भारत-अमेरिका सोलर ऊर्जा क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को देंगे चुनौती!

भारत-अमेरिका सोलर ऊर्जा क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को देंगे चुनौती!

रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने गत गुरुवार को भारत को सोलर इनर्जी के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना का ऐलान करते हुए लगभग 75,000 करोड़ रुपये के निवेश का एलान किया है।

भारत सरकार वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा से 2.80 लाख मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य ले कर चल रही है। उसके इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग देने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने गुजरात के जामनगर में 5,000 एकड़ में "धीरुभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा कंप्लैक्स" स्थापित करने की ताजा घोषणा की है। यह महत्वाकांक्षी प्लांट चीन के सबसे बड़े सोलर उपकरण प्लांट के बराबर या उससे भी बड़ा होगा, जो भारत के लिए गौरव की बात होगी।

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प्राप्त जानकारी के मुताबिक, यहां पर सोलर एनर्जी क्षेत्र के सारे उपकरण और उनके कच्चे माल का भी निर्माण किया जाएगा। इसके अलावा, सोलर सेल्स में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पॉलीसिलिकान का निर्माण भी होगा। इससे देश को यह फायदा होगा कि अगले तीन वर्षों में भारत में चीन से भी ज्यादा सस्ते एवं टिकाऊ उपकरण तैयार होने लगेंगे।

इसी मकसद से रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआइएल) के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने गत गुरुवार को भारत को सोलर इनर्जी के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना का ऐलान करते हुए लगभग 75,000 करोड़ रुपये के निवेश का एलान किया है। यह महज संयोग है या फिर कोई तकनीकी रणनीति कि जिस दिन भारत में यह ताजातरीन घोषणा होती है, ठीक उसी दिन अमेरिका ने चीन की एक कंपनी से सोलर पैनल के आयात पर रोक लगाने की भी घोषणा की है, जिससे चीन के कारोबारी हल्के में तहलका मच गया है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि इन दोनों महत्वपूर्ण घोषणाओं से आपको भले ही यह महसूस हो कि इन दोनों घटनाओं में सीधे तौर पर कोई साम्य या संबंध नहीं है। लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट पता चलता ही है कि भारत और अमेरिका सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में चीनी वर्चस्व को मिलकर चुनौती देने की ठान चुके हैं। जिससे निकट भविष्य में उसकी बौखलाहट और बढ़ने वाली है। रिलायंस इंडस्ट्रीज की सोलर एनर्जी से जुड़ी तकनीकी जानकारी रखने वाले भरोसेमंद लोगों के मुताबिक, निकट भविष्य में गुजरात के जामनगर में बनने वाले धीरुभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा कंप्लैक्स, चीन के सबसे बड़े सोलर उपकरण प्लांट के बराबर या उससे भी बड़ा होगा। जहां सोलर एनर्जी क्षेत्र के सारे उपकरण तथा उनके कच्चे माल का भी निर्माण किया जाएगा। वहीं, सोलर सेल्स में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पॉलीसिलिकान का निर्माण भी होगा।

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बताया गया है कि पॉलीसिलिकान का निर्माण बेहद उच्चस्तरीय तकनीक से होता है, जिससे जुड़े प्लांट की स्थापना के लिए भारत की दिग्गज कम्पनी रिलायंस दुनिया की कुछ दिग्गज कंपनियों से बात कर ही है। जानकारों की मानें तो कच्चा माल समस्या नहीं है, बल्कि पॉलीसिलिकान के निर्माण करने वाली बेहद उच्चस्तरीय व अत्याधुनिक तकनीक वाली फैक्ट्री की स्थापना एक बड़ी चुनौती है, जिससे मुकाबला करने और उससे पार पाने में रिलायंस ही सक्षम बताई जाती है। क्योंकि सोलर इनर्जी के ढांचे में जिस खास किस्म के प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, उसका उत्पादन भी रिलायंस के ही कच्चे माल से संभव हो सकेगा। 

