ईरान के नए सुप्रीम लीडर ने गद्दी संभालते ही भारत से मांगी मदद, मिडिल ईस्ट की राजनीति में आएगा भूचाल?

अमेरिका का कहना है कि वो जहाज पूरी तरह से सीआरसी यानी कि कॉम्बैट ट्रेड कॉन्फ़िगरेशन मूड में था। यानी वो युद्ध के लिए तैयार था और इसलिए उसे निशाना बनाना एक वैध सैनिक कारवाई थी। लेकिन दूसरी तरफ ईरान का दावा बिल्कुल अलग है।
मिडिल ईस्ट की जंग अब सिर्फ ईरान, इजराइल और अमेरिका तक सीमित नहीं रही है। अब इस युद्ध का असर सीधे भारत तक पहुंच चुका है और इसकी वजह है ईरान का नया सुप्रीम लीडर और एक ऐसा रहस्य जिसे शायद दुनिया में सिर्फ भारत ही जानता है। जहां ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता यानी सुप्रीम लीडर अली खामनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामनेई को देश का नया सुप्रीम लीडर चुना गया। जैसे ही यह फैसला सामने आया मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया। लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल में अगर कोई देश आया तो वो है भारत। क्योंकि नए सुप्रीम लीडर के आते ही एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया जिसमें भारत का नाम सीधे बीच में आ गया है। दरअसल कुछ दिनों पहले ईरान और अमेरिका के बीच समुद्र में एक बड़ा सैन टकराव हुआ। इस घटना में अमेरिका ने दावा किया कि उसने ईरान के एक युद्धपोत को डूबा दिया। अमेरिका का कहना है कि वो जहाज पूरी तरह से सीआरसी यानी कि कॉम्बैट ट्रेड कॉन्फ़िगरेशन मूड में था। यानी वो युद्ध के लिए तैयार था और इसलिए उसे निशाना बनाना एक वैध सैनिक कारवाई थी। लेकिन दूसरी तरफ ईरान का दावा बिल्कुल अलग है।
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ईरान का कहना है कि उसका युद्धपोत पूरी तरह निहत्ता था और उसमें कोई मिसाइल या हथियार मौजूद नहीं था। ईरान के अनुसार अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों का उल्लंघन करते हुए उस जहाज को डुबो दिया। अब यहीं से विवाद पूरी दुनिया में एक बड़ा मुद्दा बन गया। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब यह पता चल गया कि उस युद्धपोध की असली स्थिति शायद सिर्फ एक देश जानता था और वो है भारत। क्योंकि जिस युद्धपोध को अमेरिका ने डुबाया वो कुछ समय पहले भारतीय नौसेना के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अभ्यास मिलन नेवल एक्सरसाइज में शामिल हुआ था। इस सैन्य अभ्यास में कई देशों की नौसेनाएं शामिल होती हैं और यहां युद्धपोतों की तकनीकी स्थिति और क्षमताओं का मूल्यांकन भी होता है। यानी भारत को यह जानकारी हो सकती थी कि उस समय ईरान का युद्धपोत किस स्थिति में था। क्या वह वास्तव में हथियारों से लैस था या फिर नहीं और यही वजह है कि अब ईरान भारत से उम्मीद कर रहा है कि वह इस मामले में सच्चाई सामने लाए। ईरान चाहता है कि भारत खुले तौर पर यह बताए कि उसका युद्धपोध निहत्ता था और अमेरिका ने गलत तरीके से हमला किया। लेकिन भारत के लिए फैसला आसान नहीं है क्योंकि एक तरफ भारत के रणनीतिक रिश्ते अमेरिका के साथ मजबूत हैं तो दूसरी तरफ ईरान भी भारत का एक महत्वपूर्ण और पुराना दोस्त है।
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ईरान के साथ भारत की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं जुड़ी हुई हैं। इनमें सबसे अहम है चाबार पो। यह वही बंदरगाह है जिसे भारत ने विकसित किया ताकि वह पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच बना सके। अगर ईरान भारत से नाराज होता है तो इस परियोजना पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा भारत और ईरान के बीच एक बड़ा ट्रांजिट कॉरिडोर भी विकसित किया जा रहा है जिसे आईएएसटीसी कॉरिडोर यानी कि इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर कहा जाता है। यह कॉरिडोर भारत को सीधे रूस और यूरोप के बाजारों से जोड़ने की क्षमता रखता है। लेकिन अगर भारत इस विवाद में किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होता है तो दूसरे पक्ष के साथ उसके रिश्तों में तनाव आ सकता है। यानी भारत के सामने एक बहुत बड़ा कूटनीतिक संकट खड़ा हो गया है। अब सवाल यह है कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुस्तफा खामने की सोच क्या है? दरअसल एक्सपर्टों का मानना है कि वह अपने पिता की तुलना में ज्यादा सख्त और कट्टर रुख अपनाने के लिए जाने जाते हैं। अब ऐसा हुआ तो संभव है कि ईरान अपने सहयोगी देशों से ज्यादा समर्थन की उम्मीद करेगा और यही स्थिति भारत के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है क्योंकि भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलन बनाए रखने की रही है। भारत अमेरिका, रूस, इजराइल और ईरान सभी के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखने की कोशिश करता है। लेकिन इस बार मामला अलग है क्योंकि यहां एक ऐसा रहस्य है जिसका जवाब शायद सिर्फ भारत के पास है। क्या वह युद्ध सच में हथियारों से लैस था?
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