US से Trade Deal की बड़ी कीमत! भारत ने खत्म किया 'Google Tax', संप्रभुता पर छिड़ी बहस

India US trade deal
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Ankit Jaiswal । Feb 11 2026 10:37PM

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में डिजिटल टैक्स पर सहमति के बावजूद विवाद गहरा गया है, क्योंकि अमेरिका भारत से भविष्य में ऐसा टैक्स दोबारा न लगाने की एकतरफा कानूनी प्रतिबद्धता चाहता है। कानूनी विशेषज्ञों ने इस शर्त को भारत की कर संप्रभुता के लिए एकतरफा और हानिकारक बताते हुए इस पर आपत्ति जताई है।

भारत–अमेरिका के हालिया ट्रेड डील की बारीकियां धीरे-धीरे सामने आती दिख रही हैं। व्हाइट हाउस की ओर से मंगलवार को जारी फैक्टशीट में कहा गया है कि भारत ने डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने और डिजिटल व्यापार से जुड़े द्विपक्षीय नियमों पर बातचीत के लिए सहमति जताई है।

बता दें कि यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत ने इस अंतरिम व्यापार समझौते के तहत अगले पांच वर्षों में करीब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने और रूसी तेल के आयात को रोकने पर सहमति दी है। इसी संदर्भ में व्हाइट हाउस ने कहा कि भारत डिजिटल व्यापार में मौजूद बाधाओं को दूर करने के लिए अमेरिका के साथ मजबूत नियमों पर बातचीत करेगा।

गौरतलब है कि डिजिटल सर्विस टैक्स, जिसे आमतौर पर ‘गूगल टैक्स’ कहा जाता है, भारत पहले ही औपचारिक व्यापार वार्ता शुरू होने से पहले हटा चुका था। इसके बावजूद, मौजूद जानकारी के अनुसार अमेरिका चाहता था कि भारत भविष्य में इस तरह के टैक्स को दोबारा लागू न करने की एकतरफा कानूनी प्रतिबद्धता दे।

इससे पहले 8 जुलाई को एक रिपोर्ट में सामने आया था कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को सलाह देने वाले कानूनी विशेषज्ञों ने अमेरिकी प्रस्ताव को लेकर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इस तरह की शर्तें एकतरफा हैं, क्योंकि इनमें दोनों देशों पर समान रूप से डिजिटल टैक्स न लगाने की बात नहीं है, बल्कि केवल भारत से ही यह अपेक्षा की जा रही है।

सरकार ने वित्त विधेयक 2025 में 6 प्रतिशत इक्वलाइजेशन लेवी को हटाने का प्रस्ताव रखा था, जो 1 अप्रैल 2025 से प्रभावी हो गया। इससे पहले ई-कॉमर्स सेवाओं पर लगने वाली 2 प्रतिशत लेवी भी 2024 के वित्त अधिनियम के जरिए खत्म की जा चुकी थी। यह टैक्स मूल रूप से 2016 में गैर-निवासी डिजिटल कंपनियों और घरेलू कंपनियों के बीच कर संतुलन के उद्देश्य से लाया गया था।

जानकारों का मानना है कि डिजिटल टैक्स जैसे मुद्दे आमतौर पर व्यापार समझौतों के बाहर रखे जाते हैं, क्योंकि यह किसी भी देश का संप्रभु अधिकार होता है। भारत के लिए चिंता की बात यह भी है कि अमेरिका भारतीय बाजार में डिजिटल सेवाओं का बड़ा प्रदाता है, लेकिन भारत भी आईटी और डिजिटल सेवाओं के जरिए अमेरिका को भारी मात्रा में निर्यात करता है।

यह भी आशंका जताई गई है कि अगर भारत ऐसी एकतरफा शर्तें स्वीकार करता है, तो भविष्य में अन्य व्यापारिक साझेदार भी इसी तरह की मांगें रख सकते हैं, जिससे आगे की बातचीत जटिल हो सकती हैं।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका इससे पहले इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ डिजिटल ट्रेड को लेकर कड़े प्रावधानों पर सहमति करवा चुका है। वहीं, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने इक्वलाइजेशन लेवी को अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कदम बताया था और यूरोपीय संघ के डिजिटल कानूनों पर भी इसी तरह की आपत्तियां दर्ज की हैं।

कुल मिलाकर, डिजिटल टैक्स पर भारत–अमेरिका समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और नीतिगत स्तर पर भी दूरगामी असर डाल सकता है, जिस पर आने वाले दिनों में और स्पष्टता सामने आने की उम्मीद है।

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