मीडिया के लिए राष्ट्रीय नीति बनाना जरूरी, नकारात्मक पत्रकारिता से देश को हो रहा नुकसान

मीडिया के लिए राष्ट्रीय नीति बनाना जरूरी, नकारात्मक पत्रकारिता से देश को हो रहा नुकसान

आज हमारे देश के प्रचार तंत्र ने नकारात्मक पत्रकारिता की दिशा में अपने कदम बढ़ाए हैं। वास्तव में यह नकारात्मकता कुछ समय के लिए सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन समाज के समक्ष बहुत बड़े ज्वलंत सवालों का पुलिन्दा छोड़कर चली जाती है।

एक कहावत है कि एक झूठ को सौ बार प्रचारित किया जाए तो वह लगभग सत्य जैसी ही प्रतीत होने लगती है। भारत में लंबे समय से ऐसा ही कुछ होता दिखाई दे रहा है, जिसमें सच पर पर्दा डालने का कार्य किया जा रहा है। अभी हाल ही नई दिल्ली में भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक लाल किले पर कुत्सित मानसिकता वाले उपद्रवियों ने जो उत्पात मचाया, उसकी देश एक स्वर से निंदा कर रहा है, लेकिन कुछ समाचार चैनल आज भी यही प्रचारित कर रहे हैं कि वे किसान हैं और जो हिंसा हुई है, वह पुलिस ने की है, जबकि वीडियो क्लिपिंग में यह साफ दिखाई दे रहा था था कि ट्रैक्टर चालकों का उद्देश्य क्या था? वे पुलिस को चपेट में लेने के लिए उतावले थे। इतना ही नहीं उन्होंने पुलिस को पीटा भी। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि मार खाने की भी एक सीमा होती है। ऐसा लगता है कि देश के मीडिया को यह सब नहीं दिखा। 

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सांस्कृतिक वातावरण से कोसों दूर जाने वाली हमारे देश की जनता भी इस झूठ को सत्य मानने के लिए विवश हो जाती है। इसके परिणाम स्वरूप समाज के समक्ष गंभीर चेतावनी फन उठाकर खड़ी हो जाती है। लेकिन लम्बे समय बाद जब सत्य सामने आता है, तब मीडिया जगत में उसकी चर्चा उतनी नहीं होती, जितनी झूठ की होती है। आज हमारे देश के प्रचार तंत्र ने नकारात्मक पत्रकारिता की दिशा में अपने कदम बढ़ाए हैं। वास्तव में यह नकारात्मकता कुछ समय के लिए सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन समाज के समक्ष बहुत बड़े ज्वलंत सवालों का पुलिन्दा छोड़कर चली जाती है। किसी भी घटना की सत्यता की परख किए बिना उसे समाचारों की सनसनी बना देना किसी भी प्रकार से सही नहीं माना जा सकता। वर्तमान में टीआरपी की मारामारी में हमारे प्रचार माध्यमों को किस सीमा तक पहुंचा दिया है, यह हम देख भी रहे हैं और परिणाम भी भुगत रहे हैं।

अर्थ युग में जीने वाले प्रचार माध्यमों ने कई बार ऐसी खबरों को सनसनी बनाया है, जिसमें होता कुछ और है और वास्तविकता कुछ और होती है। कुछ समय पूर्व घटित हुए रोहित वेमुला प्रकरण के बारे में कथित वामपंथी बुद्धिजीवियों ने ऐसा प्रचारित करने का प्रयास किया, जैसे ऐसा प्रकरण देश में पहली बार हुआ हो, इसके बाद हमारे देश के मीडिया ने भी लगभग आग में घी डालने जैसी भूमिका का निर्वाह किया। सभी लोग केन्द्र सरकार के पीछे ऐसे पड़ गए जैसे पूरा देश जल गया हो। रोहित वेमुला प्रकरण में जांच के उपरांत जो सत्य सामने आया, वह एकदम विपरीत चित्र प्रस्तुत करने वाला रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही आता है कि इन कथित वामपंथी बुद्धिजीवियों ने उस समय अपने विवेक का उपयोग क्यों नहीं किया। घटना की सत्यता को जाने बिना उसे तिल का ताड़ क्यों बनाया। इसके अलावा मीडिया ने भी इस घटना की सत्यता का अध्ययन न करते हुए केवल वही दिखाने का प्रयास किया, जैसा इन कथित वामपंथी बुद्धिजीवियों ने चाहा। क्या यही निष्पक्ष पत्रकारिता का चेहरा है?

