भारत के लिए अमेरिका ज्‍यादा उपयोगी है या रूस ज्‍यादा अहम, एक शीतयुद्ध से सहयोगी और दूसरा इंडो-पैसिफिक पार्टनर

भारत के लिए अमेरिका ज्‍यादा उपयोगी है या रूस ज्‍यादा अहम, एक शीतयुद्ध से सहयोगी और दूसरा इंडो-पैसिफिक पार्टनर

रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत के प्रधानमंत्री के साथ नई दिल्ली में होने वाले 21वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। पुतिन की भारत यात्रा पर चीन और अमेरिका की निगाहें टिकी है। दिलचस्प ये है कि अमेरिका के विरोध और प्रतिबंध वाली धमकी से परे भारत रूस के साथ एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीद रहा है।

वाशिंगटन और मास्को के बीच के बिगड़ते संबंध हमेशा से भारत के लिए परेशानी का सबब रहें हैं। रक्षा के क्षेत्र में रूस भारत का सबसे बड़ा साझेदार है और अमेरिका इंडो-पेशेफिक में सहयोगी है। भारत ने दोनों देशों के साथ अपने स्वतंत्र रिश्ते कायम रखे हैं। एक के पास सैन्य उपकरणों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है तो दूसरा सामरिक हितों को साधने के लिहाजे से महत्वपूर्ण है। भारत इस बात को लेकर काफी सावधान रहा है कि एक साझेदारी को बनाए रखने में दूसरे को नुकसान न पहुंचे। हालिया सालों में भारत के चीन के साथ खराब होते संबंध और अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत के दौरे पर आ रहे हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत के प्रधानमंत्री के साथ नई दिल्ली में होने वाले 21वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। पुतिन की भारत यात्रा पर चीन और अमेरिका की निगाहें टिकी है। दिलचस्प ये है कि अमेरिका के विरोध और प्रतिबंध वाली धमकी से परे भारत रूस के साथ एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीद रहा है। ऐसे में आज के इस विश्लेषण में समझते हैं कि भारत के लिए अमेरिका ज्यादा उपयोगी है या रूस ज्यादा अहम है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक दोनों देशों के साथ भारत के संबंध कैसे रहे हैं। भारत के लिए एक शीत युद्ध के समय से सहयोगी है और दूसरा इंडो-पैसिफिक पार्टनर तो ऐसे में दोनों को साधने के लिए भारत कौन सी रणनीति पर चल रहा है। 

भारत के लिए रूस की अहमियत

13 अप्रैल 1947 को रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) और भारत ने आधिकारिक तौर पर दिल्ली और मॉस्को में मिशन स्थापित करने का फैसला लिया था। दोनों देशों के बीच शुरू हुआ दोस्ती का यह सिलसिला आज 75वें साल में प्रवेश कर रहा है। अगर बात इतिहास की करे तो शीत युद्ध के दौर से ही सोवियत संघ के साथ भारत के संबंध मधुर रहे हैं। उस दौरान भारत और अमेरिका के बीच संबंधों की शुरुआत भी नहीं हुई थी। हालांकि शीत युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में काफी बदलाव आया। भारत की आजादी के  बाद से दोनों देशों के बीच के संबंध हैं। रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और औद्योगिक तकनीक जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रूस का बड़ा योगदान रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने 22 जून 1962 को अपने 100वें वीटो का इस्तेमाल कश्मीर मुद्दे पर भारत के समर्थन में किया था। दरअसल, सुरक्षा परिषद में आयरलैंड ने कश्मीर मसले को लेकर भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसका अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन (सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य) के अलावा आयरलैंड, चिली और वेनेजुएला ने समर्थन किया था। इससे पहले साल 1961 में भी रूस ने 99वें वीटो का इस्तेमाल भी भारत के लिए किया था. इस बार रूस का वीटो गोवा मसले पर भारत के पक्ष में था। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया, लेकिन भारत के परंपरागत दोस्त रूस का मिजाज नहीं बदला। हालांकि चीन के साथ उसकी नजदीकी कई बार भारत को असहज करती रही है। लेकिन चीन और रूस के बीच द्विपक्षीय संबंधों का इतिहास बहुत ही पुराना है, परंतु वर्ष 2014 से रूस के विरुद्ध अमेरिकी दबाव के बढ़ने से रूस, चीन के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए विवश हुआ।

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‘मेक इन इंडिया’ से द्विपक्षीय संबंधों को मिलेगी नई ऊर्जा

