अचार डालने और खाने का समय (व्यंग्य)

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Prabhasakshi
संतोष उत्सुक । Mar 18 2024 6:00PM

पुरानी सरकार दोबारा चुनी जाए तो पुराने विज्ञापन पुनः प्रयोग कर राष्ट्रीय दौलत भी बचाई जा सकती है। नई सरकार आई तो अपने विज्ञापन करना उसका अधिकार होगा। इस मौसम में अनाधिकृत निर्माण करने वाले व्यस्त रहते हैं क्यूंकि नगरपालिका आचार संहिता के अनुसार चुनाव का अचार डलवाने में व्यस्त हो जाती है।

आचार संहिता सख्ती से लागू कर दी गई है लेकिन यह अंदेशा भी साथ ही लागू हो गया है कि सरकारी सड़क की तरह यहां वहां से टूट फूट सकती है। संहिता का मौसम कांच का होता है जिसे तोड़ने के लिए लोकतान्त्रिक बेकरारी का नटखट ‘कन्हैया’, इसकी घोषणा के साथ ही अवतरित हो जाता है। विकास के दुर्योधन निढाल हो जाते हैं, घोषणाओं की योजनाओं और योजनाओं की घोषणाओं का महाभारत रुक जाता है। 

विपक्ष को चाहे पूरा विश्वास हो कि सरकार जैसा स्वादिष्ट अचार डालना उसके बस में नहीं लेकिन दावा ज़रूर करता है। चुनाव करवाने वालों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि अनुशासन सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैसे, कोशिशों की मिर्चों के अचार का मटका फोड़ राजनीति का चटखारा बढाने के लिए निजी और संस्थानिक आर्मी तैयार है। जीभ कहती है कि खाने का मज़ा, मनचाहे अचार के साथ ही है। बहुत दुखदायी है, हाय! कितने मन और धन से बनवाए विज्ञापन बोर्ड उतरवाने पड़ते हैं। वैसे महंगे विज्ञापन बोर्ड उतरवाने  की ज़रूरत नहीं है, संहिता अवधि के दौरान इन पर वैधानिक चेतावनी चिपका देनी चाहिए, ‘नई सरकार के गठन तक इस विज्ञापन को पढ़ना हानिकारक है कृपया इस बोर्ड की तरफ न देखें।’ 

पुरानी सरकार दोबारा चुनी जाए तो पुराने विज्ञापन पुनः प्रयोग कर राष्ट्रीय दौलत भी बचाई जा सकती है। नई सरकार आई तो अपने विज्ञापन करना उसका अधिकार होगा। इस मौसम में अनाधिकृत निर्माण करने वाले व्यस्त रहते हैं क्यूंकि नगरपालिका आचार संहिता के अनुसार चुनाव का अचार डलवाने में व्यस्त हो जाती है। उनके पास किसी को भी हमेशा की तरह ‘सख्त’ नोटिस भेजने का समय नहीं रहता। इस दौरान धारा एक सौ चवालिस लगा दी जाती है, न भी लगाएं तो क्या लोकतान्त्रिक अनुशासन तो हमारे रोम रोम में रचा बसा हुआ है।

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इस अंतराल में वोटरों को मुस्कुराहटों में तली वायदों की मसालेदार स्वादिष्ट चाट खाने को मिलती है जिससे उनका स्वास्थ्य भी संतुष्ट रहता है। चुनाव तो संहिता के अनुसार ही होता है, लेकिन अचार डालने के सभी के अपने अपने फार्मूले होते हैं लेकिन स्वादिष्ट अचार वही डाल सकता है जिसके हाथ में संतुलन, अनुभव और प्रतिबद्धता रहती है। संहिता लगते ही पेड ‘खबरें’ ही नहीं, पेड चैनल भी ‘रुक’ जाते हैं। शायद सोशल मीडिया पर भी फर्क पड़ जाता होगा। इस दौरान देशभक्त भी बढ़ जाते होंगे। देशप्रेमी राजनेता इस अंतराल का ग़लत फायदा नहीं उठाते वैसे यह बात हमेशा लागू रहती है कि व्यवसाय में लाभ कमाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का अचार प्रयोग करना ही पड़ता है। अचार स्वाद से भरपूर रहे और बाज़ार पर किसी तरह कब्जा कर ले इसके लिए ‘सब कुछ’ तो करना ही पड़ता है। 

समय पर उपयोग न हो तो स्वादिष्ट आम भी सड़ जाता है। बुद्धिजन फरमाते हैं, अचार खाना शुरू करने के बाद तारीफ ज़रूर करनी चाहिए। अचार बनाने और खिलाने वालों की तारीफ़ नहीं करेंगे तो गला खराब हो सकता है।

- संतोष उत्सुक

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