किसके लिए सिरदर्द साबित होंगे शिवपाल यादव और बाहुबली राजा भइया

By अजय कुमार | Publish Date: Nov 19 2018 5:06PM
किसके लिए सिरदर्द साबित होंगे शिवपाल यादव और बाहुबली राजा भइया
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उत्तर प्रदेश में आम चुनाव की आहट के बीच एक और नये दल ने ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी से बगावत करके अपना अलग दल बनाने वाले अखिलेश के चचा शिवपाल यादव हुंकार भर ही रहे थे।

उत्तर प्रदेश में आम चुनाव की आहट के बीच एक और नये दल ने ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी से बगावत करके अपना अलग दल बनाने वाले अखिलेश के चचा शिवपाल यादव हुंकार भर ही रहे थे, इस बीच निर्दलीय विधायक और बाहुबली नेता कुंवर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया ने भी अपनी अलग पार्टी बना की घोषणा कर दी। शिवपाल और राजा भइया के के मैदान में आने के बाद यूपी की सियासत में काफी खींचतान दिखने लगी है। शिवपाल और राजा भइया ने नया दल बनाकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के साथ−साथ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के  नेताओं की भी नींद हराम कर दी है। आकलन इस बात का भी हो रहा है कि कौन किसको कितना नफा−नुकसान पहुंचायेगा। समाजवादी पार्टी से बगावत करके अपना अलग दल बनाने वाले शिवपाल यादव मुस्लिम और यादव वोटरों के सहारे अपनी स्थिति मजबूत करने का सपना पाले हुए हैं तो राजा भइया की नजर अपर कास्ट वोटरों खासकर क्षत्रिय मतदाताओं पर है जिनकी यूपी में करीब 6−7 प्रतिशत तो पूर्वांचल में दस प्रतिशत के करीब है। राजा भइया की प्रतापगढ़ के आसपास के दो−तीन जिलों में अच्छी−खासी पैठ है। राजा भइया नौकरियों में आरक्षण और एससी−एसटी एक्ट में पहले गिरफ्तारी फिर विवेचना के कानून को मुददा बनाकर अपर कास्ट वोटरों को लुभाना चाह रहे हैं। आरक्षण और एससी−एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मोदी सरकार द्वारा पलटे जाने के बाद जिस तरह से सर्वण समाज नाराजगी जताते हुए सड़क पर उतरा था, उसे राजा भइया अपने पक्ष में करने का सपना इसलिये पाले हुए हैं क्योंकि दलितों और पिछड़ों की नाराजगी से बचने के लिये किसी भी दल का नेता सर्वण मतदाताओं का साथ नहीं दे रहा है।
भाजपा को जिताए
 
शिवपाल यादव और राजा भइया की पार्टी किसको कितना नुकसान पहुंचायेंगी, यह तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन अपनी ताकत के बल पर यह दल वोट नोचवा तो साबित हो ही सकते हैं। ऐसा हुआ तो कई लोकसभा सींटों पर इसका अच्छा−खासा असर पड़ेगा। कुछ लोग शिवपाल के साथ−साथ राजा भइया के भी अलग दल बनाये जाने को भारतीय जनता पार्टी से जोड़कर देख रहे हैं। शिवपाल के बाद राजा भइया को भी बीजेपी की बी टीम बताया जा रहा है। मगर सच्चाई यह भी है कि हाल−फिलहाल में शिवपाल का बीजेपी के साथ जाना नामुनकिन है जबकि राजा भइया जिधर अपना फायदा देखेंगे उधर का रूख कर सकते हैं, परंतु राजा भइया ने दलितों और पिछड़ों के खिलाफ जो राह पकड़ी है, उससे उनके लिये शायद ही कोई दल आसानी से रास्ता खोलेगा।
 


