ईरान वार पर वार किये जा रहा है मगर खाड़ी देश पलटवार की हिम्मत तक नहीं दिखा पा रहे

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ANI

सबसे खतरनाक बात यह है कि अब ऊर्जा खुद एक हथियार बन चुकी है। गैस संयंत्र, तेल क्षेत्र और बंदरगाह अब सैन्य निशाने हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो दुनिया को एक ऐसे ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है जो पहले कभी नहीं देखा गया।

तेल, गैस और बारूद की गंध अब एक साथ हवा में तैर रही है। पश्चिम एशिया में भड़की जंग ने दुनिया को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हर अगला दिन एक नए खतरे का संकेत दे रहा है। यह सिर्फ दो देशों के बीच का टकराव नहीं रहा, बल्कि पूरी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को सीधे निशाने पर ले आया है।

देखा जाये तो इजराइल ने जब ईरान के साउथ पार्स गैस क्षेत्र पर हमला किया, तो यह सीधा उस नस पर वार था जिससे पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति चलती है। जवाब में ईरान ने भी देर नहीं की और कतर के रास लफ्फान गैस केंद्र को निशाना बना दिया। यह वही केंद्र है जो दुनिया की कुल गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संभालता है। यानी अब जंग सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि दुनिया की रसोई और उद्योगों तक पहुंच चुकी है।

तेल बाजार में हाहाकार मच गया। कीमतें अचानक उछलकर एक सौ बीस डॉलर के करीब पहुंच गईं। यह सिर्फ आर्थिक उतार चढ़ाव नहीं था, बल्कि उस डर का इजहार था कि फारस की खाड़ी अब बारूद का ढेर बन चुकी है, जहां से किसी भी वक्त पूरी दुनिया प्रभावित हो सकती है।

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इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक अजीब-सा दोहरा रुख अपनाया। एक तरफ उन्होंने कहा कि अमेरिका का इस हमले से कोई लेना देना नहीं, दूसरी तरफ ईरान को खुली चेतावनी दे डाली कि अगर कतर पर दोबारा हमला हुआ तो साउथ पार्स को पूरी तरह तबाह कर दिया जाएगा। यहीं से कहानी और पेचीदा हो जाती है। अब तक अमेरिका और इजराइल एक ही पाले में नजर आते थे, लेकिन अब दोनों के मकसद अलग अलग दिखने लगे हैं। ट्रंप एक कारोबारी की तरह सोचते हैं, वह ईरान पर दबाव बनाकर उसे अपने हिसाब से झुकाना चाहते हैं। लेकिन इजराइल की मंशा इससे कहीं आगे है, वह ईरानी शासन को पूरी तरह खत्म करना चाहता है। यह दरार अब अमेरिका के भीतर भी दिखने लगी है। ट्रंप के अपने समर्थक सवाल कर रहे हैं कि क्या अमेरिका किसी और की लड़ाई में उलझता जा रहा है।

दूसरी तरफ ईरान ने भी साफ कर दिया है कि अब वह पीछे हटने वाला नहीं है। उसके विदेश मंत्री ने खुले शब्दों में कहा है कि अगर दोबारा उसके ऊर्जा ढांचे पर हमला हुआ तो वह बिना किसी संयम के पूरी ताकत से जवाब देगा। हम आपको बता दें कि ईरान ने सिर्फ कतर ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन तक को अपने निशाने पर ले लिया है। मिसाइलें और ड्रोन अब पूरे क्षेत्र में घूम रहे हैं। हर हमला यह संकेत दे रहा है कि जंग अब फैल चुकी है और इसे रोकना आसान नहीं होगा।

खाड़ी देशों की स्थिति सबसे ज्यादा नाजुक हो गई है। एक तरफ वह ईरान की कार्रवाई से नाराज हैं, दूसरी तरफ उन्हें डर है कि अगर वह सीधे युद्ध में उतर गए तो अमेरिका कभी भी पीछे हट सकता है और वह अकेले पड़ जाएंगे। हालांकि सऊदी अरब ने चेतावनी दी है कि जरूरत पड़ी तो वह सैन्य कार्रवाई करेगा। उधर, कतर ने ईरानी अधिकारियों को देश छोड़ने का आदेश दे दिया है। लेकिन इन सबके बीच एक अनकहा डर साफ दिखता है, यानि कोई भी देश पूरी तरह इस आग में कूदने को तैयार नहीं है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि अब ऊर्जा खुद एक हथियार बन चुकी है। गैस संयंत्र, तेल क्षेत्र और बंदरगाह अब सैन्य निशाने हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो दुनिया को एक ऐसे ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है जो पहले कभी नहीं देखा गया। यह संकट सिर्फ पेट्रोल या गैस की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर हर घर, हर उद्योग और हर देश पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी, आपूर्ति टूटेगी और अर्थव्यवस्थाएं हिल जाएंगी। अब सवाल यही है कि क्या इस आग को बुझाने का कोई रास्ता बचा है। सच यह है कि इस समय केवल अमेरिका ही ऐसा देश है जिसके पास दोनों पक्षों को रोकने की ताकत है। लेकिन क्या ट्रंप ऐसा करना चाहते हैं, यह सबसे बड़ा सवाल है। अगर अमेरिका बिना शर्त इजरायल का साथ देता रहा तो यह संघर्ष पूरी तरह ऊर्जा युद्ध में बदल जाएगा। लेकिन अगर वह दूरी बनाकर किसी समझौते की राह निकालता है, तभी हालात संभल सकते हैं।

बहरहाल, एक चीज साफ दिख रही है कि कूटनीति नाकाम होती जा रही है। बातचीत की जगह अब धमाके सुनाई दे रहे हैं। हर देश अपनी ताकत दिखाने में लगा है, लेकिन कोई भी यह नहीं सोच रहा कि इसका अंत कहां होगा। अगर अब भी दुनिया नहीं संभली तो अगला संकट सिर्फ ऊर्जा का नहीं होगा, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था को हिला देने वाला होगा। खाड़ी में लगी आग दूर बैठे देशों को भी झुलसा देगी। और तब शायद संभलने का मौका ही नहीं बचेगा।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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