जानकारों के मुताबिक, ग्रीन एनर्जी से जुड़े कई तरह के कच्चे माल रिलायंस इंडस्ट्रीज की मौजूदा फैक्ट्री से ही मिलेंगे। वहां एक ही कंप्लेक्स में कच्चे माल से लेकर तैयार माल तक बनने से पूरी लागत को चीन से स्पर्धा करने में मदद मिलेगी। बता दें कि ऊर्जा के सर्वाधिक सस्ते व टिकाऊ विकल्पों में से एक होने के चलते भारत सरकार वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा से 2.80 लाख मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य ले कर चल रही है। जिसके तहत भारत सरकार ने पिछले वर्ष तक सौर ऊर्जा में इस्तेमाल होने वाले सोलर सेल्स, सोलर पैनल और सोलर मॉडयूल्स का 80 फीसद चीन से आयात किया है। 

हालांकि, गत शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में क्रिसिल ने साफ कहा है कि भारत में सोलर मॉड्यूल्स की कीमत बढ़ने से प्लांट और उससे उत्पादित बिजली की लागत बढ़ रही है, जिससे सरकार के अरमानों पर पानी फिर सकता है। क्योंकि भारत में बनने वाले सोलर उपकरण चीन के मुकाबले अभी भी 40 फीसद तक महंगे हैं। ऐसा इसलिए कि सोलर सेल बनाने में इस्तेमाल होने वाले पोलीसिलिकॉन मटेरियल के 64 फीसद वैश्विक बाजार पर अभी भी चीन का कब्जा है, जिसे अपने दूरगामी हितों की पूर्ति के लिए कम करना भारत सरकार की प्राथमिकता है। लगता है कि भारत सरकार की मित्र कम्पनी समझी जाने वाली रिलायंस इंडिया लिमिटेड ने इसी नजरिए से अपनी व्यापक योजना की ताजा घोषणा की है, जो उसके लिए असंभव कार्य नहीं है। इस योजना के सफल होने से कम्पनी, भारत सरकार और भारतीय अवाम तीनों को फायदा होगा।

रिलायंस के योजना एवं कार्यान्वयन विभाग के अधिकारियों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, सौर ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा यह पूरा प्रोजेक्ट एंड टू एंड एप्रोच पर आधारित होगा। कहने का तातपर्य यह कि सोलर एनर्जी सेक्टर में कच्चे माल से तैयार माल तक बनाने का एक स्पष्ट खाका खींचा गया है, जिसके तहत सौर ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उत्पादों को भारत में ही तैयार किया जाएगा और इस क्षेत्र में चीन पर निर्भरता को पूरी तरह से कम किया जाएगा। क्योंकि वह हमारा प्रतिद्वंद्वी और शत्रु राष्ट्र है। इसलिए आरआइएल चेयरमैन मुकेश अम्बानी की ताजा घोषणा सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को खत्म करने की दिशा में सबसे अहम और कारगर कदम साबित हो सकता है, क्योंकि इसकी जरूरत पिछले कई वर्षों से महसूस की जा रही है।

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गौरतलब है कि वर्तमान में सोलर ऊर्जा निर्माण के लिए जरूरी उपकरण चीन अभी भारत के मुकाबले 30 से 40 फीसद सस्ती देता है जिससे वैश्विक बाजार में उसकी धाक है। लेकिन रिलायंस की सौर ऊर्जा उपकरण उत्पादन की ताजा योजना यदि अमलीजामा पहन लेती है तो इससे स्पष्ट है कि अगले तीन वर्षों में चीन से भी सस्ते व टिकाऊ उपकरण भारत में तैयार होने लगेंगे। ऐसा होने से वैश्विक बाजार को एक अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प मिलेगा, जिससे भारत की पूछ भी बढ़ेगी और चीन पर उसकी निर्भरता भी समाप्त हो जाएगी। यह एशिया महादेश के लिए शुभ घड़ी होगी।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार