सोची−समझी साजिश का हिस्सा होते हैं नेताओं के विवादित बयान

  •  अजय कुमार
  •  मई 18, 2019   11:46
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सोची−समझी साजिश का हिस्सा होते हैं नेताओं के विवादित बयान
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बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने प्रियंका गांधी के मोदी को दुर्योधन कहे जाने वाले विवादित बयान को और धारदार बना दिया. राबड़ी देवी ने कहा, ''उन्होंने (प्रियंका) दुर्योधन बोलकर गलत किया. दूसरी भाषा बोलनी चाहिए थी. वो सब तो जल्लाद हैं, जल्लाद। जो जज और पत्रकार को मरवा देते हैं, उठवा लेते हैं, ऐसे आदमी का मन और विचार कैसे होंगे, खूंखार होंगे।

17 वीं लोकसभा का चुनाव अन्य बातों के अलावा नेताओं की बदजुबानी के लिए भी याद किया जाएगा। इस बार की जैसी विवादित बयानबाजी तो कभी देखने को नहीं मिली। खासकर नेताओं के मुंह से अंजाने में विवादित बयान नहीं निकल रहे थे, बल्कि विवादित बयान सोच−समझकर दिए जा रहे थे। विवादित बयानबाजी में पुरूष तो पुरूष महिला नेता भी पीछे नजर नहीं आई। इन नेताओं को इस बात की भी चिंता नहीं थी कि ऐसे विवादित बयानों से समर्थकों के बीच उनकी छवि धूमिल होती है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो हद ही कर दी। उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिया विवादस्पद बयान कि मोदी के पास जाते हैं जब भाजपा नेता तो डरती हैं उनकी पत्नियां, ने तो सारी हदें ही पार कर दीं। माया ने कहा भारतीय जनता पार्टी के लोग महिलाओं का सम्मान नहीं करते, यहां तक कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए पीएम मोदी ने अपनी पत्नी को भी छोड़ दिया।

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कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू मोदी के खिलाफ लगातार विवादित बयानबाजी कर रहे हैं। उन्होने इंदौर में एक कार्यक्रम में कहा था, 'मोदी उस दुल्हन की तरह हैं, जो रोटी कम बेलती है और चूडि़यां ज्यादा खनकाती है, ताकि मोहल्ले वालों को पता चले कि वह काम कर रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकाजुर्न खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित बयान देते हुए कर्नाटक के कलबुर्गी के एक चुनावी सभा में कहा कि अगर हमें 40 से ज्यादा सीटें मिलती हैं तो क्या मोदी दिल्ली के विजय चौक पर फांसी लगा लेंगे।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, जहां भी वो (मोदी जी) जाते हैं, कहते हैं कि कांग्रेस को लोकसभा में 40 सीटें भी नहीं मिल पाएंगी. क्या आप में से कोई भी इसे मानता है? अगर कांग्रेस को 40 से ज्यादा सीटें मिल गईं तो क्या मोदी दिल्ली के विजय चौक पर फांसी लगा लेंगे?

इस चुनाव में कांग्रेस नेता मणिशंकर अययर की काफी कमी महसूस हो रही थी। 2014 में मणि ने मोदी को नीच बताया था, जिसको मोदी ने खूब भुनाया था। इस बार भी मणिशंकर आए तो विवादित बयान के साथ। उन्होंने कहा कि मैं ने मोदी को लेकर 2014 में जो भविष्यवाणी की थी वह सच साबित हो रही है। उनका इशारा साफ था कि मोदी नीच किस्म के व्यक्ति हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर राफेल सौदे में कथित रूप से भ्रष्टाचार करने के आरोप लगाते रहे हैं। वो अपनी हर रैली में चौकीदार चौर है का नारा दोहराते हैं।

छठे चरण के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौ मई को राहुल गांधी के चौकीदार चोर है के नारे के जवाब में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को निशाने पर लिया। उन्होंने राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी बताया और कहा कि उनकी जिंदगी का अंत भ्रष्टाचारी नंबर एक के तौर पर हुआ. मोदी ने ये भी कहा कि राजीव गांधी आईएनएस विराट पर छुट्टियां मनाने जाते थे और इसका इस्तेमाल उन्होंने टैक्सी की तरह किया।

