व्यक्तित्व निर्माण की राह आसान नहीं, हमें अपनी जड़ों को सींचना होगा

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ललित गर्ग । Dec 5 2018 12:07PM

हम सब अच्छे जीवन, सफलता और शुभ-श्रेयस्कर होने की कामना करते हैं लेकिन जीवन तो उतार और चढ़ाव का खेल है। हम सभी कभी न कभी अवसाद और तनाव से आहत होते हैं, तो कभी दुःखों से हमारा साक्षात्कार होता है।

हम सब अच्छे जीवन, सफलता और शुभ-श्रेयस्कर होने की कामना करते हैं लेकिन जीवन तो उतार और चढ़ाव का खेल है। हम सभी कभी न कभी अवसाद और तनाव से आहत होते हैं, तो कभी दुःखों से हमारा साक्षात्कार होता है। दुःखों एवं पीड़ाओं का एहसास निरन्तर बना रहता है। जिंदगी में हमेशा सब कुछ अच्छा और सही ही हो, कहां होता है। किसी की जिंदगी में नहीं होता। जिंदगी पूरी तरह परफेक्ट ना होती है, ना होगी। व्यापार, नौकरी, सेहत या रिश्ते कोई ना कोई परेशानी चलती ही रहती है। गलतियों से, दुखों से कब तक बचा रहा जा सकता है। लेखक तोबा बीटा कहते हैं, ‘कोशिशें हमें बिल्कुल सही नहीं कर देतीं। वे केवल हमारी गलतियों को कम कर देती हैं।’

हर सुबह को हम इस सोच और संकल्प के साथ शुरू करते हैं कि हमें अपने व्यक्तित्व निर्माण में कुछ नया करना है, नया बनना है। पर क्या हमने निर्माण की प्रक्रिया में नए पदचिन्ह स्थापित करने का प्रयत्न किया? क्या ऐसा कुछ कर सके कि ‘आज’ की आंख में हमारे कर्तृत्व का कद ऊंचा उठ सके? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भी आम आदमी की तरह यही कहें कि क्या करें-‘समय ने साथ नहीं दिया।’ यदि ऐसा हुआ तो हम फिर एक बार आईने में स्वयं का चेहरा देखकर उसे न पहचानने की भूल कर बैठेंगे।


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‘बीते कल में हमने क्या खोया, क्या पाया’ इस गणित को हम एक बार रहने दें अन्यथा असफल महत्वाकांक्षायें, लापरवाह प्रयत्न, कमजोर निर्णय और अधूरे सपने हमारे रास्ते की रोशनी छीन लेंगे। निराशा से हमें भर देंगे। इसलिए आज तो सिर्फ जीवन के इस आदर्श को सार्थकता देनी है कि ‘हमें वही बनना है जो सच में हम हैं।’ क्योंकि सारी समस्या का मूल यही है कि हम जो दीखते हैं वे सच में होते नहीं। और जीवन के इस दोहरेपन में सारी श्रेष्ठताएं अपना अर्थ खो बैठती हैं। आज इन पंक्तियों की सच्चाई को कौन नकारेगा कि ‘गरीब की गरिमा, सादगी का सौंदर्य, संघर्ष का हर्ष, समता का स्वाद और आस्था का आनंद, ये सब आचरण से पतझर के पत्तों की तरह झर गये हैं।’

जरूरी नहीं कि किसी अन्य के अपने बनाए नियम आप पर भी सही साबित हों। परेशानी तब आती है, जब हम बिना सोचे-समझे दूसरे का अनुसरण करने लगते हैं। इसके बजाए हमें हमेशा अपनी जड़ों, अपने विचारों पर विश्वास रखना चाहिए। हम अपनी गलतियां नहीं देखते, पर दूसरों की गलतियों पर ज्यादा ही कठोर हो जाते हैं। होना यह चाहिए कि हम अपनी गलतियों के लिए भले कठोर हो जाएं, पर दूसरों को आसानी से माफ कर दें। यूं कभी-कभी दूसरों को परखना पड़ जाता है, पर उसके लिए जरूरी है मन का पूर्वग्रह से मुक्त होना। लेखक क्रिस जैमी कहते हैं, ‘किसी को जानना समझना मुश्किल नहीं है। मुश्किल अपने पूर्वग्रहों को परे रखना है।’

