कभी नहीं मर सकता डिएगो माराडोना ! 1986 विश्व कप में रहे थे जीत के नायक

  •  अनुराग गुप्ता
  •  नवंबर 26, 2020   14:32
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कभी नहीं मर सकता डिएगो माराडोना ! 1986 विश्व कप में रहे थे जीत के नायक

30 अक्टूबर, 1960 में जन्में डिएगो माराडोना के पास अर्जेंटीना का कप्तानी थी और उन्होंने अपनी कप्तानी में टीम को चैंपियन बनाया। इस विश्व कप में कुछ ऐसा भी हुआ जो फुटबॉल के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया।

दुनिया के महानतम फुटबॉल खिलाड़ियों में शुमार डिएगो माराडोना का निधन हो गया। वह 60 साल के थे। बताया जा रहा है कि दिल का दौरा पड़ने की वजह से उन्होंने समय से पहले ही दुनिया को अलविदा कहा। पिछले लंबे समय से वह कोकीन की लत और मोटापे से जुड़ी कई परेशानियों से जूझ रहे थे। अर्जेंटीना में तीन दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी गई है।

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विश्वकप में जीत के हीरो रहे माराडोना

1982 में खेले गए फीफा विश्व कप में डिएगो मारागोना चर्चा का केंद्र बिंदु रहे लेकिन उन्होंने हंगरी के खिलाफ खेले गए मुकाबले में ही महज 2 गोल दागे थे। 1978 का विश्व कप जीतने वाली अर्जेंटीना 1982 में दूसरे राउंड में बाहर हो गई। हालांकि, उन्होंने अपना हौसला कमजोर नहीं होने दिया और 1986 में टीम की दमदार वापसी हुई।

30 अक्टूबर, 1960 में जन्में डिएगो माराडोना के पास अर्जेंटीना का कप्तानी थी और उन्होंने अपनी कप्तानी में टीम को चैंपियन बनाया। इस विश्व कप में कुछ ऐसा भी हुआ जो फुटबॉल के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया। 

60 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले माराडोना विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेल रहे थे। इस मुकाबले में माराडोना ने 2 गोल किए थे। इनमें से एक गोल 'गोल ऑफ द सेंचुरी' चुना गया। इतना ही नहीं इस गोल को हैंड ऑफ गॉड का भी नाम दिया गया था और इसी गोल की बदौलत अर्जेंटीना एक बार फिर से विश्व चैंपियन बनी थी। 

इंग्लैंड फुटबॉल टीम का कहना था कि माराडोना ने जो गोल किया है, वह उनके हाथ से लगकर गया है लेकिन रेफरी ने फैसला गोल का ही दिया था। इसी गोल के बाद मुकाबला पलट गया और इंग्लैंड विश्व कप से बाहर हो गई। इंग्लैंड के खिलाफ जीत दर्ज करने के बाद अर्जेंटीना ने सेमीफाइनल मुकाबला भी जीता और फिर खिताब भी अपने नाम कर लिया। इस विश्व कप में डिएगो माराडोना जीत के नायक बनकर उभरे।

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हालांकि, मैच के बाद माराडोना का बयान भी सामने आया था। उस समय उन्होंने कहा था कि यह गोल मेरे सिर और भगवान के हाथ से छूकर हुआ और इसी बयान के बाद इस गोल को 'हैंड ऑफ गॉड' का नाम दिया गया। बता दें कि माराडोना के इसी गोल की बदौलत इंग्लैंड के खिलाफ अर्जेंटीना ने 2-1 से जीत दर्ज की और उनके इस गोल को गोल ऑफ द सेंचुरी भी चुना गया था।