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सक्रिय राजनीति में नई−नई आईं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने मोदी पर विवादित बयान देते हुए कहा कि लोग प्रधानमंत्री को अच्छी तरह से समझाने वाले हैं. मोदी में भी कौरवों के नेता दुर्योधन की तरह अहंकार है। प्रियंका गांधी ने कहा, 'इस देश ने कभी अहंकार और घमंड को माफ नहीं किया है, इतिहास इसका गवाह है. ऐसा अहंकार दुर्योधन में भी था, उन्हें सच्चाई दिखाने के लिए भगवान कृष्ण समझाने गए तो दुर्योधन ने कृष्ण जी को भी बंधक बनाने की कोशिश की। प्रियंका हरियाणा के अंबाला से कांग्रेस प्रत्याशी कुमारी सैलजा के लिए चुनाव प्रचार करने गई थीं।

इसी बीच बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने प्रियंका गांधी के मोदी को दुर्योधन कहे जाने वाले विवादित बयान को और धारदार बना दिया. राबड़ी देवी ने कहा, 'उन्होंने (प्रियंका) दुर्योधन बोलकर गलत किया. दूसरी भाषा बोलनी चाहिए थी. वो सब तो जल्लाद हैं, जल्लाद। जो जज और पत्रकार को मरवा देते हैं, उठवा लेते हैं, ऐसे आदमी का मन और विचार कैसे होंगे, खूंखार होंगे।

समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री रविदास मेहरोत्रा ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्लाद बताया था। मेहरोत्रा ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा था, प्रधानमंत्री ने पिछले पांच सालों में जनता पर बेतहाशा जुल्म और अन्याय किए हैं। इसलिए आज पूरा देश उस जालिम से छुटकारा पाना चाहता है।

अपने विवादित बयानों के लिए चर्चित भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह अक्सर विपक्षियों पर हमला बोलते नजर आते हैं, लेकिन इन चुनावों के दौरान उनकी जुबान ऐसी फिसली कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही खिलाफ बोल पड़े. मई के पहले हफ्ते में मुजफ्फरपुर में आयोजित एक प्रेस वार्ता में गिरिराज सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी पर चरमपंथियों को समर्थन देने की बात कह डाली. उन्होंने कहा था,' ये आज से नहीं, जब से सरकार बनी, मोदी जी ने आतंकियों का समर्थन किया, सेना को गाली दी. गिरिराज सिंह ये बातें पहले की सरकारों के खिलाफ बोलना चाह रहे थे। जुबान फिसलने के कारण उन्होंने विपक्षियों के नाम की जगह, अपने ही नेता का नाम ले लिया।

प्रियंका गांधी के मोदी को दुर्योधन बताने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय निरुपम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना औरंगजेब से की थी और कहा कि उनसे भाजपा के लोग भी त्रस्त हैं। वाराणसी में कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय के समर्थन में एक सभा के दौरान संजय ने कहा था, वाराणसी के लोगों ने जिस व्यक्ति को चुना वो औरंगजेब के आधुनिक अवतार हैं क्योंकि यहां पर कॉरिडोर के नाम पर सैकड़ों मंदिरों को तुड़वाया गया और विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के नाम पर 550 रुपए की फीस लगाई गई। उन्होंने कहा ये इस बात का सबूत है कि जो काम औरंगजेब नहीं कर पाया वो नरेंद्र मोदी कर रहें हैं। औरंगजेब ने जजिया कर लगाकर हिंदुओं पर अत्याचार किया था, उसी तरह नरेंद्र मोदी मंदिरो को तोड़कर बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए जजिया लगा रहें हैं।

30 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्धा की एक रैली में राहुल गांधी पर निशाना साधा. उन्होंने यहां अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का मुद्दा छेड़ा। मोदी ने कहा, 'अब उनकी (राहुल गांधी) हिम्मत नहीं है कि जहां पर बहुसंख्यक (हिंदू) रहते हैं, वहां से चुनाव लड़े। इसलिए भाग कर वहाँ शरण लेने को मजबूर हुए हैं जहां बहुसंख्यक अल्पसंख्या में हैं।'

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का वो बयान भी काफी विवादों में रहा था जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री को मिट्टी के बने और कंकड़ भरे लड्डू भेजने की बात कही थी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख का ये बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को दिए इंटरव्यू के बाद आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि ममता दीदी उन्हें साल में एक बार कुर्ते और मिठाइयां भेजती हैं।

रानीगंज की एक रैली में ममता ने कहा था,' नरेंद्र मोदी वोट मांगने बंगाल आ रहे हैं, लेकिन लोग उन्हें कंकड़ भरे और मिट्टी से बने लड्डू देंगे, जिसे चखने के बाद उनके दांत टूट जाएंगे। इससे पहले उन्होंने कहा था कि वो शिष्टाचार के नाते मोदी को ये सब भेजती थीं, लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक करके एक राजनीतिक मुद्दा बना दिया।

अप्रैल के अंतिम सप्ताह में पूर्व क्रिकेटर और पंजाब के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस उम्मीदवार के लिए चुनाव रैली को संबोधित करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को लेकर विवादित बयान दिया था।  उन्होंने कहा था कि अगर नरेंद्र मोदी फिर से पीएम बन गए तो हिंदुस्तान खत्म हो जाएगा। उन्होंने भोपाल में कहा था कि मच्छर को कपड़े पहनाने, हाथी को गोद में झुलाने और तुमसे सच बुलवाना असंभव है नरेंद्र मोदी। उन्होंने कहा पहले जब हमले होते थे तो लोग इस्तीफा देते थे। अब लोग वोट मांगते हैं। लाशों की राजनीति करते हैं। सिद्धू ने कहा कि मोदी डूबता सूरज है और राहुल गांधी उगता सूरज है। नरेंद्र मोदी, बात करोड़ों की, दुकान पकोड़ों की और संगत भगोड़ों की। वाह रे तेरे जुमले, जुमला प्रसाद।

- अजय कुमार







गांवों की उपेक्षा कर अनियोजित तरीके से बसाए जा रहे शहर पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा

  •  ललित गर्ग
  •  दिसंबर 4, 2020   11:43
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गांवों की उपेक्षा कर अनियोजित तरीके से बसाए जा रहे शहर पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा
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पर्यावरण एवं प्रकृति को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशकों के दौरान यह प्रवृत्ति पूरे देश में बढ़ी है। लोगों ने दिल्ली एवं ऐसे ही महानगरों की सीमा से सटे खेतों पर अवैध कालोनियां काट लीं।

कोरोना की उत्तरकालीन व्यवस्थाओं पर चिन्तन करते हुए बढ़ते पर्यावरण एवं प्रकृति विनाश को नियंत्रित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, इसके लिये बढ़ते शहरीकरण को रोकना एवं गांव आधारित जीवनशैली पर बल देना होगा। भले ही शहरीकरण को आर्थिक और सामाजिक वृद्धि का सूचक माना जाता है। लेकिन अनियंत्रित शहरीकरण बड़ी समस्या बन रहा है। भारत में तो शहरीकरण ने अनेक समस्याएं खड़ी कर दी हैं, आम जनजीवन न केवल स्वास्थ्य बल्कि जीवनमूल्यों की दृष्टि से जटिल होता जा रहा है। आर्थिक विकास भी इसी कारण असंतुलित हो रहा है। ऐसे में जब कोरोना जैसे अभूतपूर्व संकट के दौरान बेतरतीब जीवनशैली से भरे शहर अचानक डराने लगें तब हमारे गांवों ने ही शहरी लोगों को पनाह दी। इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसी योजनाएं बनाई जाएं जिससे गांवों में शहरों जैसी सुविधाएं उपलब्ध हो सकें ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों को होने वाले पलायन की रफ्तार कुछ थम सके।

