फटे हुए बयान और संस्कारों का मौसम (व्यंग्य)

फटे हुए बयान और संस्कारों का मौसम  (व्यंग्य)

नंगई अश्ललीलता की सीमाएं तोड़कर झांकती दिखती है। अब तो नंगे होकर अपनी बात मनवाने का ज़माना है लेकिन साथ साथ यह भी कहते रहना कि ध्यान से देखें मैंने खुद को कितने अच्छे से कवर कर रखा है । फटे हुए काफी बयान अनेक संस्कारों के मुंह सिलने का काम भी तो करते हैं।

यह आज की बात नहीं है, इतिहास गवाह है कि महाजन फटा हुआ बयान भी बांटना शुरू कर दें तो अड़ोस पड़ोस में काफी फर्क पड़ने लगता है। कितनी ही ऐसी चीज़ों की बिक्री और बाज़ार भाव बढ़ जाते हैं जो बरसों से अबिकाऊ रही । फटेहाली भी हाथों हाथ खूब बिकनी शुरू हो जाती है। प्रतिस्पर्धा बढाने के लिए कितने ही दूसरे बयान बाज़ार में आकर कहने लगते हैं, ‘इस तरह का ब्यान उस तरह की ज़बान से शोभा नहीं देता’, लेकिन जब बाज़ार शिक्षक हो सकता है तो शिक्षक बाज़ार का हिस्सा क्यूं नहीं हो सकता। वैसे भी हमारे यहां तो सिर्फ ब्यान ही ज़बान को विशेषज्ञ बना देता है। कुछ ब्यान शौकिया तौर पर टशन के लिए भी तो दिए जा सकते हैं। अब ज़बान है तो हिलना ज़रूरी है और दूसरी ज़बानों को हिलने की प्रेरणा देना भी । ज़बान में उगे संस्कारों की बात कर ली जाए तो संस्कार तो कपड़ों में भी प्रवेश कर जाते हैं और वहां कुछ दिन टिक भी सकते हैं । अच्छे सुगन्धित कपड़ों से, उनकी सौम्य धुलाई में प्रयोग किए जाने वाले वाशिंग पाउडर का नाम जान लिया जाए तो बंदा राजनीति में भी सफल हो सकता है। ऐसे प्रभावशाली वस्त्र पहनने वाले को अविलम्ब संस्कारी मान लेना चाहिए क्यूंकि वो संस्कारी हो सकता है। अलबत्ता यह ज़रूरी नहीं कि सस्ते, फटे, बिना प्रेस किए कपड़े पहनने वाला संस्कारी भी हो । 

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यहां यह सवाल सर उठाता है कि क्या संस्कार का एक ही प्रकार व रंग रूप होता है। अपने कर्तव्य का कर्मठता से पालन करने वालों द्वारा, दुर्भावना का प्रचार करने मात्र से, संस्कारों का कार्यान्वन बदल दिया जाता है । वर्तमान बार बार इतिहास में बदलाव खोजने जाता है। फटे, कटे, घिसे कपडे तो पारम्परिक मजबूरियों का फैशनेबल पुनर्जन्म है जो ‘थ्री आर’ सिद्धांत के महंगे प्रयोग की सिफारिश भी करता है । नए दृष्टिकोण से सोचें तो इसे,  पुराने फटे हुए संस्कारों को नया कलेवर देना भी तो माना जा सकता है। गर्व महसूस करने के लिए ज़रूरी तो नहीं कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक या आर्थिक उपलब्धि हासिल की जाए। सार्वजनिक स्तर पर शारीरिक व मानसिक रूप से नंगे होते हुए, लेकिन महंगे, डिज़ाइनर, खुशबूदार कपडे और जूते पहनकर सब से यह कहलवाने की रिवायत जारी है कि वाह! क्या अंदाज़ है । आज जो संस्कार बाज़ार में उपलब्ध हैं वे फटी हुई जीन्स से बेहतर नहीं दिखते, उनमें से शरीर ही नहीं आदमीयत की सड़ी गली लाशें भी दिखती हैं । नंगई अश्ललीलता की सीमाएं तोड़कर झांकती दिखती है। अब तो नंगे होकर अपनी बात मनवाने का ज़माना है लेकिन साथ साथ यह भी कहते रहना कि ध्यान से देखें मैंने खुद को कितने अच्छे से कवर कर रखा है । फटे हुए काफी बयान अनेक संस्कारों के मुंह सिलने का काम भी तो करते हैं।

- संतोष उत्सुक