जब लगी थी नशे की लत

4 विश्व कप में अर्जेंटीना का प्रतिनिधित्व करने वाले माराडोना को नशे की लत लग थी। जिसकी वजह से उन्हें प्रतिबंधित भी किया जा चुका है। बता दें कि खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले माराडोना जब लोकप्रिय हो रहे थे और कॅरियर शबाब पर था उसी वक्त उन्हें नशे की लत लग चुकी थी। 1982 के दशक में उन्होंने कोकीन लेना शुरू कर दिया था और वह करीब दो दशक तक ड्रग्स लेते रहे थे। 

साल 1991 में माराडोना को उनके नेपाली क्लब ने ड्रग्स टेस्ट में पॉजिटिव पाया था जिसके बाद उन्हें 15 महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। ऐसा माना जाता है कि ड्रग्स की वजह से माराडोना का फुटबॉल कॅरियर समाप्त हो गया और फिर उन्होंने साल 1997 में अपने 37वें जन्मदिन पर खेल से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया था। 

2008 में बने थे अर्जेंटीना के कोच

माराडोना फुटबॉल को अलविदा कह सकते हैं लेकिन फुटबॉल उन्हें जाने नहीं दे सकता था। ऐसे में उन्हें 2008 में अर्जेंटीना का कोच बनाया गया था और फिर उन्होंने 2010 में इस पद से इस्तीफा दे दिया था। कहा जाता है कि माराडोना ने अर्जेंटीना के बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार लियोनल मेस्सी को भी प्रशिक्षित किया। माराडोना के निधन से जो फुटबॉलजगत को क्षति पहुंची है उससे हर कोई आहत है। मेस्सी ने माराडोना के साथ अपनी एक तस्वीर साझा करते हुए कहा कि जिसका नाम डिएगो माराडोना है, वह कभी मर नहीं सकता क्योंकि डिएगो नाम अमर है।

मेस्सी ने इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा कि अर्जेंटीना के सभी लोगों और फुटबॉल के लिए बहुत ही दुखद: दिन। वह हमें छोड़कर चले गए लेकिन वह ज्यादा दूर नहीं जा सकते क्योंकि डिएगो अमर हैं। मैं उस महान इंसान के साथ बिताए गए सभी अच्छे पलों को याद करते हुए उनके परिजनों के साथ अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं। रेस्ट इन पीस।

- अनुराग गुप्ता







रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ायेगा तेजस की बड़ी खरीद संबंधी फैसला

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  जनवरी 23, 2021   12:09
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रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ायेगा तेजस की बड़ी खरीद संबंधी फैसला

मिग विमानों का उपयुक्त विकल्प तलाशने और घरेलू विमानन क्षमताओं की उन्नति के उद्देश्य से देश में 1981 में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम शुरू किया गया था। उसी के बाद 1983 में तेजस विमानों की परियोजना की नींव रखी गई थी।

गत 13 जनवरी को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में 45696 करोड़ रुपये की लागत से 73 एलसीए तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमान और 10 एलसीए तेजस एमके-1 ट्रेनर विमान की खरीद को मंजूरी दी गई जबकि डिजाइन और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए 1202 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। दरअसल भारतीय वायुसेना में काफी लंबे समय से अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों तथा रक्षा साजो-सामान की कमी महसूस की जा रही थी, ऐसे में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) द्वारा वायुसेना के लिए स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस’ की खरीद का यह 47 हजार करोड़ का सौदा वायुसेना को मजबूत बनाने के दृष्टिगत बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

तेजस एचएएल द्वारा भारत में ही विकसित किया गया हल्का और मल्टीरोल फाइटर जेट है, जिसे वायुसेना के साथ नौसेना की जरूरतें पूरी करने के हिसाब से तैयार किया जा रहा है। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) 1ए तेजस फाइटर तैयार करने के लिए एचएएल द्वारा नासिक तथा बेंगलुरू में सेटअप तैयार कर लिया गया है ताकि तय समय सीमा के अंदर इन विमानों की डिलीवरी वायुसेना को मिल सके। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक यह सौदा भारतीय रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए गेम-चेंजर होगा और इससे देश में 50 हजार नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