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पर्यावरण एवं प्रकृति को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशकों के दौरान यह प्रवृत्ति पूरे देश में बढ़ी है। लोगों ने दिल्ली एवं ऐसे ही महानगरों की सीमा से सटे खेतों पर अवैध कालोनियां काट लीं। इसके बाद जहां कहीं सड़क बनी, उसके आसपास के खेत, जंगल, तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगल में बदल दिया गया। देश के अधिकांश उभरते शहर अब सड़कों के दोनों ओर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। दरअसल स्वतन्त्र भारत के विकास के लिए हमने जिन नक्शे कदम पर चलना शुरू किया उसके तहत बड़े-बड़े शहर पूंजी केन्द्रित होते चले गये और रोजगार के स्रोत भी ये शहर ही बने। शहरों में सतत एवं तीव्र विकास और धन का केन्द्रीकरण होने की वजह से इनका बेतरतीब विकास स्वाभाविक रूप से इस प्रकार हुआ कि यह राजनीतिक दलों के अस्तित्व और प्रभाव से जुड़ता चला गया, लेकिन पर्यावरण एवं प्रकृति से कटता गया। इसी कारण गांव आधारित अर्थ-व्यवस्थाएं लडखड़ाने लगी हैं।

बढ़ते शहरीकरण के बावजूद एक बड़ा सच यह भी है कि आज भी देश में सत्तर फीसद आबादी गांवों में बसती है। यानी अगर शहरीकरण को विकास का पैमाना मान भी लिया जाए तो हम दुनिया के ज्यादातर देशों से अभी बहुत पीछे हैं। बहरहाल, कितने भी पीछे हों, लेकिन जितना और जैसा समस्याबहुल शहरीकरण हो रहा है उसने गंभीर सोच-विचार के लिए हमें मजबूर कर दिया है। खासकर तब, जब शहरीकरण की मौजूदा चाहत के चलते अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक देश की शहरी आबादी गांवों की आबादी से ज्यादा हो जाएगी।

केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा कि उम्मीद के मुताबिक भारत की 40 प्रतिशत आबादी 2030 तक शहरी क्षेत्रों में रहेगी और हमें इसके लिए छह से आठ सौ मिलियन वर्ग मीटर का अर्बन स्पेस बनाना होगा। पुरी के अनुसार 100 स्मार्ट सिटी में 1,66,000 करोड़ रुपये की लगभग 4,700 परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जो प्रस्तावित कुल परियोजनाओं का लगभग 81 प्रतिशत है। सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है बढ़ते शहरीकरण को नियोजित करने की। शहरों में अधिक आबादी रहने का मतलब है कि उनका आधारभूत ढांचा संवारने का काम युद्ध स्तर पर किया जाए ताकि वे बढ़ी हुई आबादी का बोझ सहने में समर्थ रहें और साथ ही रहने लायक भी बने रहें। लेकिन हकीकत इससे बहुत अलग है। हमारे जिन भी नीति नियंताओं और विभागों पर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर शहरी ढांचे का निर्माण करने की जिम्मेदारी होती है, वे शहरों के नियोजन के नाम पर कामचलाऊ ढंग से काम करते हैं। नया शहरीकरण अनियोजित और मनमाना होता है, जहां पर सिर्फ कंक्रीट के जंगल होते हैं तो पुराने इलाके में पूरा ढांचा ही जर्जर और गंदगी से भरा होता है। इसका नतीजा यह होता है कि हमारे देश में शहरों की परिभाषा तरह-तरह के प्रदूषणों, गंदगी, वायु दूषित होने, अतिक्रमण, अपराध, ट्रैफिक जाम, जलभराव, झुग्गी बस्तियों, अनियंत्रित निर्माण और कूड़े के पहाड़ के बगैर पूरी ही नहीं होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले ही कार्यकाल में स्मार्ट सिटी की अवधारणा लेकर आए थे। लेकिन यह योजना भी भ्रष्टाचार, पैसे की तंगी और अनियमितता की भेंट चढ़ गई। यह योजना केंद्र सरकार और राज्यों के बीच टकराव का कारण भी बन गई। इसके साथ ही एक समस्या यह भी है कि सिर्फ फ्लाईओवर, मेट्रो आदि का निर्माण करके हमारे नीति नियंता शहरीकरण के नाम पर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं लेकिन क्या इससे शहरों में रहने लायक स्थिति बन जाती है ? क्या बढ़ता शहरीकरण पर्यावरण एवं प्रकृति के लिये गंभीर खतरा नहीं बन रहा है ?

