बंगाल भाजपा में भगदड़ मची है लेकिन पार्टी नेतृत्व को इसकी परवाह ही नहीं है

Arjun Singh
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हाल के दिनों में देखें तो भाजपा के पाँच विधायकों के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे मुकुल रॉय, सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे बाबुल सुप्रियो और अब सांसद अर्जुन सिंह पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में चले गये हैं। पिछले दिनों राजीब बनर्जी, सब्यशाची दत्ता और जयप्रकाश मजूमदार भी भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में लौट चुके हैं।

पश्चिम बंगाल भाजपा में मचा तूफान शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा है। ऐसा लग रहा है कि इस तूफान को शांत करने में भाजपा आलाकमान भी कोई रुचि नहीं ले रहा है। पिछले कुछ दिनों से लगातार भाजपा और केंद्र सरकार की आलोचना कर रहे पार्टी के सांसद अर्जुन सिंह तृणमूल कांग्रेस में वापस चले गये हैं। कल तक अर्जुन सिंह यही कह रहे थे कि मैं सिर्फ नेतृत्व का ध्यान असल मुद्दों की तरफ आकृष्ट कर रहा हूँ और पार्टी छोड़ने का कोई इरादा नहीं है लेकिन एकाएक वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा में शामिल हुए अर्जुन सिंह कल तक तृणमूल कांग्रेस के अत्याचारों के खिलाफ लड़ रहे थे लेकिन लड़ते-लड़ते अचानक वह अपनी पुरानी पार्टी में शामिल हो गये। भाजपा सांसद अर्जुन सिंह ने इसे अपनी पुरानी पार्टी में ‘‘सभी समस्याओं के समाधान के बाद घर वापसी’’ करार दिया है। 

भाजपा में भगदड़ के दौरान कई ने साथ छोड़ा

हाल के दिनों में देखें तो भाजपा के पाँच विधायकों के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे मुकुल रॉय, सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे बाबुल सुप्रियो और अब सांसद अर्जुन सिंह पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में चले गये हैं। पिछले दिनों राजीब बनर्जी, सब्यशाची दत्ता और जयप्रकाश मजूमदार भी भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में लौट चुके हैं। भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी के बारे में भी अटकलें लगती रही हैं कि वह तृणमूल कांग्रेस में जा सकती हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या और भी भाजपा सांसद या विधायक पार्टी का दामन छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का हाथ थामेंगे?

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बंगाल में भाजपा संगठन की हालत खस्ता

देखा जाये तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद से भाजपा राज्य में कमजोर पड़ती जा रही है। जबसे दिलीप घोष की जगह सुकांत मजूमदार को पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष बनाया गया है तबसे वरिष्ठ और युवा नेताओं के बीच खाई बढ़ती ही जा रही है। हाल ही में संपन्न एक विधानसभा और लोकसभा उपचुनाव में भाजपा का जो हश्र हुआ था उसके बाद पार्टी नेताओं ने आपस में ही कैसे एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी की थी वह सबके सामने है। हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बंगाल दौरे के बाद माना जा रहा था कि अब सबकुछ ठीक हो जायेगा लेकिन अर्जुन सिंह का पार्टी छोड़ना दर्शाता है कि सबकुछ ठीक हो नहीं सका। अमित शाह ने बंगाल दौरे के दौरान पार्टी नेताओं को एकजुटता के साथ तृणमूल कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए कहा था लेकिन अर्जुन सिंह ने उनकी बात नहीं सुनी। आश्चर्य इस बात पर है कि जिन अर्जुन सिंह पर भाजपा में आने के बाद कथित रूप से तृणमूल कांग्रेस की ओर से कई हमले किये गये, उनके कार्यालय और घर पर हमला किया गया, जो अर्जुन सिंह कल तक बंगाल में राजनीतिक हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस को कोसते फिर रहे थे उनका हृदय अचानक कैसे परिवर्तित हो गया?

कौन हैं सांसद अर्जुन सिंह?