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भारत को चीन, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से युद्ध करते हुए महसूस होने लगा था कि देश को दुश्मनों की चुनौती का मुकाबला करने के लिए स्वदेशी लड़ाकू विमानों की जरूरत है। मिग-21 लड़ाकू विमान की पुरानी होती तकनीक को देखते हुए मिग विमानों का उपयुक्त विकल्प तलाशने और घरेलू विमानन क्षमताओं की उन्नति के उद्देश्य से देश में 1981 में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम शुरू किया गया था। उसी के बाद 1983 में तेजस विमानों की परियोजना की नींव रखी गई थी। इसके लिए एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) का गठन किया गया, जिसके लिए तकनीकी विशेषज्ञों का चयन होने में करीब एक वर्ष का समय लगा। तेजस का जो सैंपल तैयार किया गया, उसने अपनी पहली उड़ान जनवरी 2001 में भरी थी लेकिन सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद यह हल्का लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन में 2016 में ही शामिल किया जा सका था। ‘तेजस’ का यह आधिकारिक नाम 4 मई 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रखा गया था। तेजस संस्कृत भाषा का नाम है, जिसका अर्थ है ‘अत्यधिक ताकतवर ऊर्जा’। वर्ष 2015 में तेजस को वायुसेना में शामिल करने की घोषणा हुई थी, जिसके बाद जुलाई 2016 में वायुसेना को दो तेजस सौंप दिए गए थे। वायुसेना को करीब दो सौ तेजस विमानों की जरूरत है। पिछले वर्षों में वायुसेना एचएएल को 40 तेजस विमानों की खरीद का ऑर्डर दे चुकी है, जिनमें से आधे से ज्यादा वायुसेना को मिल चुके हैं और अब 83 तेजस विमानों का नया सौदा आने वाले समय में वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में मददगार होगा।

रक्षा मंत्री के अनुसार एलसीए-तेजस आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े की रीढ़ बनने जा रहा है। दरअसल वायुसेना में अभी तेजस की कुल दो स्क्वाड्रन हैं और 83 तेजस मिलने के बाद इनकी संख्या 6 हो जाएगी, जिनकी तैनाती अनिवार्य रूप से फ्रंटलाइन पर होगी। तेजस में कई ऐसी नई प्रौद्योगिकियों को भी शामिल किया गया है, जिनमें से कई का भारत में इससे पहले कभी प्रयास भी नहीं किया गया। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया का कहना है कि तेजस लड़ाकू विमान चीन-पाकिस्तान के संयुक्त उद्यम में बने लड़ाकू विमान जेएफ-17 से हाईटेक और बेहतर हैं और यह किसी भी हथियार की बराबरी करने में सक्षम हैं। गुणवत्ता, क्षमता और सूक्ष्मता में तेजस के सामने जेएफ-17 कहीं नहीं टिक सकता। उनका कहना है कि तेजस आतंकी ठिकानों पर बालाकोट स्ट्राइक से भी ज्यादा ताकत से हमला करने में सक्षम है। एक तेजस मार्क 1ए लड़ाकू विमान की कीमत करीब 550 करोड़ रुपये है, जो एचएएल द्वारा ही निर्मित सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से करीब 120 करोड़ रुपये ज्यादा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तेजस मार्क 1ए लड़ाकू विमान इसी श्रेणी के दूसरे हल्के लड़ाकू विमानों से महंगा इसलिए है क्योंकि इसे बहुत सारी नई तकनीक के उपकरणों से लैस किया गया है। इसमें इजराइल में विकसित रडार के अलावा स्वदेश में विकसित रडार भी हैं। इसके अलावा इसमें अमेरिका की जीई कम्पनी द्वारा निर्मित एफ-404 टर्बो फैन इंजन लगा है। यह बहुआयामी लड़ाकू विमान है, जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी बेहतर नतीजे देने में सक्षम है।