वास्तव में मीडिया को भी खबरों को प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रीय नीतियों के बारे में भी सोचना चाहिए। नकारात्मक पत्रकारिता की बजाय सकारात्मक पत्रकारिता को प्रस्तुत करने वाले समाचार प्रस्तुत करना चाहिए। यह बात सही है कि मीडिया की भूमिका एक अच्छे समाज का निर्माण करने में सहायक हो सकती है, लेकिन यह केवल तभी हो सकता है, जब हम हम समाज की अच्छाइयों के बारे में चिंतन करें। वर्तमान में हम देख रहे हैं कि समाज की बुराई को भी सनसनी बनाकर परोसा जा रहा है। इन समाचारों में समाचार माध्यम पूरे विवरण के साथ यहां तक बता देते हैं कि यह घटना कैसे घटित हुई। यानि मीडिया ने समाज के सामने घटना करने का एक नया तरीका बता दिया। मुझे याद है दिल्ली की एक घटना। जिसमें एक चोर में बहुत ही बुद्धिमानी के साथ चोरी को अंजाम दिया। उसके तरीके पर समाज ही नहीं बल्कि प्रशासन भी अवाक था। जब चोर से पूछा गया कि यह तरीका उसको कैसे मिला तो उसने जो जवाब दिया वह आंखें खोलने वाला है। चोर ने कहा कि मुझे चोरी करने का यह नया विचार चैनलों ने दिया। आज हमारे चैनल भी कुछ ऐसा ही प्रस्तुत करते दिखाई दे रहे हैं। समाचारों में पूरी तरह दिशाहीनता है। वास्तव में मीडिया को पथ प्रदर्शक बनकर समाज को राह दिखाने का काम करना चाहिए। बिना किसी आधार के खबरों को सनसनी प्रदान करना किसी भी दृष्टि से न्याय संगत नहीं माना जा सकता। 

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आज मीडिया पर जिस प्रकार की खबरें प्रसारित की जा रही हैं, उससे प्रथम दृष्टया ऐसा ही लगता है कि मीडिया के लिए भी ऐसी राष्ट्रीय नीति बनना चाहिए, जिससे मीडिया पर निगरानी हो सके। इस कार्य में किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। वास्तव में जहां राष्ट्रनीति की बात आ जाती है तो वहां पर राजनीति समाप्त हो जानी चाहिए, लेकिन हमारे देश में इसका उलटा ही दिखाई देता है। राष्ट्रनीति पर भी राजनीति की जाने लगी है। कुछ महीने पूर्व देश के एक समाचार चैनल ने पठानकोट के आतंकी हमले को इस प्रकार प्रसारित किया, जैसे वह पाकिस्तान का चैनल हो। उसने साफ शब्दों में कहा कि आतंकी जहां छुपे हैं, उनसे कुछ ही दूरी पर विस्फोटक सामग्री रखी है, अगर वह उसके हाथ लग जाए तो तबाही हो सकती है। इस खबर में एक प्रकार से हम उन आतंकियों को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि तुम्हारे पास ही विस्फोटक सामग्री है। ऐसी खबरें देश को बहुत बड़े खतरे की ओर ले जा सकती हैं। जब केन्द्र सरकार ने इस चैनल पर एक दिन का प्रतिबंध लगाया, तब देश के राजनीतिक दलों ने राष्ट्रनीति को भुलाकर राजनीति करना शुरु कर दी। मात्र एक चैनल पर प्रतिबंध लगाने की बात को सारे मीडिया पर आघात कहा गया। ऐसे में सवाल यह आता है कि हमारे राजनेताओं को ऐसा क्यों लगा कि सारे मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि वास्तविकता यह थी कि केवल एक चैनल के अलावा सारे चैनलों पर प्रसारण जारी रहा।

चाहे किसान आंदोलन का मामला हो या फिर अन्य, सभी में राजनीति करने का पूरा प्रयास हुआ। कौन नहीं जानता कि गाय भारत की आस्था है फिर क्यों उसे सरेआम काटकर खाया गया। इसके लिए गाय का ही चयन क्यों किया गया। यह ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अभिव्यक्ति की आजादी और खाने के अधिकार के तहत बचाव करने की राजनीति की जाती है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों को तो राष्ट्रीय मर्यादाओं का पालन करना ही चाहिए, साथ ही मीडिया को भी निष्पक्ष भाव से खबरें प्रस्तुत करना चाहिए। वास्तविकता यह भी है कि इन सभी घटनाओं को केवल इसलिए उभारने का प्रयास किया गया ताकि वर्तमान केन्द्र सरकार को बदनाम किया जा सके। वास्तव में इस प्रकार की राजनीति बंद होना चाहिए।

-सुरेश हिंदुस्थानी

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)