70 साल बाद भारत ने पलटी बाजी, NATO देश में भारत के AI विमान की एंट्री

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अभिनय आकाश । May 15 2026 12:41PM

मारक दूरी लगभग 3000 कि.मी. बताई जा रही है। जैसा कि दावा है और यह 30 घंटे से ज्यादा समय तक लगातार उड़ान भरने में सक्षम है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी एआई क्षमताएं हैं। यह विमान दुश्मन के ठिकानों की पहचान कर सकता है। खुद कर सकता है। यह स्वाम कोऑर्डिनेशन भी कर सकता है। यानी कई ड्रोन मिलकर एक साथ हमला कर सकते हैं। इसके अलावा इसमें इंक्रिप्टेड कम्युनिकेशन सिस्टम भी है जो युद्ध के दौरान सुरक्षित संचार भी सुनिश्चित करता है।

पूरे 70 साल तक भारत दुनिया से लड़ाकू विमान खरीदता रहा। कभी रूस से मिग और सुखोई आए। कभी फ्रांस से मिराज और राफेल तो कभी अमेरिका से अपाचे और चिनोक हेलीकॉप्टर। भारत हमेशा दुनिया के बड़े देशों से रक्षा तकनीक लेता रहा। लेकिन अब पहली बार तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है क्योंकि अब भारत सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं बल्कि अगली पीढ़ी के युद्ध तकनीक बनाने वाला देश बनना चाहता है और इसी बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर अब दुनिया के सामने आ गई है। पहली बार इतिहास में एक भारतीय कंपनी का बनाया गया स्वायत युद्धक विमान यूरोप की धरती पर तैयार होने वाला है। सबसे बड़ी बात यह निर्माण किसी साधारण देश में नहीं बल्कि नाटो कंट्री का हिस्सा माने जाने वाले पुर्तगाल में होगा। यानी जिस यूरोप से कभी भारत तकनीक खरीदता था आज वही यूरोप भारतीय एआई युद्ध तकनीक को अपने रक्षा नेटवर्क में शामिल करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुका है। इस पूरी कहानी के केंद्र में है काल भैरव। 

भारत का एआई आधारित स्वायत युद्धक विमान। इसे बनाया है बेंगलुरु की रक्षा तकनीक कंपनी फ्लाइंग वेस्ट डिफेंस एंड एयररोस्पेस यानी कि एफ डब्ल्यूडीए। एफ डब्ल्यूडीए ने ऐलान किया कि वह पुर्तगाल में अपने एआई युद्धक विमान काल भैरव का अंतरराष्ट्रीय निर्माण केंद्र स्थापित करेगी। इस परियोजना में एफडब्ल्यूडीए के साथ पुर्तगाल की तकनीकी कंपनी स्केच पिक्सल एलडीए भी शामिल होगी। यह वही कंपनी है जो F16 जैसे लड़ाकू विमानों के लिए अत्याधुनिक सिमुलेशन सिस्टम बनाने के लिए जानी जाती है। यानी अब भारतीय युद्धक विमान को यूरोपी सैन्य सिमुलेशन और नाटो तकनीक का सहयोग भी मिलेगा। लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह है दोस्तों कि आखिर काल भैरव इतना खास क्यों है? देखिए काल भैरव कोई साधारण ड्रोन नहीं है। यह एक मेल श्रेणी यानी कि मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंडोरेंस स्वायत युद्धक विमान है। इसकी मारक दूरी लगभग 3000 कि.मी. बताई जा रही है। जैसा कि दावा है और यह 30 घंटे से ज्यादा समय तक लगातार उड़ान भरने में सक्षम है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी एआई क्षमताएं हैं। यह विमान दुश्मन के ठिकानों की पहचान कर सकता है। खुद कर सकता है। यह स्वाम कोऑर्डिनेशन भी कर सकता है। यानी कई ड्रोन मिलकर एक साथ हमला कर सकते हैं। इसके अलावा इसमें इंक्रिप्टेड कम्युनिकेशन सिस्टम भी है जो युद्ध के दौरान सुरक्षित संचार भी सुनिश्चित करता है। 

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भविष्य का युद्ध अब सिर्फ लड़ाकू विमानों और मिसाइलों की लड़ाई नहीं रहने वाला है। अब युद्ध का भविष्य है एआई ऑटोनॉमस सिस्टम और स्मार्ट ड्रोंस। और यही वजह है कि काल भैरव उसी भविष्य की सोच पर आधारित है। एफ डब्ल्यूडीए का दावा है कि इस विमान में ज़ीरो फॉरेन डिपेंडेंसी है। मतलब कि इसमें कोई विदेशी किल स्विच रिस्क नहीं होने वाला है। कोई दूसरा देश इसे रिमोटली बंद नहीं कर सकता है। और आज देखा जाए आज की जिओपॉलिटिक्स में यह बेहद बड़ा मुद्दा है क्योंकि दुनिया ने देखा कि आधुनिक युद्धों में ड्रोन कितने निर्णायक साबित होते हैं। रूस यूक्रेन युद्ध देख लीजिए या मध्य पूर्व के संघर्ष देख लीजिए। हर जगह ड्रोन्स ने युद्ध का तरीका बदल दिया है। कम लागत, तेज तैनाती और सटीक हमला यही भविष्य के युद्ध की पहचान बन चुकी है। और अब भारत भी उस दौर में शामिल हो चुका है। काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन कहानी सिर्फ काल भैरव तक सीमित नहीं है। इस परियोजना के पीछे एक बड़ा विज़न छिपा है। 

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ऑपरेशन 777। यह एफडब्ल्यूडीए का लॉन्ग टर्म ग्लोबल मिशन है। इसका लक्ष्य है कि दुनिया के सात महाद्वीपों और 77 देशों में भारतीय ऑटोनॉमस वॉारफेयर सिस्टम के केंद्रों या फिर यह कह सकते हैं मैन्युफैक्चरिंग करना। ऑफ डिप्लोमेट नेटवर्क तैयार करना। यानी भारत अब सिर्फ अपने लिए रक्षा प्रणाली नहीं बनाना चाहता है बल्कि ग्लोबल डिफेंस सप्लाई चेन का सबसे बड़ा हिस्सा बनना चाहता है। अब एफ डब्ल्यूडीए के संस्थापक हैं सुभाष जिनका कहना है कि ऑपरेशन 777 का टारगेट उद्देश्य भारतीय रक्षा तकनीक को दुनिया भर में पहुंचाना है। पुर्तगाल को चुनने के पीछे भी बड़ी रणनीति है। पुर्तगाल नाटो का हिस्सा है और यह यूरोप के स्ट्रेटेजिक डिफेंस कॉरिडोर में अहमियत रखता है। अहम भूमिका रखता है। अगर काल भैरव वहां सफल हो गया तो भविष्य में दूसरे नाटो देश के लिए भी रास्ते खुल जाएंगे।

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