बहरहाल,बात राजा भइया की कि जाये तो उत्तर प्रदेश की सियासत में दूर−दूर तक कोई ऐसा नेता नजर नहीं आता है जो करीब ढाई दशक से विधान सभा चुनाव जीत रहा हो, लेकिन किसी सियासी दल का सदस्य न हो, सिवाय कुण्डा जिला प्रतापगढ़ के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया के। राजा भइया पहली बार 1993 में 12 वीं विधान सभा चुनाव में चुनाव जीत के आये थे, तब से लेकर 2017 तक उन्हें बिना अपना निर्वाचन क्षेत्र बदले किसी भी विधान सभा चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा। राजा भइया कहते भी थे कि राजा किसी के अधीन नहीं रह सकता है। राजा भइया चुनाव जरूर निर्दलीय लड़ते थे,लेकिन उनकी पकड़ कई विधान सभा सीटों तक थी। उनकी पहचान दबंग नेताओं में होती थी। अपने स्वभाव के कारण वह बसपा को छोड़कर अन्य तमाम दलों के प्यारे भी रहे। राजा भइया की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने सियासी सफर के दौरान कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव और अंत में अखिलेश यादव तक की सरकारों ने उन्हें मंत्री पद से नवाजा था। हॉ, राजा भइया के संबंध बसपा सुप्रीमों मायावती के साथ अच्छे नहीं रहे। माया राज में राजा को जेल तक की हवा खानी पड़ी थी, लेकिन राजा की ताकत कभी कम नहीं हुई।
 
2017 के विधान सभा चुनाव के बाद जरूर राजा भइया की सियासत का रंग फींका पड़ गया। यह तब हुआ जबकि राजा भइया के सीएम योगी से पुराने संबंध थे। राजा भइया की सियासत में कमजोर पड़ती पकड़ से उनके समर्थक भी उदास रहने लगे। आम चुनाव भी होने वाले थे। आम चुनाव में राजा कमजोर नहीं दिखें इस लिये 25 वर्ष का सियासी सफर पूरा कर चुके रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को अपना अलग संगठन बनाने का निर्णय लेना पड़ा, जिसका नाम उन्होंने रखा जनसत्ता दल। हालांकि अभी चुनाव आयोग से उनके नाम को मंजूरी नहीं मिली है। उनकी पार्टी के नाम में थोड़ा−बहुत बदलाव हो सकता है। अपना अलग दल बनाते ही राजा भइया इसकी ताकत बढ़ाने में भी जुट गये हैं। इसके लिये जनसत्ता दल की 30 नवंबर को लखनऊ में एक रैली बुलाई गई है। रैली की तैयारी में लगे राजा भैया से जब मीडिया ने अलग दल बनाए जाने की जरूरत के संबंध में पूछा तो उनका कहना था कि एससी−एसटी एक्ट का विरोध करने के लिए उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई है। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रमोशन में भी आरक्षण प्रतिभाओं के साथ अन्याय है। अगर एक बार किसी को आरक्षण का लाभ मिला तो आगे उसको लाभ नही मिलना चाहिए। हमारी पार्टी इसके खिलाफ मोर्चा खोलेगी।
 
उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी जातीय आधार पर प्रमोशन के खिलाफ है। हम मानते हैं कि योग्यता प्रमोशन का आधार होनी चाहिए। दलित और गैर दलित के बीच मिलने वाली सरकारी सुविधाओं में भेदभाव हो रहा है, जिसका हम विरोध करेंगे। दलित और गैर दलित के बीच भेदभाव हो रहा। राजा भैया ने कहा कि कुछ मुद्दे ऐसे है जिसपर सियासी पार्टिया सदन और बाहर कही भी नही बोलते। ऐसा ही एक मुद्दा है एससी−एसटी एक्ट। एक्ट। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी के समय एससी−एसटी एक्ट बना और समय के साथ इसमे जटिलता आती गई।


 
राजा भैया 30 नवंबर को लखनऊ में अपने सम्मान समारोह के दौरान अलग दल की घोषणा करेंगे। एमएलसी कुंवर अक्षय प्रताप सिंह ने चित्रकूट में कहा कि नई पार्टी का नाम जनसत्ता दल होगा। उन्होंने कहा यह दल गरीबों, मजलूमों व आम जन की आवाज बनेगा। रजत जयंती समारोह में भारी जनसैलाब जुटाकर कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने में जुटे राजा भैया के करीबी विधान परिषद के सदस्य अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल जी धर्मनगरी चित्रकूट के दौरे पर पहुंचे। यहां अक्षय प्रताप ने कहा कि आम जनता के स्वाभिमान व सम्मान के लिए राजा भैया नई पार्टी का गठन कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में किसी दल के साथ गठबंधन से उन्होंने इंकार किया। राजा भइया लोकसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी भी उतारने की बात कह रहे हैं। देखने वाली बात यह होगी कि वह किसका सिरदर्द बढ़ायेंगे।
 
- अजय कुमार


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