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42 फीसदी कार्बन फाइबर और 43 फीसदी एल्यूमीनियम एलॉय व टाइटेनियम से बनाए गए तेजस में एंटीशिप मिसाइल, बम तथा रॉकेट लगाए जा सकते हैं और यह हवा से हवा में और हवा से जमीन पर मिसाइलें छोड़ सकता है। लंबी दूरी की मार करने वाली मिसाइलों से लैस तेजस अपने लक्ष्य को लॉक कर उस पर निशाना दागने की विलक्षण क्षमता रखता है। यह कम ऊंचाई पर उड़कर नजदीक से भी दुश्मन पर सटीक निशाना साध सकता है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक यह 8-9 टन तक वजन उठाने में सक्षम है और ध्वनि की गति से डेढ़ गुना से भी ज्यादा तेज उड़ सकते है। इसे जैमर प्रोटेक्शन तकनीक से लैस किया गया है ताकि दुश्मन सीमा के करीब संचार बाधित नहीं हो सके। यह दूर से ही दुश्मन के विमानों पर निशाना साध सकता है और दुश्मन के रडार को भी चकमा देने की क्षमता रखता है। पूर्णतया देश में ही विकसित करने के बाद तेजस की ढेरों परीक्षण उड़ान होने के बावजूद अब तक एक बार भी कोई भी उड़ान विफल नहीं रही और न ही किसी तरह का कोई हादसा हुआ। तेजस से हवा से हवा में मार करने वाली बीवीआर मिसाइल का सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके अलावा यह विमानवाहक पोत से टेकऑफ और लैंडिंग का परीक्षण एक ही उड़ान में पास कर चुका है। डीआरडीओ द्वारा तेजस का रात के समय किया गया अरेस्टेड लैंडिंग का ट्रायल भी पूर्ण रूप से सफल रहा था। कुल मिलाकर भारत में निर्मित तेजस फाइटर जेट भारतीय वायुसेना की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे हैं। साढ़े चार जनरेशन का हल्का लड़ाकू विमान तेजस भारत का पहला ऐसा स्वदेशी लड़ाकू विमान है, जिसमें 50 फीसदी से ज्यादा कलपुर्जे भारत में ही निर्मित हैं।

-योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामरिक मामलों के लोकप्रिय विश्लेषक तथा कई पुस्तकों के लेखक हैं। इनकी गत वर्ष भी ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ और ‘जीव जंतुओं का अनोखा संसार’ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।)







नए दशक में भारतीय क्रिकेट का भविष्य क्या है ?

  •  दीपक कुमार मिश्रा
  •  जनवरी 22, 2021   11:16
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नए दशक में भारतीय क्रिकेट का भविष्य क्या है ?

रिषभ पंत पर हमेशा से ही उनके गैरजिम्मेदाराना तरीकों से खेलने को लेकर सवाल उठते रहते थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भी उन्हें पहले टेस्ट में मौका नहीं दिया गया। लेकिन उसके बाद उन्हें साहा के नाकाम होने पर दूसरे टेस्ट में मौका दिया गया।

ऑस्ट्रेलिया में टीम इंडिया ने टेस्ट सीरीज 2-1 से जीतकर इतिहास रच दिया है। यह एक ऐसा कारनामा है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। शायद भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे यादगार जीत का नाम लिया जाएगा तो इस सीरीज जीत का नाम सबसे उपर होगा। यह सीरीज जीत इसलिए खास है क्योंकि इसे मुख्य खिलाड़ियों के बिना जीता गया। इस सीरीज जीत में विराट कोहली या फिर मोहम्मद शमी जैसे सीनियर खिलाड़ियों का योगदान नहीं था। यहां टीम इंडिया को जीत युवा खिलाड़ियों ने दिलाई। इस सीरीज जीत में भारत को कई युवा सितारें मिले जो आगे चलकर भारतीय क्रिकेट का नाम रोशन करने वाले है। इन नामों में शुभमन गिल, रिषभ पंत, मोहम्मद सिराज, टी.नटराजन और वाशिंगटन सुंदर जैसे खिलाड़ियों का नाम शामिल है।

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ऐसे में अब सवाल यह है कि आखिर टीम इंडिया के लिए भविष्य में वह कौन से खिलाड़ी है जो बड़े सितारों के जाने के बाद टीम की बागडौर संभालेंगे। इसके साथ ही सवाल यह भी है कि क्या घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद यह खिलाड़ी इंटरनेशनल लेवल पर भी अपने नाम का सिक्का जमा पाएंगे।

शुभमन गिल बनेंगे नए दशक के सुपरस्टार !

शुभमन गिल को ऑस्ट्रेलिया दौरे में टेस्ट सीरीज में डेब्यू करने का मौका मिला। इस खिलाड़ी ने मौके को दोनों हाथों से पकड़ा और शानदार प्रदर्शन कर टीम में अपनी जगह पक्की कर ली। गिल ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज के 3 मैचों की 6 पारियों में 51.8 औसत से 259 रन बनाए जहां उन्होंने 2 अर्धशतक लगाएं और उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 91 रन का रहा है। अपने अंडर-19 टीम के कप्तान पृथ्वी शॉ की जगह ओपनिंग करने का मौका पाने वाले शुभमन गिल किसी भी पारी में बल्लेबाजी करते हुए असहज नहीं दिखाई दिए। पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क और जॉश हेजलवुड जैसे गेंदबाजों के सामने गिल ने शानदार शॉट्स खेले। उनके गाबा टेस्ट में खेले गए 91 रन किसी बड़े शतक से भी ज्यादा तारीफों के हकदार है। गिल का यह प्रदर्शन भारतीय क्रिकेट को उम्मीद देता है कि आने वाले समय में विराट, रोहित और रहाणे जैसे खिलाड़ियों के रिटायर होने के बाद यही खिलाड़ी भारत का नाम रोशन करेंगे।

किसी भी हालत से जीत दिलाने का दम रखते हैं रिषभ पंत !

रिषभ पंत पर हमेशा से ही उनके गैरजिम्मेदाराना तरीकों से खेलने को लेकर सवाल उठते रहते थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भी उन्हें पहले टेस्ट में मौका नहीं दिया गया। लेकिन उसके बाद उन्हें साहा के नाकाम होने पर दूसरे टेस्ट में मौका दिया गया। जिसके बाद पंत ने मानो मिले मौके को अच्छे से भुनाया। पंत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में पंत ने शानदार प्रदर्शन किया। पंत ने सीरीज के 3 मैचों की 5 पारियों में 68.50 की औसत से 274 रन बनाए। जहां पंत ने 2 अर्धशतक लगाएं और उनका बेस्ट स्कोर 97 रन रहा। पंत ने अपने प्रदर्शन से बता दिया कि वो किसी भी हालत में मैच जिताने का दम रखते है। गाबा में खेले गए चौथी पारी में नाबाद 89 रन उनके जीवन की सबसे अहम पारियों में शुमार होंगे। ऐसे में पंत को लेकर भारतीय क्रिकेट की उम्मीदें बढ़ गई है। माना जा रहा है रिषभ पंत आने वाले समय में भारत के लिए बड़े खिलाड़ी बनेंगे और टीम इंडिया को नई उचाइयों पर ले जाएंगे।

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युवा गेंदबाजों की फौज भारत के लिए सबसे बड़ी खुशी 

ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टीम इंडिया के मुख्य गेंदबाज एक एक कर चोटिल हो रहे थे। भारत के लिए पहले इशांत शर्मा, मोहम्मद शमी, उमेश यादव और आखिरी टेस्ट आते आते जसप्रीत बुमराह भी चोटिल होकर मैच से बाहर हो गए। ऐसे में तेज गेंदबाजी की कमान संभाली युवा गेंदबाज मोहम्मद सिराज, नवदीप सैनी, टी नटराजन, शार्दुल ठाकुर जैसे गेंदबाजों ने जिन्होंने गाबा के मैदान में कमाल कर दिया। तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज तो भारत के लिए टेस्ट सीरीज के 3 मैचों में 13 विकेट लेकर सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बनें। यह मोहम्मद सिराज की डेब्यू सीरीज थी। भारतीय क्रिकेट के युवा तेज गेंदबाजों का यह प्रदर्शन बताता है कि एक समय रफ्तार वाले गेंदबाजों की कमी झेलने वाली टीम इंडिया अब बदल चुकी है। इस टीम के पास ऐसे तेज गेंदबाजों का कोर ग्रुप है जो विदेशों में जाकर भारत के लिए जीत की इबारत लिखेगा। टीम इंडिया के तेज गेंदबाज अब टेस्ट क्रिकेट में 20 विकेट लेने का दम रखते है। भारतीय क्रिकेट के पास लगभग 10 तेज गेंदबाजों का ऐसा ग्रुप है जो समय पड़ने पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने से पीछे नहीं हटेगा।

नए दशक में कैसा रहेगा भारतीय क्रिकेट का भविष्य ?

टीम इंडिया ने जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज जीती उसमें युवा खिलाड़ियों का बड़ा योगदान था। भारतीय टीम के इस तरह के प्रदर्शन के पीछे बीसीसीआई का बड़ा काम रहा जिन्होंने पिछले कुछ सालों में इंडिया ए के कई दौरे विदेशों में करवाए जिससे युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच खेलने का मौका मिला। इसके अलावा सबसे ज्यादा तारीफ यहां पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ की करना चाहेंगे जिन्होंने युवा भारतीय क्रिकेटरों को निखारा। कंगारू सरजमीं पर टेस्ट सीरीज जीत के बाद राहुल द्रविड़ की जमकर तारीफ की गई। पूर्व पाकिस्तानी तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने राहुल द्रविड़ की तारीफ करते हुए कहा कि " राहुल द्रविड़ ने पहले अंडर-19 टीम को मजबूत बनाया। इसके बाद नेशनल क्रिकेट अकादमी को ढ़ंग के खड़ा किया। अब हिंदुस्तान के यंगस्टर जीते है। भारत इसके लिए पिछले 10 सालों से इन्वेस्टमेंट कर रहा है। तगड़े और ईमानदार लोग लाएं जिन्हें सैलरी से ज्यादा मतलब नहीं था।" 

जाहिर है शुभमन गिल, पृथ्वी शॉ, ऋषभ पंत, वॉशिंगटन सुंदर- ये सभी उस अंडर-19 टीम से निकले हैं, जिसे कभी द्रविड़ ने कोच किया था। 2016 से लेकर 2019 तक अंडर-19 और इंडिया ए टीम के कोच थे द्रविड़। आज जिस बेंच स्ट्रेंथ की बात हो रही है, जिन खिलाड़ियों के नाम लिए जा रहे हैं कि वे भविष्य के स्टार हैं, वे सभी इस दौर में निकले। अब भी वह नैशनल क्रिकेट अकैडमी के हेड के तौर पर खिलाड़ियों को गाइड कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में ऐसे ही औऱ युवा खिलाड़ियों के निकलने की उम्मीद है जो भारतीय क्रिकेट के भविष्य को संवारेंगे।

- दीपक कुमार मिश्रा







ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  जनवरी 21, 2021   13:23
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ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं।

कड़कड़ाती कड़ाके की हाड़ कंपकंपा देने वाली भयंकर शीतलहर में हमारे देश का अन्नदाता अपने हक को लेने के लिए सड़कों पर धरना देकर बैठा हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं की सड़कों पर व देश में अन्य भागों में बहुत जगहों पर केंद्र सरकार के द्वारा लाये गये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले बहुत लंबे समय से हमारे प्यारे किसान जगह-जगह पर धरनारत हैं। मसले के समाधान के लिए केंद्र सरकार से किसानों की बार-बार वार्ता होने के बाद भी अभी तक भारत सरकार व किसानों के बीच कोई भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है, किसान तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं केंद्र सरकार बिंदुवार चर्चा करके असहमत बिंदुओं में संशोधन करने की बात कह रही है। लेकिन धरातल पर वास्तविकता यह है कि किसान संगठनों व केंद्र सरकार के बीच मामला आंदोलन के एक-एक दिन गुजरने के साथ और लंबा खिचता जा रहा है, जिसके चलते उतना ही यह मामला पेचीदा होकर सुलझने की जगह दिन-प्रतिदिन और ज्यादा उलझता जा रहा है।

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अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसानों को अब धीरे-धीरे दो माह होने वाले हैं, लेकिन फिर भी किसानों की समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं, जिसके चलते अब किसान आंदोलन देश के विभिन्न भागों में बहुत तेजी से विस्तार लेता जा रहा है। अब तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में भी पहुंच गया है, जिसने चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, जो किसानों से बात करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी। हालांकि कमेटी का गठन होते ही वो सदस्यों की वजह से विवादों के दायरे में आ गयी, किसान संगठनों के कुछ नेताओं ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर कमेटी के सदस्यों के चयन पर आपत्ति दर्ज कराते हुए उनको तीनों कृषि कानूनों का समर्थक बताया है और उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, जिसके बाद एक सदस्य ने तो कमेटी में रहने से इंकार ही कर दिया है।

खैर हमारे देश में राजनीति जो करवा दे वो भी कम है, लेकिन अब देश में किसानों का हितैषी बनने को लेकर के पक्ष विपक्ष व निष्पक्ष लोगों के बीच में जबरदस्त चर्चा के साथ किसान राजनीति अपने चरम पर है। देश की आजादी से लेकर आज तक किसानों को उनका हक ना देने वाले राजनीतिक दलों से लेकर के हर कोई अपने आपको अन्नदाता किसानों का कट्टर हितैषी दिखाने पर लगा हुआ है। वैसे विचारणीय बात यह है कि जिस तरह से देश में आजादी के बाद से ही गरीबी को खत्म करने के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा समय-समय पर बहुत सारी योजनाएं चलाई गयीं और हर वक्त राजनीतिक दलों के द्वारा उनका श्रेय लेने में भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती है ठीक उसी प्रकार से ही किसानों के नाम पर भी देश में आजादी के बाद से यही स्थिति है, राजनीतिक दल हमेशा श्रेय लेने से चूके नहीं हैं। लेकिन अफसोस फिर भी सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि ना तो देश से गरीबी समाप्त होने का नाम ले रही है और ना ही हमारे अन्नदाता किसानों को भी उनकी समस्याओं का समाधान व हक अभी तक मिल पा रहा है। हाँ, देश में लंबे समय से गरीब व किसानों का हितैषी बनने के लिए राजनीतिक लोगों के द्वारा केवल और केवल हर वर्ष की आंकड़ेबाजी अवश्य जारी है। आंकड़ों की बाजीगरी व धरातल के हालातों में बहुत अंतर होने के कारण उत्पन्न आक्रोश की वजह से ही किसान अब सड़कों पर उतरे हुए हैं और वो अब अपने हक के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड़ में नजर आ रहे हैं, जिसके चलते ही वो दिल्ली की सीमाओं के साथ देश के अन्य भागों में अपना घर-बार छोड़कर अनिश्चितकालीन लंबे धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार व आम जनमानस का अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करवाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

उसी क्रम में कुछ किसान संगठन राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर दिल्ली की आउटर रिंगरोड व देश के विभिन्न भागों में ट्रैक्टर परेड के आयोजन करने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहे हैं। जिसको लेकर केंद्र सरकार व देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर चिंता की रेखाएं हैं। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दिन 26 जनवरी पर किसी भी अनहोनी की आशंका को रोकने के लिए सरकार व सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हैं। 'केन्द्र सरकार तो ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक चली गयी है, जिस पर सोमवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शरद अरविंद बोबडे ने कहा, 'दिल्ली में रैली निकाले जाने के मामले में हमने पहले ही कहा था कि यह कानून व्यवस्था का मामला है और यह पुलिस को देखना है।' उन्‍होंने कहा, 'यह देखना पुलिस का काम है, कोर्ट का नहीं कि कौन दिल्ली में प्रवेश करेगा, कौन नहीं करेगा, कैसे करेगा!' सीजेआई ने कहा कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, हमें बताने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली पुलिस गणतंत्र दिवस की गरिमा सुनिश्चित करे।

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वहीं अब किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग के तार खालिस्तानी संगठनों से जुड़ने के अंदेशों को देखते हुए जांच करने के लिए देश की महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी एनआईए भी एक्टिव हो गयी है। सूत्रों के अनुसार उसने किसान संगठनों के कुछ शीर्ष नेताओं व अन्य बहुत सारे महत्वपूर्ण लोगों से पूछताछ करने के लिए नोटिस भेजे हैं। जिसके बाद उत्पन्न हालात को देखकर हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक सरकार व किसानों के बीच भविष्य में टकराव का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। किसानों के द्वारा ट्रैक्टर परेड करने की घोषणा के बाद से ही देश के अधिकांश आम लोगों के मन में एक विचार बहुत तेजी से कौंध रहा है कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर क्या सुरक्षा की दृष्टि से किसानों का इस तरह से ट्रैक्टर परेड निकालना उचित है?

क्या किसानों का ट्रैक्टर परेड का कार्यक्रम बहुत अधिक जोखिम भरा नहीं है?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसको रोकने के लिए केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया है कि सुरक्षा एजेंसी के जरिये उन्हें जानकारी मिली है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर परेड निकालने वाले हैं। जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय महत्ता के इस महत्वपूर्ण समारोह को प्रभावित करना है, हालांकि किसान संगठन समारोह में किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की रणनीति से इंकार कर रहे हैं, वो केवल गरिमापूर्ण ढंग से परेड निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन पूर्व में जिस तरह से कुछ लोगों की वजह से किसानों के धरने के बीच ही देश को तोड़ने की बात करने वाले लोगों के फोटो लगे थे उस घटना से सबक लेकर अब किसान संगठनों को ट्रैक्टर परेड के दौरान अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी, उनको आत्ममंथन करना होगा कि क्या किसान संगठन इतनी बड़ी संख्या में आये ट्रैक्टरों के बीच अनुशासन बना कर रख सकते हैं, क्योंकि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड में कोई भी देश विरोधी घटना घटित ना हो पाये इसको रोकने की जिम्मेदारी किसानों की खुद होगी, क्योंकि अगर कोई भी घटना घटित हो जाती है तो भविष्य में किसान आंदोलन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगने का काम हो सकता है और वैसे भी यह हमारे प्यारे देश की आन-बान-शान व अस्मिता के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। किसान संगठनों व उससे जुड़े लोगों को ध्यान रखना होगा कि धरना प्रदर्शन करने का उनका अधिकार है। तो यह ध्यान रखना भी उनकी जिम्मेदारी है कि आंदोलन व परेड के दौरान कोई ऐसी घटना घटित ना हो जाये जिससे कि कोई देशद्रोही व्यक्ति देश की मान प्रतिष्ठा को इस किसान आंदोलन की आड़ में धूमिल करने का दुस्साहस कर सके। एक वीर जाबांज जवान की तरह देश के लिए सभी कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहने वाले अन्नदाता किसानों को हर हाल में देश की आन-बान-शान व स्वाभिमान का ध्यान रखना होगा।

-दीपक कुमार त्यागी

(स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार)







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