समय के साथ आदमी बदलता है मगर जीवन मूल्य नहीं। दायरे और दिशायें बदलती हैं मगर आदर्श तथा उद्देश्य नहीं। बदलने की यह बात जीवन का सापेक्ष दर्शन है। आज वक्त को ऐसे आदमी की प्रतीक्षा है-जो बदलने में विश्वास रखता हो, बदलने के लिए प्रतिज्ञा और प्रयत्न करता हो। जो यह जानता हो कि बुराइयों की जड़ें दूब-सी कमजोर और शीघ्र फैलने वाली होते हुए भी हमारे सक्षम हाथ उन्हें क्यों नहीं उखाड़ पाते? जो दूषित संस्कृति से स्वयं को अनछुआ रखकर सत्संस्कारों की परम्परा को पीढ़ियों तक पहुंचाता हो। जो मौलिकता और निर्भयता के साथ समय पर सही दिशा में सोचता हो, यही निर्णय लेता हो, क्रियान्विति में सक्रियता दिखाता हो।  जिसकी संवेदनशीलता में करुणा, संतुलन, धैर्य और विवेक जुड़ा हो ताकि सुख सिमट न सके और स्वार्थ फैल न सके। जो जानता हो शक्ति का सही नियोजन करना। समय के साथ निर्माण के लिए हस्ताक्षर करना। संभावनाओं को सफल परिणाम में बदलना। संकल्प तथा सपनों को पूर्णता देना। दृष्टिकोण का सम्यक् होना और भाग्यवादी न बनकर स्वयं भाग्य रचना।

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शुभ के स्वप्न को अगर आकार देना है तो भगवान महावीर के इस संदेश को जीवन से जोड़ना होगा-‘खणं जाणाहि पंडिए’-हम क्षणजीवी बनें। न अतीत की चिंता, न भविष्य की कल्पना। सिर्फ ‘आज’ को जीने का अप्रमत्त प्रयत्न करें। यही हर दिन की सुबह का सच्चा स्वागत है। जिंदगी है तो चुनौतियां होंगी ही। कुछ चुनौतियों से आप आसानी से पार पा लेते हैं, पर कुछ आपसे खुद को बदलने की मांग करती हैं। कामयाबी इस पर निर्भर करती है कि आप कितने बेहतर ढंग से खुद को बदल पाते हैं? जेन मास्टर मैरी जैक्श कहती हैं, ‘अपनी उलझनों का सामना करते हुए अनजान चीजों को गले लगाना हमें विकास की ओर ले जाता है। हमें आगे बढ़ाता है।’

कोई घटना हो, व्यक्ति या फिर वस्तु, हम दो तरह से चीजों को देखते हैं। कभी हम पर प्यार का चश्मा चढ़ा होता है तो कभी डर का। लेंस बदलते ही हमारी पूरी सोच बदल जाती है। डर चीजों को एक रूप दे रहा होता है, तो प्रेम एक अलग ही धरातल। लेखिका व वक्ता गैब्रियल बर्नस्टेन कहती हैं, ‘हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं कि हमारी आंखें क्या देखती हैं? हम जिम्मेदार इस बात के लिए हैं कि उसे कैसे अपनाते हैं।’

मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ. रॉबर्ट वूड्स ने कहा था, ‘आपकी प्राथमिकता में सबसे आगे कौन है? अगर आप हैं, तो आप जानबूझकर गलतियां नहीं करेंगे। अगर गलती सोची-समझी साजिश के तहत कर रहे हैं तो इसके नतीजे बुरे हो सकते हैं। अनजाने में हुई गलतियां, चाहे काम हो या बात, उन्हें समय रहते संभाला जा सकता है।’ हम टूट न जाएं, कोई बेवकूफ न बना दे, इस डर से ताउम्र खुद को कठोर बनाने में लगे रहते हैं। दुखों को दबाए खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। तब भूल जाते हैं कि अकसर सीधे तने पेड़ ही आंधी-तूफान में सबसे पहले गिर जाते हैं, सबसे पहले काट दिए जाते हैं। लेखक सी जॉयबेल सी कहते हैं, ‘कठोर चीजें ही पहले टूटती हैं, मुलायम नहीं। कड़क चीजें तो जरा सी चोट में टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं।’ कुछ नया करने की चाहत रखने वाले सवालों से नहीं डरते। थोड़ी जमीन मिलते ही वे जिज्ञासाओं के पंख फैलाने लगते हैं। ऐसा नहीं कि वे सिर्फ दूसरों से सवाल पूछते हैं, जरूरत होने पर खुद से भी सवाल करते हैं। यह रास्ता उन्हें अपने लक्ष्यों और सपनों के करीब ले जाता है, यही इंसान के लिये उजली सुबह होती है। 

- ललित गर्ग

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