फांसी जैसी सजा से ही रुकेंगी पुलिस हिरासत में मौतें

सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर 2025 को एक मामले की सुनवाई करते हुए हिरासत में हिंसा और मौतों को सिस्टम पर धब्बा बताया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा था कि अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं।
देश के न्यायालयों ने एक बार फिर पुलिस का वीभत्स चेहरा उजागर कर दिया है। आम लोगों की सुरक्षा के गठित किया गया पुलिस तंत्र किस कदर तानाशाह बन गया है, अदालतों के फैसलों ने इसे बेनकाब किया है। मदुरै की एक अदालत ने सातानुकुलम पुलिस स्टेशन में बाप-बेटे की मौत के मामले में 9 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई है। इसके अलावा सभी दोषियों पर भारी ज़ुर्माना भी लगाया गया है। तूतीकोरिन ज़िले के सातानुकुलम के व्यापारी जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को 19 जून 2020 को कोरोना काल के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया और बुरी तरह पीटा। इसके बाद 21 जून को दोनों को कोविलपट्टी जेल में रखा गया। 22 जून की रात क़रीब 9 बजे बेनिक्स की मौत हो गई, जबकि अगली सुबह जयराज की भी मौत हो गई। इस मामले ने पूरे देश में बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने खुद संज्ञान लेते हुए पुलिस से रिपोर्ट मांगी। बाद में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया।
इसी तरह लुधियाना जिले में करीब छह साल पहले रिकवरी एजेंट दीपक शुक्ला की थाना डिविजन नंबर 5 की पुलिस हिरासत में हुई थी। मौत के मामले में लुधियाना की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या के तहत आरोप तय करने के आदेश जारी किए हैं। यह पूरा मामला फरवरी 2020 का है, जब पुलिस ने दीपक शुक्ला को वाहन चोरी के एक मामले में हिरासत में लिया था। दीपक पर चोरी का झूठा मामला दर्ज कर उसे अमानवीय यातनाएं दीं। 26 फरवरी 2020 की रात दीपक ने दम तोड़ दिया, जिसके बाद पुलिसिया तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। दीपक के परिवार ने इंसाफ के लिए एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ी।
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पंजाब के मोगा जिले में भिंदर सिंह की मौत गैरकानूनी हिरासत में रखकर यातनाएं देने से हुई थी। न्यायिक जांच में सामने आया कि भिंदर सिंह को कथित तौर पर गैरकानूनी हिरासत में रखकर यातनाएं दी गईं। इस मामले में स्थानीय अदालत ने पंजाब पुलिस के पांच कर्मियों के खिलाफ हत्या समेत अन्य गंभीर धाराओं में ट्रायल चलाने का आदेश देते हुए केस को सेशन कोर्ट में भेज दिया है। जुलाई 2024 को मध्यप्रदेश के बिलाखेड़ी निवासी युवक की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। पुलिस ने 8 लाख रुपये की कथित चोरी के आरोप में उसे हिरासत में लिया था। हिरासत में मौत के बाद उसकी मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसके परिणामस्वरूप 15 मई को सीबीआई जांच का आदेश जारी हुआ। इस जांच के सिलसिले में एजेंसी ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि हिरासत में हुई मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाने वाले दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अभी भी फरार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर 2025 को एक मामले की सुनवाई करते हुए हिरासत में हिंसा और मौतों को सिस्टम पर धब्बा बताया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा था कि अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं। शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। 4 सितंबर को दिए गए अपने आदेश का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि राजस्थान में आठ महीनों में 11 हिरासत में हुई मौतों की रिपोर्ट सामने आई है।कोर्ट ने कहा कि इससे साफ़ है कि हिरासत में अत्याचार कम होने के बजाय जारी हैं। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र की ओर से थानों में सीसीटीवी को लेकर मांगी गई रिपोर्ट न सौंपने पर कड़ी नाराज़गी जताई थी। केंद्र सरकार ने एक भी रिपोर्ट जमा नहीं की। जस्टिस नाथ ने इस पर कड़ा एतराज़ जताते हुए कहा था कि केंद्र सरकार अदालत के आदेशों को हल्के में नहीं ले सकती। उन्होंने पूछा, "केंद्र सरकार अदालत को बहुत हल्के में ले रही है, क्यों?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 2016 और 2022 के बीच भारत में हिरासत में 11,650 मौतें हुईं। अकेले उत्तर प्रदेश में 2,630 हिरासत में मृत्युएँ दर्ज की गईं, जो देश में सबसे अधिक है। आंकड़ों के 2023 के विश्लेषण से पता चलता है कि 2017 और 2022 के बीच, हिरासत में हुई मृत्युओं के संबंध में देश भर में केवल 345 मजिस्ट्रियल जाँच के आदेश दिए गए, जिसके परिणामस्वरूप केवल 123 गिरफ्तारियाँ हुईं। एनएचआरसी के आंकड़ों से पता चलता है कि 1996 और 2018 के बीच हिरासत में हुई 71% मौतें गरीब या कमज़ोर पृष्ठभूमि के बंदियों की थीं।
सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1997 के फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित अनिवार्य सुरक्षा उपाय निर्धारित किए थे। जिसके तहत रिश्तेदारों को सूचित करना, गिरफ्तारी ज्ञापन रखना, चिकित्सा परीक्षण, कानूनी परामर्श, 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य था। इन दिशा—निर्देशों को अनुच्छेद 141 के अंतर्गत प्रवर्तनीय कानून माना जाता है। न्यायालय का यह आदेश कहीं धूल फांक रहा है। न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की अध्यक्षता में गठित भारतीय विधि आयोग ने 30 अक्टूबर, 2017 को तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को सौंपी गई अपनी 273 वीं रिपोर्ट में केंद्र सरकार से संयुक्त राष्ट्र संघ के यातना-विरोधी सम्मेलन की पुष्टि करने और यातना निवारण कानून लागू करने की सिफारिश की थी।
आयोग ने यातना निवारण के लिए ठोस तर्क प्रस्तुत किए हैं। इस रिपोर्ट में यातना निवारण विधेयक के अलावा विधि आयोग ने यातना उन्मूलन के उद्देश्य को सार्थक बनाने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव दिया था। रिपोर्ट में यातना के खतरे को कम करने और यातना के कृत्यों पर रोक लगाने और ऐसे कृत्यों के अपराधियों के लिए कठोर दंड की सिफारिश की गई। इस रिपोर्ट के साथ संलग्न विधेयक के मसौदे में आजीवन कारावास और जुर्माने तक के दंड का प्रावधान था। आयोग ने न्यायसंगत मुआवजे का निर्णय न्यायालयों पर छोड़ दिया। इसके अलावा, आयोग ने यातना पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं और यातना के मामलों के गवाहों को संभावित खतरों, हिंसा और दुर्व्यवहार से बचाने के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करने की सिफारिश भी की गई थी।
1997 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी सम्मेलन की पुष्टि नहीं की। इसकी पुष्टि करने का अर्थ यह होता कि भारत को यातना निवारण विधेयक पारित करना होगा, जिसे पहली बार 2010 में यूपीए द्वितीय सरकार द्वारा पेश किया गया था। इसमें किसी लोक सेवक द्वारा या लोक सेवक की सहमति से ऐसा कृत्य, जिससे गंभीर चोट पहुंचे या जीवन, अंग या स्वास्थ्य (मानसिक या शारीरिक) को खतरा हो। इसमें जबरन कबूलनामा करवाने के उद्देश्य से, या धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, समुदाय या किसी अन्य आधार पर दंडित करने के लिए दी गई यातना के लिए न्यूनतम 3 वर्ष की सजा का प्रस्ताव था, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। विधेयक आज तक कानून नहीं बन पाया।
इससे साफ जाहिर है जो भी दल सत्ता में आता है, वह देश के मौजदा पुलिस सिस्टम में बदलाव नहीं करना चाहता। कारण साफ है यदि ऐसे कानून बन जाएंगे तो पुलिस अधिकारी नेताओं के इशारे पर नहीं नाचेंगे। जब नाचेंगे नहीं तो नेताओं के मौखिक तौर पर गैर कानूनी काम कैसे होंगे। यही वजह रही है कि केंद्र ने हाल ही में दंड संहिता को न्याय संहिता का नाम दे दिया है। इसमें पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। पुलिस अफसरों को लापरवाही बरतने और सही तरीके से ड्यूटी को अंजाम नहीं देने पर जेल भेजे जाने का प्रावधान नहीं किया गया। पुलिस हिरासत में मौतों का इस कानून में जिक्र तक नहीं किया गया। उल्टे पुूलिस हिरासत में जब—जब मौतों का मामला सामने आता है, सरकार और पुलिस अफसर उसके रफा दफा करने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सत्तारुढ राजनीतिक दलों की मिलीभगत का ही परिणाम है कि आज 21वीं सदी में भी भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें आदिम युग की याद दिलाती हैं।
- योगेन्द्र योगी
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