 (3) के तहत पब्लिक नोटीफिकेशन से धारा 370 को समाप्त करने के अधिकार हैं। संविधान के अनुच्छेद 370(3) के अंतर्गत जिस दिन से राष्ट्रपति द्वारा इस सरकारी गजट को स्वीकार किया जाएगा उस दिन से अनुच्छेद 370 (1) के अलावा अनुच्छेद को कोई भी खंड लागू नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर में अभी राष्ट्रपति शासन है, इसलिए जम्मू-कश्मीर विधान सभा के सारे अधिकार संसद में निहित हैं। राष्ट्रपति जी के आदेश को हम बहुमत से पारित कर सकते हैं।
 
धारा 370 के फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में दोहरी नागरिकता का प्रावधान था। यहाँ का अलग संविधान और ध्वज था। अब यह नहीं रहेगा। दोनों ही हट जाएगा। इसके कारण प्रदेश से बाहर के लोगों के यहाँ जमीन खरीदने, सरकारी नौकरी पाने संस्थानों में दाखिला लेने का अधिाकर नहीं था। अब यह भी समाप्त हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर की विधान सभा का कार्यकाल छह साल का होता था। भारत की संसद यहां के संबंधों में सीमित दायरे में ही कनून बना सकती थी। यहां पर राज्यपाल की नियुक्ति होती थी। अब जम्मू-कश्मीर में दिल्ली की तरह विधान सभा वाला केन्द्र शासित प्रदेश होगा। इसका कार्यकाल पांच वर्ष होगा।  साथ ही लद्दाख पूर्णत: केन्द्र शासित राज्य होगा।
 
पहले रक्षा-विदेश मामले और संचार के अलावा किसी कानून के लागू करवाने के लिए केन्द्र सरकार को राज्य सरकार की मंजूरी चाहिए होती थी। अब जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में उपराज्यपाल का पद होगा। राज्य की पुलिस केन्द्र के अधिकार क्षेत्र में रहेगी। जम्मू-कश्मीर कैडर के आईपीएस, आईएएस अधिकारी यूटी कैडर के अधिकारी हो जाऐंगे। जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी करती थी तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता समाप्त हो जाती थी। अब किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी के बाद जम्मू-कश्मीर की महिला के अधिकारों व उसकी नागरिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पाकिस्तानी नागरिकों को मिला विशेषाधिकार खत्म होगा।
पूर्व में राज्य में आपात स्थिति में राज्यपाल शासन लगाने का प्रावधान था। कश्मीर से हिन्दू-सिख आदि अल्पसंख्यकों को 16 फीसदी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता था। अब यहां अनुच्छेद 356 का भी उपयोग हो सकेगा। यानि राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकेगा। अब अल्पसंख्यकों को आारक्षण का लाभ मिल सकता है।
 
पूर्व में सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और सीएजी लागू नहीं होती थी। यहां रणवीर दंडसंहिता लागू थी अब सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे कानून लागू हो सकेंगे। भारतीय दंड संहिता भी प्रभावी होगी। नए कानून और कनून में होने वाले संशोधन अब स्वयं यहां पर लागू हो जायेंगे।
 
पूर्व में बाहरी राज्यों के व्यक्ति न मतदान कर सकता था और न ही चुनावों में उम्मीदवार बन सकता था लेकिन अब भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर का मतदाता और चुनाव में उम्मीदवार हो सकेगा। भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला यहां मान्य नहीं होता था। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिए गए फैसले अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भी मान्य होंगे।
 
इतिहास के पन्ने भी पलटने चाहिए
 
भारतीय जनसंघ के संस्थापक और पहले अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के विरुद्ध पहला आंदोलन किया था। उन्होंने उस कानून को, जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर जाने के लिए परमिट की आवश्यकता होगी, को तोड़ते हुए सन् 1953 में कश्मीर में प्रवेश किया था। उस समय के वहां के प्रधान शेख अब्दुल्ला ने उन्हें गिरफ्तार किया। वे आजाद भारत के पहले व्यक्ति थे जिनकी मौत वहीं पर हिरासत में हुई। वे जम्मू-कश्मीर की लड़ाई लड़ने वाले पहले भारतीय थे जो शहीद हुए।
 