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भारत की अर्थ-व्यवस्था आज भी गांव, कृषि, पशुपालन आधारित है। असली भारत आज भी गांवों में ही बसता है जिसमें देश की करीब 70 फीसद आबादी रहती है। दरअसल वास्तविकता यह है कि हमने आजादी के बाद से लेकर अब तक गांवों एवं गांव आधारित स्वस्थ, उन्नत एवं आत्मनिर्भर जीवन को नकारा है। गांवों की उन्नति एवं उन्हें बेहतर बनाने की बजाए हमने उनकी उपेक्षा की है, जिससे वहां से पलायन बढ़ा है। हमारी सरकारें शहरीकरण के नाम पर हजारों करोड़ रुपया खर्च करने के लिए तैयार हैं लेकिन गांवों में मूलभूत सुविधाओं के नाम पर भी पैसा देने से उन्हें तकलीफ होने लगती है। गांवों को लेकर सरकार की नीतियां विसंगतिपूर्ण रही हैं। खेती को घाटे का सौदा बता दिया गया और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को निराश करने वाली व्यवस्था में बदल दिया गया। खेती को मुनाफे का सौदा बनाने और गांवों की अर्थव्यवस्था में निवेश करने की बजाय पूरा ध्यान गांवों की जनसंख्या को शहरों में खींच लेने पर रहा।

गांवों के प्रति उपेक्षा से जुड़ी हकीकत यह है कि बड़ी आबादी वहां रहने के बावजूद पेयजल की सप्लाई नहीं है, चिकित्सा-सुविधाएं नगण्य हैं। प्रति व्यक्ति बिजली की खपत देखी जाए तो गांव काफी पीछे हैं लेकिन इसके बावजूद बिजली कटौती की सबसे ज्यादा मार ग्रामीण इलाकों पर ही पड़ती है। गांवों में शिक्षा का ढांचा आज भी जर्जर है। बीते सात दशकों में रोजगार सृजन को लेकर गांवों की अनदेखी की गई है। गांवों की परिवहन समस्याओं के प्रति भी हमारी सरकारें उदासीन रही हैं।

हमारे देश में संस्कृति, मानवता और जीवन का विकास नदियों के किनारे एवं गांवों में ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव जीवन फलता-फूलता रहा है। बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई। और यही कारण कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर। बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और उज्ज्वल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़कर शहर की चकाचौंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृत्ति का परिणाम है कि देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या लगभग 350 हो गई है जबकि 1971 में ऐसे शहर मात्र 151 थे। यही हाल दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों का है।

महानगर केवल पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूषण की भी गंभीर समस्या उपजा रहे हैं। लोग अपनों से, मानवीय संवेदनाओं से, अपनी लोक परंपराओं व मान्यताओं से कट रहे हैं। जिसके कारण परम्परा एवं संस्कृति में व्याप्त पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण के जीवन सूत्रों से हम दूर होते जा रहे हैं, ऐसे कारणों का लगातार बढ़ना, नगरों- महानगरों का बढ़ना, जनसंख्या बहुल क्षेत्रों का सुरसा सतत विस्तार पाना और उसकी चपेट में प्रकृति और उसकी नैसर्गिकता का आना गंभीर स्थितियां हैं। इंसान की क्षमता, जरूरत और योग्यता के अनुरूप उसे अपने मूल स्थान पर यानी गांवों में अपने सामाजिक सरोकारों के साथ जीवन-यापन का हक मिले, विकास का अवसर मिले। यदि विकास के प्रतिमान ऐसे होंगे तो शहर की ओर लोगों का पलायन रूकेगा। इससे हमारी धरती को कुछ राहत अवश्य मिलेगी। प्रकृति एवं पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरों में भी तभी कमी आयेगी।