आगामी 6 दिसबंर को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर आ रहे हैं। इसके साथ ही  6 दिसंबर को भारत और रूस का 2+2 डॉयलाग होगा। भारत के विदेश व रक्षा मंत्री व रूस के विदेश व रक्षा मंत्री के बीच जब ये बातचीत होगी तो बहुत सारे ऐसे समझौते हैं  चाहे वो एस-400, एके 203 व अन्य रक्षा सौदे पर मुहर लग सकती है। वर्तमान में भारत और रूस के साझा हितों को देखते हुए रक्षा क्षेत्र में भारत-रूस सहयोग को ‘मेक इन इंडिया’ पहल से जोड़कर द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा देने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है। 2018 में रूसी राष्ट्रपति पुतिन के भारत दौरे में साढ़े सात लाख एके-203 राइफलें भारत में बनाने का सौदा हुआ।  सत्तर हजार एके-203 राइफल रूस से सीधी खरीदी जा रही हैं। वहीं भारत और रूस संयुक्त उपक्रम उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में एक उत्पादन इकाई में 10 साल के भीतर 6 लाख से ज्यादा ‘एके 203’राइफलों का निर्माण किया जाएगा। भारत रूस की सहायता से अमेरिका की सुपरपावर वाली स्थिति को भी चुनौती पेश करता रहता है। ब्रिक्स इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। जिसमें रूस, चीन और भारत तीनों एक मंच पर हैं। भारत और अमेरिका भले ही हालिया वर्षों में ज्यादा करीब आए हैं। लेकिन शाश्वत सत्य ये है कि रक्षा जरूरतों के लिहाजे से भी रूस उसका पुराना साझेदार है। भारत के 80 प्रतिशत से ज्यादा सैन्य उपकरण रूस से ही खरीदे जाते हैं। रूस के साथ भारत का रक्षा सौदा एस-400 और एके-203 राइफल तक ही सीमित नहीं है। रूस की तरफ से भारत की तीनों सेनाओं के लिए रक्षा उपकरण मुहैया कराई जाती है। भारतीय वायु सेना के रूसी मिग-29 और सुखोई-30 इसके कुछ जीवंत उदाहरण हैं। नौ सेना की बात करें तो रूसी जेट और पोत भी उसके बेड़े में शामिल हैं। हालिया वक्त में रूस से परमाणु शक्ति से लैस सबमरीन का भी ऑर्डर भारत की तरफ से दिया गया है। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत और रूस के बीच एक मजबूत रक्षा सहयोग है। स्‍टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2010 से 2019 तक रूस ने अपने हथ‍ियार निर्यात का एक-तिहाई हिस्‍सा भारत को बेचा है।

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भारत-अमेरिका के बीच संबंध उतार-चढ़ाव वाला रहा

भारत और अमेरिका दोनों देशों का इतिहास कई मामलों में एक सा रहा है। दोनों देशों ने औपनिवेशिक सरकारों के खिलाफ संघर्ष कर अमेरिका ने 1776 में और भारत ने 1947 में आजादी पाई है। शीत युद्ध के दौरान जहां अमेरिका ने पश्चिमी देशों का नेतृत्व किया, वहीं भारत ने गुटनिरपेक्ष दल के सदस्य के रूप में तटस्थ बने रहने की विचारधारा का समर्थन किया। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद ऐसी आशा थी कि सुरक्षा और स्थिरता के स्थायी युग का आरंभ होगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय नई राजनीतिक समस्याएं और सुरक्षा चुनौतियां बढ़ने लगीं। आतंकवाद, व्यापारिक हितों का टकराव, जलवायु परिवर्तन जैसे कई चुनौतीपूर्ण मुद्दे देशों के सामने आए, परंतु शीत युद्ध काल के वैचारिक विभाजन ने ऐसे गंभीर वैश्विक मुद्दों पर भी आम सहमति बनने में संकट खड़ा किया। भारत और अमेरिका के लिए इन सभी अनिश्चितताओं के बीच आम सहमति और सहयोग पर आधारित बहुलता और समानता के ढांचे के भीतर वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को आकार देने के लिए व्यापक सहयोग का एक अवसर प्राप्त हुआ। 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान अमेरिका ने चीन के साथ मिलकर पाकिस्तान का पूरा सहयोग किया, जो कि भारत के लिए बेहद चिन्ता का विषय था। 1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। भारत के परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत को परमाणु सामग्री और ईंधन आपूर्ति पर रोक लगा दी। साथ ही भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिये। इससे भारत और अमेरिका के संबंध में काफी कड़वाहट ला दी। 1990 के दशक में भारतीय आर्थिक नीति में बदलाव के परिणामस्वरूप भारत और अमेरिका के संबंधों में की शुरुआत 1990 के दशक के आख़िरी दिनों में हुई थी, जब भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह और अमेरिकी राजनयिक स्ट्रोब टालबॉट के बीच संवाद हुआ था। पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान दोनों में खलबली मच गई। भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाने की दबाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाया जाने लगा। अमेरिका ने भारत से अपने राजदूत को भी वापस बुला लिया था। इसके बाद कुछ समय तक दोनों देशों के बीच काफी तनातनी रही। वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका ने संयुक्त सत्र को संबोधित कर भारत और अमेरिका के बीच नए संबंधो की नींव रखी। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत का दौरा किया था। सैन्य सूचनाओं के आदान-प्रदान का एक समझौता है, जिस पर दोनों देशों के बीच वर्ष 2002 में उस समय सहमति बनी थी। वर्ष 2015 में बराक ओबामा की दूसरी भारत यात्रा ने भारत और अमेरिका के रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। ट्रंप के शासनकाल के दौरान भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों को और मजबूती मिली। हालिया दौर में रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरीदारी पर अमेरिका की तिरछी नज़रें रही हैं।  हाल ही में आई अमेरिकी कांग्रेस की "कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस" की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि "रूस में बने एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम ख़रीदने के भारत के अरबों डॉलर के सौदे के कारण अमेरिका 'काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज़ थ्रू सैंक्शन्स एक्ट' यानी (CAATSA) के तहत भारत पर पाबंदियां भी लगा सकता है।अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एक खास वर्चुएल कॉन्फ्रेंस के लिए 110 देशों की लिस्ट में भारत को भी शामिल किया  है। जो बाइडेन ने इन सभी देशों को लोकतंत्र के विषय पर एक वर्चुएल सम्मेलन के लिए इंवाइट किया है। उन्होंने इस सम्मेलन के लिए कई पश्चिमी देशों के अलावा इराक, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों को भी न्योता भेजा है। ये सम्मेलन 9 और 10 दिसंबर को शेड्यूल किया गया है।