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस के विधायक रहे अर्जुन सिंह जब भाजपा में आये थे तो पार्टी ने उन्हें बैरकपुर लोकसभा सीट से टिकट दे दिया और मोदी लहर में अर्जुन सिंह तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे दिनेश त्रिवेदी को हराकर लोकसभा पहुँच गये। लेकिन मंत्रिमंडल में शामिल होने का उनका लक्ष्य पूरा नहीं हो सका इसीलिए उनका असंतोष जब तब सामने आना लगा। अर्जुन सिंह ने अब तृणमूल में शामिल होने के बाद कहा है कि वह ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में एक परिवार की तरह काम करेंगे। देखा जाये तो भले भाजपा के कई नेता तृणमूल में चले गये लेकिन अर्जुन सिंह का भाजपा छोड़ना पार्टी के लिए ज्यादा नुकसानदेह इसलिए है क्योंकि वह प्रमुख हिंदीभाषी नेता थे जोकि बंगाली समाज पर भी अच्छी पकड़ रखते हैं। श्रमिक नेता, व्यवसायी और सांसद के तौर पर जमीनी स्तर पर उनकी अच्छी पकड़ है जिसका फायदा भाजपा को अब तक मिल रहा था लेकिन अब यह सियासी लाभ तृणमूल कांग्रेस को मिलेगा। बैरकपुर में बड़ी संख्या में हिंदीभाषी श्रमिक हैं जिन पर अर्जुन सिंह का अच्छा प्रभाव माना जाता है क्योंकि खुद अर्जुन सिंह मूल रूप से बिहार के सीवान से ताल्लुक रखने हैं। हम आपको बता दें कि अर्जुन सिंह के पिता सत्यनारायण सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। पिता की तरह अर्जुन सिंह ने भी अपनी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की। 1995 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर भाटपारा नगर निगम का चुनाव लड़कर पहली जीत हासिल की थी। 1998 में ममता बनर्जी ने जब तृणमूल कांग्रेस का गठन किया तब उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी और तृणमूल के साथ आ गये थे। जहां तक बैरकपुर क्षेत्र के समीकरणों की बात है तो वहां की राजनीति अब बिलकुल उलटी हो गयी है। ममता बनर्जी के करीबी नेता रहे दिनेश त्रिवेदी अब भाजपा के साथ हैं और अर्जुन सिंह तृणमूल कांग्रेस में चले गये हैं। 

अर्जुन सिंह ने क्यों छोड़ी भाजपा?

अर्जुन सिंह ने भाजपा छोड़ने के कारणों के बारे में बताया है कि केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल के जूट उद्योग को नजर अंदाज कर रही है। उनका कहना है कि केंद्र सरकार की जूट नीति पर मेरे विरोध के बावजूद कुछ हासिल नहीं हुआ। अर्जुन सिंह ने हालांकि यह माना है कि केंद्र सरकर ने हाल में कुछ कदम उठाए थे लेकिन उन्होंने उसे बहुत मामूली कदम बताते हुए कहा कि अभी लंबा रास्ता तय करना है। अब अर्जुन सिंह भले कुछ भी आरोप लगा रहे हों मगर हम आपको बता दें कि हाल ही में उनकी तथा उद्योग की मांग मानते हुए केंद्र सरकार की ओर से कच्चे जूट की अधिकतम कीमत 6,500 रुपये प्रति कुंतल की सीमा को खत्म कर दिया गया था। इसके अलावा अर्जुन सिंह को यह भी लग रहा था कि उनके जैसा वरिष्ठ नेता पश्चिम बंगाल भाजपा इकाई में उपाध्यक्ष है और युवा नेता तथा राजनीति में उनसे कम अनुभवी सुकांत मजूमदार पार्टी के अध्यक्ष हैं। यही नहीं तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये शुभेंदु अधिकारी को भाजपा ने विधानसभा में विपक्ष का नेता बना रखा है और राज्य से संबंधित पार्टी मामलों में भाजपा आलाकमान अर्जुन सिंह से ज्यादा शुभेंदु अधिकारी को महत्व देता था जोकि उन्हें नहीं भा रहा था। यही कारण है कि अर्जुन सिंह पिछले कुछ दिनों से लगातार आरोप लगा रहे थे कि भाजपा में जो लोग संगठन के बारे में कुछ नहीं समझते हैं वे हमें उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन सिंह का आरोप था कि पार्टी ने हमें एक कुर्सी दी है, लेकिन उसके पास पैर नहीं हैं। उनका आरोप था कि पार्टी ने हमें एक कलम दी है लेकिन इसमें स्याही नहीं है। उनके इस प्रकार के आरोपों पर भाजपा की ओर से कुछ भी नहीं कहा जा रहा था क्योंकि पार्टी को पता लग चुका था कि अर्जुन सिंह की तृणमूल कांग्रेस से बात चल रही है और वह कभी भी पाला बदल सकते हैं।

भाजपा ने अर्जुन सिंह को मनाने के क्या प्रयास किये?

सबकुछ जानने के बावजूद भाजपा ने अर्जुन सिंह को मनाने के प्रयास जारी रखे हुए थे। अर्जुन सिंह की पश्चिम बंगाल भाजपा नेतृत्व के प्रति शिकायतों को अभी इसी 17 मई को खुद पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिल्ली में सुना था। केंद्रीय नेताओं के साथ अर्जुन सिंह की बैठक के दौरान पार्टी ने उन्हें लिखित में अपनी शिकायतें देने को कहा था जिसके बाद अर्जुन सिंह ने जो पत्र दिया उसमें आरोप लगाया कि बंगाल में पार्टी नेताओं का जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से कोई संपर्क नहीं है और जो नेता केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, उन्हें पार्टी की राज्य इकाई में प्रमुखता मिल रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि उन्हें कोई वास्तविक अधिकार दिये बिना प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया गया है।

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भाजपा की प्रतिक्रिया

दूसरी ओर, अर्जुन सिंह के चले जाने को भाजपा ने खास तवज्जो नहीं दी है। भाजपा का कहना है कि ‘‘अवसरवादियों’’ के जाने से पार्टी पर कोई असर नहीं होगा। भाजपा का कहना है कि ऐसे लोग जो सत्ता के करीब रहना पसंद करते हैं, उनके जाने से पार्टी पर कोई असर नहीं होगा। बंगाल भाजपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष तो सीधा आरोप लगा रहे हैं कि अर्जुन सिंह ने तृणमूल कांग्रेस के दबाव में आकर पार्टी में वापसी की है क्योंकि जबसे वह भाजपा में आये थे तबसे उनके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हो गये थे और उनके व्यवसाय के लिए भी दिक्कतें खड़ी की जा रही थीं।

बहरहाल, भाजपा भले ही अर्जुन सिंह के जाने को बहुत बड़ा झटका नहीं मान रही है लेकिन इतना तो है ही कि बंगाल भाजपा में पिछले एक साल से जो भगदड़ मची हुई है और वरिष्ठ नेताओं तथा युवा नेताओं के बीच जिस तरह खाई बढ़ती जा रही है वह पार्टी के भविष्य के लिए सही नहीं है। भाजपा आलाकमान ने यदि पश्चिम बंगाल में पार्टी संगठन पर तुरंत ध्यान नहीं दिया तो 2024 के लोकसभा चुनावों में 2019 जैसा प्रदर्शन दोहरा पाना मुश्किल हो सकता है। वैसे सिर्फ भाजपा के ही सांसद तृणमूल में गये हों ऐसा भी नहीं है। तृणमूल कांग्रेस के दो सांसद कांथी से सिसिर अधिकारी और तामलुक से दिब्येंदु अधिकारी भाजपा के साथ हैं। उल्लेखनीय है कि सिसिर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के पिता हैं जबकि दिब्येंदु उनके छोटे भाई हैं।

- नीरज कुमार दुबे

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