-ललित गर्ग







कड़ी मेहनत के चलते शून्य से शिखर तक पहुँचे थे मसाला किंग महाशय धर्मपाल गुलाटी

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  दिसंबर 3, 2020   13:10
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कड़ी मेहनत के चलते शून्य से शिखर तक पहुँचे थे मसाला किंग महाशय धर्मपाल गुलाटी
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अपने ब्रांड के सभी विज्ञापनों में खुद मॉडलिंग करने वाले महाशय धरमपाल गुलाटी को 'दादजी', 'मसाला किंग', 'किंग ऑफ स्पाइसेज' और 'महाशयजी' के नाम से भी जाना जाता था। मशहूर धरमपाल गुलाटी का जन्म 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था।

छोटा व्यवसाय शुरू कर उसे शिखर तक पहुँचाने वाले और 98 वर्ष की उम्र में भी अपनी जिंदादिली, अपनी सक्रियता से सबको चौंका देने वाले एमडीएच ग्रुप के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी का गुरुवार को निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के माता चानन देवी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 98 वर्षीय महाशय धर्मपाल गुलाटी बीमारी के चलते पिछले कई दिनों से माता चानन देवी अस्पताल में भर्ती थे। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि गुरुवार सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने सुबह 5:38 बजे अंतिम सांस ली। इससे पहले महाशय गुलाटी कोरोना से संक्रमित हो गए थे। हालांकि बाद में वह ठीक हो गए थे। भारत सरकार ने पिछले साल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

एमडीएच के सभी विज्ञापनों में मॉडलिंग की

शुरू से लेकर 98 वर्ष की उम्र में भी अपने ब्रांड के सभी विज्ञापनों में खुद मॉडलिंग करने वाले महाशय धरमपाल गुलाटी को 'दादजी', 'मसाला किंग', 'किंग ऑफ स्पाइसेज' और 'महाशयजी' के नाम से भी जाना जाता था। मशहूर धरमपाल गुलाटी का जन्म 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले धर्मपाल गुलाटी शुरुआती दिनों में विभिन्न व्यवसायों में हाथ आजमाने के बाद अपने पिता के मसाले के व्यवसाय में शामिल हो गए थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद महाशय धर्मपाल गुलाटी भारत आ गए और अमृतसर में एक शरणार्थी शिविर में कुछ दिन रहे। इसके बाद मन में कुछ बड़े निश्चय लेकर वह दिल्ली आ गए थे। दिल्ली आने के समय 27 सितंबर 1947 को उनके पास केवल 1500 रुपये थे। महाशय धर्मपाल गुलाटी ने एक साक्षात्कार में स्वयं बताया था कि इन 1500 रुपए में से 650 रुपये में उन्होंने एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड के बीच चलाया लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने तांगा भाई को दे दिया और करोल बाग की अजमल खां रोड पर ही एक छोटी-सी दुकान लगाकर मसाले बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे मसाले का कारोबार चल निकला और एमडीएच ब्रांड की नींव पड़ गई। महाशय धर्मपाल गुलाटी ने 1959 में आधिकारिक तौर पर एमडीएच कंपनी की स्थापना की थी। शुरुआती संघर्ष के बाद धीरे-धीरे उनका मसालों का व्यवसाय केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में फैल गया। इससे गुलाटी भारतीय मसालों के बड़े वितरक और निर्यातक बन गए।

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एमडीएच का कारोबार

महाशय धर्मपाल गुलाटी की कंपनी ब्रिटेन, यूरोप, यूएई, कनाडा आदि सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मसालों का निर्यात करती है और भारत की तो यह शीर्ष मसाला कंपनी है ही। अपनी गुणवत्ता के लिए एमडीएच ब्रांड के मसाले खूब मशहूर हैं। महाशियां दी हट्टी’ (एमडीएच) की स्थापना उनके दिवंगत पिता महाशय चुन्नी लाल गुलाटी ने की थी। उद्योग जगत को नई दिशा देने के लिए वर्ष 2019 में भारत सरकार ने महाशय धर्मपाल गुलाटी को देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया था। एमडीएच मसाला के अनुसार, धर्मपाल गुलाटी अपने वेतन की लगभग 90 प्रतिशत राशि दान करते थे। व्यापार के साथ ही महाशय धर्मपाल गुलाटी ने विभिन्न सामाजिक कार्य भी किये। इनमें अस्पताल और स्कूल आदि बनवाना आदि शामिल है।

