काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में प्राचीन सनातन संस्कृति और आधुनिकता का अद्भुत अनूठा संगम

Kashi Vishwanath corridor

हमारे सनातन धर्म के विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप पूर्ण रूप से विदित होता है। काशी नगरी के बारे में कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत: प्रलय होने पर भी इसका कभी विनाश नहीं होगा।

देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के बहुत सारे लोगों की यह एक आम धारणा बन गयी थी कि सरकारों के द्वारा वोटबैंक की राजनीति के चलते भारत में सनातन धर्म के पौराणिक प्राचीन मंदिरों व अन्य स्थलों का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। लेकिन जब केंद्र में मोदी व उत्तर प्रदेश में योगी की सरकार आयी तो कुछ लोगों को लगने लगा था कि अब शायद सनातन धर्म के अनुयायियों व उनके पौराणिक प्राचीन मंदिर व अन्य धर्म स्थलों की उपेक्षा नहीं होगी। केंद्र की मोदी सरकार ने बहुसंख्यक जनसमुदाय की इस बड़ी उम्मीद पर खरा उतरते हुए 'प्रसाद' स्कीम के तहत देश में विभिन्न प्राचीन धर्म स्थलों के जीर्णोद्धार करवाने की एक बेहतरीन शुरुआत की, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का भव्य निर्माण भी केंद्र सरकार की उस महत्वपूर्ण 'प्रसाद' स्कीम का ही एक हिस्सा है। वैसे तो काशी विश्वनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप का पुनर्निर्माण ढाई सौ वर्ष पूर्व इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्ष 1780 में कराया था, वहीं वर्ष 1853 में महाराजा रणजीत सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को स्वर्ण से मंडित करवाया था। लेकिन तब से लेकर अब तक सदियां बीत जाने के बाद भी देश का यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक हिंदू धर्म का अहम तीर्थ उपेक्षित रहा। लेकिन समय ने करवट ली और काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार देश के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बन गया और उन्होंने इसको धरातल पर साकर करने के लिए कार्य करना शुरू कर दिया। "केंद्र सरकार की 'प्रसाद' स्कीम की इस कड़ी में ही उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के निर्माण का नंबर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से शीर्ष पर आया और अब मोदी के सपनों का काशी का शिवधाम प्राचीन व आधुनिकता के संगम के साथ पूर्ण भव्यता के साथ बनकर पूर्ण हो गया है।

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काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के भव्य निर्माण का शिलान्यास 8 मार्च 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किया गया था, निर्माण की नींव रखते हुए प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश प्रशासन को एक फार्मूला दिया था कि 'कोआर्डिनेशन, कोऑपरेशन और रिहैबिलिटेशन' यानी जिनकी जमीन इस निर्माण कार्य के लिए गई है या घर टूटे हैं, उनको तत्काल उचित मुआवजा व नई जगह दी जाये, इस लक्ष्य पर प्रशासन के द्वारा काफी हद तक सफलतापूर्वक कार्य भी किया गया है, स्थल को मुकदमेबाजी से दूर रखा है। लेकिन बीच में कोरोना का भयावह काल चलने की वजह से कॉरिडोर के निर्माण की गति कुछ समय के लिए धीमी हो गयी थी। काशी के लोगों के मन में आशंका थी कि कॉरिडोर का निर्माण बहुत लंबे समय तक चलेगा। लेकिन मोदी-योगी की जोड़ी की कार्यशैली ने बनारस के लोगों के इस सपने को तय समय पर ही पूरा कर दिखाया है। 13 दिसंबर 2021 सोमवार के दिन काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का भव्य, अलौकिक, अकल्पनीय विशाल कार्यक्रम में लोकार्पण हुआ। भगवान शिव के इस प्राचीन दिव्य धाम के भव्य आलौकिक लोकार्पण को दुनिया ने देखा।  

चुनावी वर्ष में विकास पथ व भगवान भरोसे बैठी भाजपा उत्तर प्रदेश के चुनावों में इस मौके का पूरा लाभ लेना चाहती है। लोकार्पण के समय भाजपा संगठन ने देश के 27 हजार शिवालयों में पूजा-अर्चना करके लोगों को इस कार्यक्रम से जोड़ने का कार्य किया। भाजपा संगठन ने 15,444 मंडलों में 51 हजार स्थानों पर लोकार्पण समारोह का लाईव प्रसारण करवाकर देश के बहुसंख्यक सनातन धर्म के अनुयायियों में भविष्य में अपनी पकड़ और मजबूत करने का प्रयास किया।

शिव धाम के लोकार्पण के इस कार्यक्रम में देश के दिग्गज 500 संतों के अलावा 2500 अतिथि शामिल हुए। गंगा के घाटों पर 11 लाख दीप प्रज्वलित करके भव्य दीपोत्सव मनाया गया, वाराणसी को विशेष रूप से सजाया गया। वाराणसी के हर घर में प्रसाद व दिव्य काशी-भव्य काशी के संबंध में सरकारी पुस्तिका को भेजा जायेगा। लोकार्पण के कार्यक्रम से देश व उत्तर प्रदेश के लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए पूरे उत्तर प्रदेश में 13 दिसंबर से मकर संक्रांति 14 जनवरी तक पूरे एक महीने तक विभिन्न कार्यक्रम चलेंगे, इन कार्यक्रमों में पार्टी के बड़े जनप्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।

सबसे अच्छी बात यह है कि इस भव्य प्रोजेक्ट का कार्य पूरा हो चुका है। निर्माण कार्य में लगी मशीनें परिसर से बाहर आ चुकी हैं। इस प्रोजेक्ट की महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद निरंतर इस प्रोजेक्ट की निगरानी कर रहे थे। पीएम मोदी का यह ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा होना काशी के लोगों व भगवान बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शनार्थियों के लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए निरंतर आने वाले भक्त इस प्रोजेक्ट की भव्यता, आधुनिकता व प्राचीनता के अलौकिक संगम को देखकर अचंभित हो रहे हैं। काशी (वाराणसी) को दुनिया के सबसे प्राचीन नगरों में एक माना जाता है। इस नगरी को सनातन संस्कृति का दुनिया भर में एक प्रमुख केंद्र माना जाता है, वहीं काशी को भारत की धार्मिक राजधानी भी माना जाता है। 

सनातन धर्म का प्राचीन ग्रंथ 'स्कन्दपुराण' काशी की दिव्य अलौकिक महिमा का एक श्लोक में गुण-गान करते हुए कहता है कि-

भूमिष्ठापिन यात्र भूस्त्रिदिवतोऽप्युच्चैरध:स्थापिया

या बद्धाभुविमुक्तिदास्युरमृतंयस्यांमृताजन्तव:।

या नित्यंत्रिजगत्पवित्रतटिनीतीरेसुरै:सेव्यते

सा काशी त्रिपुरारिराजनगरीपायादपायाज्जगत्॥

इसका भावार्थ है कि- जो भूतल पर होने पर भी पृथ्वी से संबद्ध नहीं है, जो जगत की सीमाओं से बंधी होने पर भी सभी का बन्धन काटने वाली (मोक्षदायिनी) है, जो महात्रिलोकपावनी गंगा के तट पर सुशोभित तथा देवताओं से सुशोभित है, त्रिपुरारि भगवान विश्वनाथ की राजधानी वह काशी संपूर्ण जगत की रक्षा करें।"

हमारे सनातन धर्म के विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप पूर्ण रूप से विदित होता है। काशी नगरी के बारे में कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत: प्रलय होने पर भी इसका कभी विनाश नहीं होगा। भौगोलिक स्थिति की बात करें तो काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित एक प्राचीन पौराणिक नगरी है, जोकि गंगा के वाम (उत्तर) तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगा संगमों के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर यह पौराणिक नगरी स्थित है। इस नगर का प्राचीन 'वाराणसी' नाम लोकोच्चारण से 'बनारस' हो गया था, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने शासकीय रूप से पूर्ववत् 'वाराणसी' कर दिया है। उत्तर प्रदेश की इस पौराणिक प्राचीन पावन नगरी काशी में बाबा विश्वनाथ का स्थान है, इस स्थान पर विराजमान बाबा काशी विश्वनाथ का देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष महत्व है, उनको पूरी दुनिया का नाथ व जगत का पालनहार माना जाता है। 

सनातन संस्कृति के विद्वानों के द्वारा कहा जाता है कि भगवान शिव काशी नगरी को कभी नहीं छोड़ते हैं। काशी के बेहद पवित्र इस स्थान पर दुनिया भर के विभिन्न भागों से सनातन संस्कृति में विश्वास रखने वाले लोग जीवन-मरण से मुक्ति की प्राप्ति के लिए आते हैं। सनातन धर्म में आदिकाल से ही काशी को मोक्षदायिनी भूमि माना जाता है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ़ विश्वास है कि काशी में देह त्यागने मात्र से प्राणी जीवन लेने के बंधन मुक्त हो जाता है। पर्यटन के दृष्टिकोण से भी काशी नगरी बहुत महत्वपूर्ण है, यहां पर प्राचीन मंदिर व गंगा घाटों की भरमार है, हर वर्ष करोड़ों लोग बाबा काशी विश्वनाथ और बनारस के अन्य मंदिरों व घाटों की दिव्य अलौकिक छटा के दर्शन करने आते हैं। दुनिया भर में प्रसिद्ध बनारस के प्राचीन घाट भगवान भोलेनाथ की इस पावन पौराणिक प्राचीन नगरी की शान हैं, जिसका अलौकिक अहसास आपको वहां गंगा किनारे घाटों पर जाकर ही होगा। अगर आपकी जरा भी आध्यात्म में रुचि है और धार्मिक प्रवृत्ति है तो आपको बनारस के घाटों की सीढ़ियों पर बैठ कर माँ गंगा को निहारना आपके अंदर एक नयी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करके बेहद सुकून देता है। काशी को दुनिया में लोग बाबा काशी विश्वनाथ की नगरी, हजारों मंदिरों का शहर, भारत की धार्मिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी, घाटों का शहर, दीपों का शहर आदि विशेषण भी देते हैं।

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काशी विश्वनाथ में कॉरिडोर निर्माण से पहले किसी दर्शनार्थी के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। उसको बेहद भीड़भाड़ से जद्दोजहद करते हुए बेहद तंग गलियों वाले रास्तों पर अव्यवस्थित व्यवसायिक गतिविधियों वाली अतिक्रमण युक्त गलियों से निकल कर जाना होता था। इन तंग गलियों से निकल कर लंबी लाइन में घंटों इंतजार करना होता था। प्रसाद वाले, फूल वाले और सुरक्षा में लगे पुलिस वालों की अव्यवस्थित भीड़ को देखकर दर्शनार्थियों को डर लगता था। लेकिन नवनिर्मित काशी विश्वनाथ कॉरिडोर अब भक्तों को इन सब समस्याओं से मुक्ति दिलायेगा। उसी उद्देश्य के लिए कभी बनारस की तंग गलियों में स्थित बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द मोदी-योगी सरकार ने बहुत बड़े स्तर पर अधिग्रहण करके बड़े बदलाव किये हैं। प्राचीन व आधुनिकता के अनूठे दिव्य अलौकिक संगम के साथ मोदी-योगी की सरकार ने भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने का कार्य किया है। विश्वनाथ धाम के विस्तारीकरण और सुंदरीकरण परियोजना के तहत 5 लाख 27 हजार 730 वर्ग फीट में भव्य निर्माण किया है। इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 1000 करोड़ है और इसका उद्देश्य बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के इलाकों को आधुनिक व प्राचीन के संगम के साथ दोबारा भव्य बनाना था, जिसमें केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार काफी हद तक कामयाब होती नज़र आ रही है। मंदिर के पुनर्निर्माण में भव्यता प्रदान करने के लिए पत्थर वैसे ही लगाए जा रहे हैं जैसे हजारों वर्ष पहले लगाये जाते थे। मुख्य मंदिर परिसर के चार भव्य द्वार होंगे, इनसे आप मंदिर, घाट और शहर की तरफ से आ सकते हैं, लेकिन परिसर में घुसते ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन नहीं होंगे, गंगा घाट की तरफ से भी पहले पायदान पर दर्शन नहीं होगा, दर्शन के लिए श्रद्धालु को मंदिर के भीतर आना ही होगा, भव्य परिसर में विश्वानाथ मंदिर के आसपास में खुली जगह बनाई गई है, मुख्य परिसर के बाहर भी एक बड़ा परिसर है जहां शॉपिंग व श्रद्धालुओं के लिए अन्य सुविधाओं की व्यवस्था होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाबा विश्वनाथ धाम में पर्यावरण संरक्षण का पूरा ध्यान रखा गया है, मंदिर के आंगन में भगवान भोलेनाथ का सबसे प्रिय पौधा रुद्राक्ष लगाया जा रहा है। इसके अलावा पारिजात, अशोक, बेल के पौधे भी अपनी प्राकृतिक हरियाली बिखेरेंगे। बाबा के दिव्य मंदिर के दर्शन के लिए भक्त जब माँ गंगा में श्रद्धा के गोते लगाकर जल लेकर बाबा विश्वनाथ के दरबार की तरफ आस्था से परिपूर्ण अपना एक-एक कदम बढ़ाएंगे, तब श्रद्धालु को दोनों तरफ हरियाली का अद्भुत मनमोहक दृश्य बार-बार शिव धाम आने के लिए प्रेरित करेगा और मानसिक शांति व सुकून प्रदान करेगा। 

वैसे तो आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति की अति के चलते हमारे देश में जनहित का कोई भी कार्य करवाना आसान नहीं है, हर कार्य पर ओछी राजनीति चलती रहती है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर पर भी कुछ राजनेताओं के द्वारा ऐसा किया जा रहा है, लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि काशी जैसी प्राचीन नगरी में किसी भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी, लेकिन भगवान शिव के आशीर्वाद से मोदी-योगी सरकार ने इस चुनौती पर विजय हासिल की है। उत्तर प्रदेश में चुनावी वर्ष होने के चलते विपक्षी दलों के राजनेता लोकार्पण के भव्य कार्यक्रम को मोदी-योगी सरकार पर धर्म विशेष के मतदाताओं को आकर्षित करने माध्यम बता रहे हैं, लेकिन उन दलों व राजनेताओं को यह भी सोचना चाहिए कि भगवान शिव ने उनको भी सत्ता रहने का अवसर प्रदान किया था, उनके पास भी काशी के शिवधाम व देश के अन्य मंदिरों के जीर्णोद्धार करवाने का समय था। लेकिन उन्होंने कहीं ना कहीं धर्म विशेष के मतदाताओं की नाराजगी से बचने के लिए ऐसा कार्य नहीं करवाया, लेकिन हमको सोचना होगा कि देश के चंद राजनेताओं की यह संकुचित सोच देश के सर्वांगीण विकास में बड़ी बाधक है।

-दीपक कुमार त्यागी

(वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक)

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