BRICS के विस्तार ने बढ़ाई भारत की ताकत, पश्चिमी देशों का टूट सकता है वर्चस्व

पहले ब्रिक्स सिर्फ पांच देशों का समूह था, जिसकी कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी लगभग 31 प्रतिशत के आसपास थी। लेकिन विस्तार के बाद इसमें नए सदस्य जुड़ने से यह आंकड़ा लगभग 37 से 40 प्रतिशत तक पहुँच गया है।
ब्रिक्स के विस्तार ने वैश्विक शक्ति संतुलन की बिसात पर ऐसा दांव चला है, जिसने पश्चिमी प्रभुत्व को खुली चुनौती दे दी है। भारत के लिए यह उभरती विश्व व्यवस्था में अपनी निर्णायक भूमिका दर्ज कराने का सुनहरा अवसर बन चुका है। आज जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रही है, तब ब्रिक्स का विस्तार भारत की सामरिक ताकत को कई गुना बढ़ाने वाला कारक बनकर सामने आया है।
पहले ब्रिक्स पांच देशों का समूह था, जिसकी कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी लगभग 31 प्रतिशत के आसपास थी। लेकिन विस्तार के बाद इसमें नए सदस्य जुड़ने से यह आंकड़ा लगभग 37 से 40 प्रतिशत तक पहुँच गया है। जनसंख्या के लिहाज से भी यह समूह अब दुनिया की लगभग 45 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत अब ऐसे मंच का प्रमुख स्तंभ है जो आर्थिक, जनसंख्या और संसाधनों के मामले में पश्चिमी देशों को बराबरी की टक्कर दे सकता है।
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भारत के लिए सबसे बड़ा सामरिक लाभ यह है कि ब्रिक्स के जरिए वह डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के विकल्प को मजबूत करने में भूमिका निभा सकता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाएं पहले ही पश्चिमी वित्तीय संस्थानों के एकाधिकार को चुनौती दे रही हैं। यदि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा मिलता है, तो भारत को विदेशी मुद्रा दबाव से राहत मिलेगी और उसकी आर्थिक संप्रभुता मजबूत होगी।
सामरिक स्तर पर भी यह विस्तार भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया और अफ्रीका के कई नए सदस्य देशों के जुड़ने से भारत की पहुंच ऊर्जा संसाधनों, समुद्री मार्गों और रणनीतिक क्षेत्रों तक बढ़ेगी। यह वही क्षेत्र हैं जहां अब तक चीन अपनी पकड़ मजबूत करता रहा है। ब्रिक्स के भीतर सक्रिय भूमिका निभाकर भारत इस प्रभाव को संतुलित कर सकता है और खुद को एक भरोसेमंद शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
अब सवाल उठता है कि इस वर्ष भारत में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन क्या मौजूदा वैश्विक तनावों के बीच संभव हो पाएगा? देखा जाये तो पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, रूस और पश्चिम के बीच टकराव, और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक माहौल को बेहद जटिल बना दिया है। लेकिन इतिहास बताता है कि संकट के दौर में ही ऐसे मंचों की अहमियत बढ़ जाती है। संभावना यही है कि सम्मेलन आयोजित होगा, भले ही कुछ नेताओं की उपस्थिति प्रत्यक्ष की बजाय ऑनलाइन माध्यम से हो।
वैसे असल चुनौती यह नहीं है कि सम्मेलन होगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सदस्य देश एक साझा एजेंडा पर सहमत हो पाएंगे? उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स के भीतर भी मतभेद हैं। चीन और भारत के बीच सीमा विवाद, रूस और पश्चिम के बीच युद्ध एवं पश्चिम एशिया के देशों के संघर्ष इस मंच की एकता की परीक्षा ले रहे हैं। फिर भी, आर्थिक हित और वैश्विक संतुलन की जरूरत इन देशों को एक साथ बैठने के लिए मजबूर करती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट ने ब्रिक्स की प्रासंगिकता को और बढ़ा दिया है। जहां पश्चिमी देश अक्सर पक्षपातपूर्ण रुख अपनाते दिखते हैं, वहीं ब्रिक्स एक संतुलित और बहुपक्षीय समाधान की बात करता है। भारत, जो खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, वह इस मंच के जरिए शांति पहल को निश्चित रूप से आगे बढ़ा सकता है।
वर्तमान वैश्विक संकटों के संदर्भ में भी देखें तो समाधान की दिशा में ब्रिक्स के अध्यक्ष के रूप में भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है। भारत पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि वह संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान के आधार पर समाधान चाहता है। भारत यदि मध्यस्थ की भूमिका निभाता है, तो वह न केवल अपनी वैश्विक छवि को मजबूत करेगा बल्कि ब्रिक्स को भी एक प्रभावी संकट समाधान मंच के रूप में स्थापित कर सकता है।
आंकड़ों की बात करें तो भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ते हुए दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और अगले कुछ वर्षों में इसके तीसरे स्थान तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में ब्रिक्स के भीतर भारत की भूमिका केवल एक सदस्य की नहीं बल्कि एक दिशा तय करने वाली शक्ति की है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भारत की पहलें ब्रिक्स देशों के लिए मॉडल बन सकती हैं।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि ब्रिक्स का विस्तार भारत के लिए एक रणनीतिक वरदान है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। यदि भारत इन चुनौतियों को संतुलित करते हुए इस मंच का प्रभावी उपयोग करता है, तो वह न केवल अपनी वैश्विक ताकत को कई गुना बढ़ा सकता है बल्कि एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है। यह समय भारत के लिए सिर्फ भागीदारी का नहीं, बल्कि नेतृत्व का है।
-नीरज कुमार दुबे
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