जनसंघ ने नारा दिया था कि एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो संविधान और एक देश में दो निशान नहीं चलेगा-नहीं चलेगा। भारतीय जनसंघ जब देश के किसी राज्य में नहीं था उसकी नगर निगम तक में उपस्थिति नहीं थी तब से यह बात वे अपने घोषणा पत्र में लिखते चले आ रहे थे और आंदोलन करते रहे। यहां तक कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जब शेख अबदुल्ला ने परमिट तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया तभी अटल बिहारी वाजपेयी जो पाञ्चजन्य के पत्रकार के रूप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कश्मीर गए थे, को मुखर्जी ने कहा, "वाजपेयी गो बैक एंड टेल दी पीपुल्स ऑफ इंडिया डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इंटर्ड इन कश्मीर विदाउट परिमिट"। यहीं से अटलजी लौटे और उन्होंने अपना मन बदला। पत्रकारिता छोड़कर वे भारत माँ की सेवा के लिए राजनीति में आ गए। यही कारण है कि जब आप अटलजी के जीवन के प्रारम्भ की कविताएं पढ़ेंगे तो वह कश्मीर पर आधारित ही होती थीं।
 
जम्मू-कश्मीर की यह घटना अटलजी सहित जनसघ के सभी नेताओं और आज के भाजपा नेताओं को सदैव सालती रही। जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी बने तो उन्होंने देश में एकात्म यात्रा की शुरुआत की और साथ ही कहा कि वे जम्मू-कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहरायेंगे। हम सभी को याद रखना होगा और लाल चौक पर तिरंगा फहराने की इस यात्रा का भाजपा ने वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मा सौंपा था। मोदी जी उस एकात्मता यात्रा के संयोजक थे। जम्मू-कश्मीर और तत्कालीन भारत सरकार ने लाल चौक पर तिरंगा फहराने पर रोक लगा दी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी नहीं माने। डॉ. जोशी ने कहा- चाहे जान चली जाए हम तो लाल चौक पर तिरंगा फहरायेंगे। उस समय नरेन्द्र मोदी का जो भाषण हुआ था वह 5 अगस्त का भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में साकार किया। मुझे यह वाकया इसलिए स्मरण है क्योंकि मैं स्वयं 'स्वदेश' के सहसंपादक के नाते डॉ. जोशी और मोदी जी के साथ लालकिले पर तिरंगा फहराने हवाई जहाज से स्व. प्यारेलाल खंडेलवाल के साथ गया था।
नरेन्द्र मोदी देश को सर्वोपरि मानते हैं। राष्ट्र का मस्तक ऊंचा रहे इस दिशा में निर्णय लेते हैं। मुझे यहां कहने और लिखने में कोई संकोच नहीं कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पूरा सहयोग तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को कभी नहीं मिला। अगर मिला होता तो आज भारत की परिस्थिति अलग होती। लेकिन गृहमंत्री अमित शाह का यह सौभाग्य है कि उन्हें नेता और देश के प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी मिले हैं। अमित भाई शाह को हर पल हर क्षण नरेन्द्र भाई मोदी का सामर्थपूर्ण समर्थन राष्ट्रहित में मिला है। यही कारण है कि लोग दबे छुपे शब्दों में कहते सुने जाते हैं कि अब सरदार वल्लभ भाई पटेल के सपनों को यदि साकार करेगा तो वो गुजरात का बेटा अमित शाह है। गृह मंत्री अमित शाह की खासियत है कि वे जिस कार्य में लगते हैं तो वहां जुनून से लगते हैं। वे काम को परिणाम तक ले जाने में विश्वास करते हैं। लोग क्या समझते हैं मुझे पता नहीं पर 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति और जम्मू-कश्मीर में राज्य पुनर्गठन का संकल्प लाकर वे आजाद भारत के वे नेता हो गए जिस पर राष्ट्र विश्वास करता है और आगे भी करेगा।
 
-प्रभात झा
सांसद (राज्य सभा)
भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
 

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