-नीरज कुमार दुबे







जाते-जाते ट्रंप ईरान पर हमला बोल दें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  दिसंबर 2, 2020   15:02
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जाते-जाते ट्रंप ईरान पर हमला बोल दें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा
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अपनी हार के बावजूद हीरो बनने के फेर में यदि ट्रंप ईरान पर जाते-जाते हमला बोल दें तो कोई आश्चर्य नहीं है। वैसे भी उन्होंने पश्चिम एशिया के ईरान-विरोधी राष्ट्रों- इजराइल, सऊदी अरब, जोर्डन, यूएई और बहरीन आदि को एक जाजम पर बिठाने में सफलता अर्जित की है।

ईरान के परमाणु-वैज्ञानिक मोहसिन फख्रीजाद की हत्या एक ऐसी घटना है, जो ईरान-इजराइल संबंधों में तो भयंकर तनाव पैदा करेगी ही, यह बाइडन-प्रशासन के रवैए को भी प्रभावित कर सकती है। फख्रीजाद ईरान के परमाणु-बम कार्यक्रम के अग्रगण्य वैज्ञानिक थे। उनका नाम लेकर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें काफी खतरनाक आदमी बताया था। ईरानी सरकार का दावा है कि तेहरान के पास आबसर्द नाम के गांव में इस वैज्ञानिक की हत्या इजराइली जासूसों ने की है। इसके पहले इसी साल जनवरी में बगदाद में ईरान के लोकप्रिय जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या अमेरिकी फौजियों ने कर दी थी।

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ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनई ने कहा है कि ईरान इस हत्या का बदला लेकर रहेगा। यों भी पिछले 10 साल में ईरान के छह वैज्ञानिकों की हत्या हुई है। उसमें इजराइल का हाथ बताया गया था। हत्या की इस ताजा वारदात में अमेरिका का भी हाथ बताया जा रहा है, क्योंकि ट्रंप के विदेश मंत्री माइक पोंपिओ पिछले हफ्ते ही इजराइल गए थे और वहां उन्होंने सउदी सुल्तान और नेतन्याहू के साथ भेंट की थी। ईरानी सरकार को शंका है कि ट्रंप-प्रशासन अगली 20 जनवरी को सत्ता छोड़ने के पहले कुछ ऐसी तिकड़म कर देना चाहता है, जिसके कारण बाइडन-प्रशासन चाहते हुए भी ईरान के साथ तोड़े गए परमाणु समझौते को पुनर्जीवित न कर सके।

ओबामा-प्रशासन और यूरोपीय देशों ने ईरान के साथ जो परमाणु समझौता किया था, उसे ट्रंप ने भंग कर दिया था और ईरान पर से हटे प्रतिबंध को दुबारा थोप दिया था। अब ईरान गुस्से में आकर यदि अमेरिका के किसी बड़े शहर में कोई जबर्दस्त हिंसा करवा देता है तो बाइडन-प्रशासन को ईरान से दूरी बनाए रखना उसकी मजबूरी होगी। यह दुविधा ईरानी नेता अच्छी तरह समझ रहे होंगे। यह तो गनीमत है कि ट्रंप ने अपनी घोषणा के मुताबिक अभी तक ईरान पर बम नहीं बरसाए हैं।

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अपनी हार के बावजूद हीरो बनने के फेर में यदि ट्रंप ईरान पर जाते-जाते हमला बोल दें तो कोई आश्चर्य नहीं है। वैसे भी उन्होंने पश्चिम एशिया के ईरान-विरोधी राष्ट्रों- इजराइल, सऊदी अरब, जोर्डन, यूएई और बहरीन आदि को एक जाजम पर बिठाने में सफलता अर्जित की है। बाइडन-प्रशासन की दुविधा यह है कि वह इस इजराइली हमले की खुली भर्त्सना नहीं कर सकता लेकिन वह किसी को भी दोष दिए बिना इस हत्या की निंदा तो कर ही सकता है। ईरान और बाइडन-प्रशासन को इस मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रखना होगा।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक