असंभव को संभव कर दिखाना सबके बस की बात नहीं, Delhi में सुबह 4 बजे तक चली थी Modi की खास Diplomacy, तब जाकर माने थे Iran-UAE

Iran UAE
ANI

दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी।

नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक साझा BRICS घोषणा पर सहमत हो गए। करीब छह महीने से जारी युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ BRICS के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।

दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और UAE समेत BRICS के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें।

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भारत की अध्यक्षता में हुई लंबी और बेहद कठिन बातचीत के बाद आखिरकार वह रास्ता निकाला गया। बातचीत आधी रात के बाद तक चलती रही और करीब चार बजे तक सहमति बनाने की कोशिशें जारी रहीं। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं।

इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत उस समय सामने आया, जब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच BRICS सम्मेलन के इतर मुलाकात हुई। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है।

हम आपको बता दें कि BRICS की नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। घोषणा का मकसद किसी पक्ष की जीत या हार तय करना नहीं, बल्कि ऐसी न्यूनतम साझा जमीन तैयार करना था, जिस पर अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश भी एक साथ खड़े हो सकें।

यहीं भारत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS के विस्तार के बाद संगठन के भीतर अब सिर्फ आर्थिक हितों का मेल नहीं है, बल्कि ईरान, UAE और अन्य देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। ऐसे माहौल में सर्वसम्मति से घोषणा पारित कराना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। भारतीय कूटनीति ने पक्ष के साथ खड़े होने की बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया, जिसे विरोधी धड़े भी स्वीकार कर सकें।

देखा जाये तो इसका असर BRICS की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। अगर युद्ध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और UAE जैसे विरोधी हितों वाले देश एक ही घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो दिल्ली शिखर सम्मेलन ने यह संदेश जरूर दिया है कि BRICS सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। अब वह ऐसे भू-राजनीतिक संकटों में भी साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां वैश्विक शक्तियों के बीच सीधा टकराव मौजूद है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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