Indo Pacific Command नाम से ट्रंप को क्या दिक्कत थी? क्या अब बदल गयी है अमेरिका की Asia Policy?

US Pacific Command
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अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि केवल नाम बदला है, मिशन नहीं। उसका दावा है कि कमान का कार्यक्षेत्र अब भी भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला रहेगा और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ 'मुक्त और खुला क्षेत्र' बनाए रखने की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आएगी।

अमेरिका ने एक बार फिर अपने सबसे महत्वपूर्ण सामरिक सैन्य कमान का नाम बदल दिया है। आठ वर्ष पहले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। तब यह कदम चीन के उभार के खिलाफ भारत को अमेरिकी रणनीति के केंद्र में लाने की घोषणा के रूप में देखा गया था। अब उसी कमान से "इंडो" शब्द हटाकर उसे फिर से पैसिफिक कमांड बना देना वैश्विक कूटनीति में नए संकेत पैदा कर रहा है। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार, रूस, पाकिस्तान और पश्चिम एशिया को लेकर तनाव दिखाई दे रहा है।

अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि केवल नाम बदला है, मिशन नहीं। उसका दावा है कि कमान का कार्यक्षेत्र अब भी भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला रहेगा और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ "मुक्त और खुला क्षेत्र" बनाए रखने की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आएगी। लेकिन सामरिक दुनिया में नाम केवल नाम नहीं होते। वे प्राथमिकताओं, शक्ति संतुलन और भविष्य की दिशा के संकेत भी देते हैं। यही कारण है कि इस बदलाव ने नई बहस छेड़ दी है।

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दरअसल, वर्ष 2018 में जब तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने "इंडो-पैसिफिक" अवधारणा को आगे बढ़ाया था, तब उसका सीधा संदेश यह था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक साझा रणनीतिक क्षेत्र हैं। चीन की बढ़ती समुद्री ताकत, दक्षिण चीन सागर में उसका आक्रामक रवैया, बेल्ट एंड रोड परियोजना के जरिये एशिया-अफ्रीका तक उसका विस्तार और हिंद महासागर में उसकी बढ़ती मौजूदगी ने अमेरिका को नई सामरिक रचना बनाने पर मजबूर किया था। इसी सोच से क्वॉड समूह को भी नई ऊर्जा मिली, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।

अब जब "इंडो" शब्द हटाया गया है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपनी प्राथमिकताएं बदल रहा है? क्या ट्रंप प्रशासन चीन के साथ सीधे टकराव के बजाय समझौते का रास्ता तलाश रहा है? क्या अमेरिका अब एशिया में अपने दायित्व कम करना चाहता है? क्या भारत अब अमेरिकी रणनीति का केंद्रीय स्तंभ नहीं रहा? यही वह प्रश्न हैं जिन पर दुनिया भर के सामरिक विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं।

 

इस पूरे घटनाक्रम का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप की मुलाकात से ठीक पहले सामने आया। कभी दोनों नेताओं की दोस्ती विशाल जनसभाओं और गर्मजोशी भरे आलिंगन की प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन इस बार माहौल अलग था। व्यापारिक शुल्कों को लेकर विवाद, रूस से भारत की ऊर्जा खरीद पर अमेरिकी नाराजगी, भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा संबंधी दिक्कतें, पाकिस्तान के साथ अमेरिका की नई नजदीकियां और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों से भारतीय नाविकों की मौत जैसे मुद्दों ने भारत और अमेरिका के रिश्तों में खटास पैदा की है।

विशेष रूप से पाकिस्तान को अमेरिकी समर्थन को लेकर भारत की चिंता बढ़ी है। साथ ही ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप ने कई बार दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया। भारत ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि युद्धविराम दोनों सेनाओं के बीच सीधे संवाद से हुआ था, किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से नहीं। इसके बावजूद अमेरिका का यह रुख नई दिल्ली के लिए असहजता का कारण बना हुआ है।

हालांकि अमेरिकी प्रशासन के समर्थक यह तर्क दे रहे हैं कि इंडो पैसिफिक कमांड संबंधी बदलाव को जरूरत से ज्यादा नहीं देखना चाहिए। उनका कहना है कि अमेरिका अभी भी चीन के खिलाफ अपनी सैन्य तैयारी बढ़ा रहा है। अमेरिकी कमांडर सैमुअल पपारो ने चीन के विरुद्ध सैन्य प्रतिरोध मजबूत करने के लिए विशाल रक्षा बजट की मांग की है। अमेरिका और भारत के बीच रक्षा तकनीक, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास भी लगातार जारी हैं। इसलिए केवल नाम बदलने से रणनीति बदल गई है, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

फिर भी यह तर्क पूरी तरह आश्वस्त नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों की अपनी शक्ति होती है। जब अमेरिका ने "इंडो" शब्द जोड़ा था, तब उसने दुनिया को यह संदेश दिया था कि भारत अब एशियाई शक्ति संतुलन का अनिवार्य हिस्सा है। अब उसी शब्द को हटाना स्वाभाविक रूप से यह आभास देता है कि अमेरिका की सोच में बदलाव आया है। यही कारण है कि कई भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ इसे भारत के लिए चेतावनी के रूप में देख रहे हैं।

हालांकि इस पूरे विवाद के बीच एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि दुनिया की कोई भी महाशक्ति केवल नाम बदलकर भूगोल और वास्तविकता को नहीं बदल सकती। कागजों पर सीमाएं और नाम बदले जा सकते हैं, लेकिन समुद्रों, सभ्यताओं और इतिहास की वास्तविक शक्ति को मिटाना संभव नहीं होता। अमेरिका चाहे इंडो शब्द हटा दे या कोई और देश किसी क्षेत्र को नए नाम से पुकारने लगे, इससे भारत की सामरिक स्थिति कमजोर नहीं हो जाती। हिंद महासागर आज भी भारत की प्राकृतिक सामरिक परिधि है और एशिया की शक्ति संरचना में भारत की भूमिका स्थायी वास्तविकता है। सच यही है कि भारत और हिंद का जो दायरा हजारों वर्षों की सभ्यता, व्यापार, समुद्री संपर्क और भू-राजनीतिक प्रभाव से बना है, उसे समेटना किसी भी शक्ति के लिए संभव नहीं है। नाम बदले जा सकते हैं, लेकिन भारत की केंद्रीय उपस्थिति को समाप्त नहीं किया जा सकता।

फिर भी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या "इंडो" शब्द हटने से भारत के हितों पर वास्तविक असर पड़ेगा? इसका उत्तर सीधा भी है और जटिल भी। तात्कालिक रूप से देखें तो भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग, सामरिक साझेदारी और आर्थिक संबंधों पर इसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखता। भारत अब भी हिंद महासागर की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है और चीन को संतुलित करने में उसकी भूमिका अपरिहार्य बनी हुई है। अमेरिका भी यह समझता है कि भारत के बिना एशिया में चीन को चुनौती देना संभव नहीं। इसलिए केवल नाम बदल जाने से भारत की सामरिक उपयोगिता समाप्त नहीं हो जाती।

लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से देखें तो यह बदलाव मानसिक और कूटनीतिक संकेत अवश्य देता है। यदि अमेरिका धीरे-धीरे "इंडो-पैसिफिक" अवधारणा से दूरी बनाता है, क्वॉड की सक्रियता घटती है और चीन के साथ समझौते की नीति अपनाई जाती है, तो भारत को अपनी रणनीति नए सिरे से गढ़नी होगी। इसका अर्थ यह होगा कि नई दिल्ली को आत्मनिर्भर सामरिक ढांचे, बहुध्रुवीय कूटनीति और क्षेत्रीय साझेदारियों पर अधिक जोर देना पड़ेगा।

असल में यह पूरा घटनाक्रम भारत के लिए एक बड़ा संदेश है। विश्व राजनीति में स्थायी मित्रता नहीं होती, केवल स्थायी हित होते हैं। अमेरिका अपने हितों के अनुसार रणनीति बदल सकता है। इसलिए भारत को भी भावनात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर कठोर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह बात सही है कि "इंडो" शब्द हटने से भारत की शक्ति कम नहीं होती, लेकिन यह अवश्य याद दिलाता है कि वैश्विक मंच पर सम्मान केवल प्रतीकों से नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक सामरिक और आर्थिक ताकत से मिलता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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