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तुझे मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है

रूस: भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों की  बात करें तो नई दिल्ली ने 2007 से वाशिंगटन के साथ 21 बिलियन डॉलर से अधिक के रक्षा सौदे किए हैं। जबकि रूस भारत के साथ लंबे समय से चली आ रही विशेष रणनीतिक साझेदारी पर जोर देना चाहता है। ये गौर करने वाली बात है कि रूस ने 1960 के दशक की शुरुआत से भारत को $65 बिलियन से अधिक की सैन्य बिक्री की है।भारत ने खुद को वैश्विक पटल पर तेजी से उभरती एक शक्ति के रूप में दर्शाया है और विभिन्न चुनौतिपूर्ण मौकों पर अपनी ताकत का भान भी कराया है। ऐसे में अमेरिका के खिलाफ स्थितियां बनाने में भी रूस भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी मानता है। इसके साथ ही निवेश को लेकर भी रूस सजग है और भारत से अपने यहां निवेश की चाह भी रखता है। इसका आलम कोरोना काल में रूसी वैक्सीन स्पुतनिक के उत्पादन के दौरान भी आपसी  सहयोग के तौर पर देखने को मिला। 

अमेरिका: साल 2000 के बाद से भारत को लेकर अमेरिका ने अपनी विदेश नीति में काफी बदलाव किया है। भारत के रूप में व्हाइट हाउस को एक बड़ा रणनीतिक सहयोगी तो नजर आता ही है, इसके अलावा दिल्ली का विशाल बाजार भी उसे लुभाता है। जिसकी झलक कई बार पाकिस्तान को लेकर अमेरिका के बदलते रूख से भी भांप सकते हैं। भारत संग 2005 में हुए परमाणु समझौता को भला कौन भूल सकता है जिसके लिए अमेरिका ने अपने संविधान में संशोधक तक किए थे। जिसके बाद के वर्षों में भारत अमेरिका की प्रथामिकता सूचि में उचित स्थान रखने लगा। चीन हो या पाकिस्तान, अफगानिस्तान हो या व्यापार हर मसले पर अमेरिका को भारत के सगयोग की आवश्यकता है। ये केवल हवा-हवाई बातें नहीं है बल्कि इसे वास्तविकता की कसौटी पर परखने की कोशिश करेंगे तो चाहे वो ट्रंप का शासन रहा हो या बाइडन प्रशासन भारत को लेकर दोनों का रूख एक समान रहा है। ये जरूर हुआ है कि डेमोक्रेटिक के एक धड़े ने भारत के आतंरिक मसलों को उठाने की कोशिश की है लेकिन राष्ट्रपति बाइडेन की तरफ से इसे कोई खास तव्जज्यो नहीं दी गई। 

भारत का मल्टी अलाइंमेंट का फ़ॉर्मूला 

भारत के लिए अमेरिका और रूस दोनों ही अलग-अलग लिहाजे से महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ये तो साफ है कि भारत इनमें से किसी एक देश को नहीं चुन सकता। लेकिन इस बात का भी ख्याल रखना जरूरी है कि अमेरिकी सहयोग की वजह से रूस भारत से छिटक कर चीन के पाले में चला जाए। अभी तक चीन और भारत को लेकर रूस की स्थिति तटस्थ ही रही है। इसके साथ ही इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि भारत चीन से टकराने में अमेरिका के सहयोग को सिरे से नकार दे। इस लिहाजा से भारत मल्टी अलाइंमेंट का फ़ॉर्मूला अपना रहा है। यानी सभी पक्षों के साथ किसी न किसी तरह के संतुलित संबंध कायम रखना चाहे वो सामरिक या सुरक्षा या फिर व्यापार की दृष्टि से ही क्यों न हो। रूस और अमेरिका को लेकर भी भारत इसी रणनीति पर चल रहा है। लेकिन केवल ऐसा नहीं है कि रूस और अमेरिका की जरूरत सिर्फ और सिर्फ भारत को ही है, बल्कि ये वाइस वर्सा है। 

 -अभिनय आकाश






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