जिनके एक इशारे पर ठहर जाती थी मुंबई, बेबाक बयानबाजी बनी पहचान, ऐसा रहा बाल ठाकरे का कॉर्टूनिस्ट से करिश्माई नेता का सफर

Bal Thackeray
अभिनय आकाश । Dec 24, 2021 1:30PM
मुंबई के म्युनिस्पलिटी से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाली पार्टी प्रदेश और देश की राजनीति के लिए इतनी अहम हो जाएगी किसी ने नहीं सोचा था। उन्होंने सांसद भी बनाए और मेयर बनाए तो मुख्यमंत्री भी। मी मुंबईकर का नारा लगाकर मराठियों को जोड़ा और मी हिंदू की राजनीति कर हिंदू ह्र्दय सम्राट कहलाए जाने लगे।

हाथ में रूद्राक्ष की माला शेर की दहाड़ वाली तस्वीर और आवाज तानाशाह वाली। सब कुछ राजनीति नहीं थी। राजनीति को खारिज कर सरकारों को खारिज कर खुद को सरकार बनाने या मानने की ठसक थी। जिसके पीछे समाज की उन ताकतों का इस्तेमाल था जिसे पूंजी हमेशा हासिए पर धकेल देती है। मुंबई के म्युनिस्पलिटी से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाली पार्टी प्रदेश और देश की राजनीति के लिए इतनी अहम हो जाएगी किसी ने नहीं सोचा था। उन्होंने सांसद भी बनाए और मेयर बनाए तो मुख्यमंत्री भी। मी मुंबईकर का नारा लगाकर मराठियों को जोड़ा और मी हिंदू की राजनीति कर हिंदू ह्र्दय सम्राट कहलाए जाने लगे। अंग्रेजी का मशहूर फ्रेज है 'either you can agree or disagree but you cannot ignore him.' यानी आप आप सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते। जिस कुर्सी पर हम बैठते हैं वहीं हमारे लिए सिंहासन होता है... ये कथन बाला साहेब ठाकरे के थे। आपस में विरोधी बातों से बना चरित्र हिन्दुस्तान की सियासत का विचित्र किरदार किसी ने नफरत का खलनायक बताया तो किसी ने नस्लवादी तक बता दिया। एक बहुत बड़ा तबका उन्हें घोर सांप्रदायिक भी मानता है। अपनी मर्जी से काम करने वाले बाला साहब को तानाशाह और रिमोट कंट्रोलवादी भी कहा गया। न जाने क्या-क्या नहीं कहा गया लेकिन बाला साहेब ने परवाह नहीं की और किया वही जो मन ने कहा और कभी किसी की नहीं सुनी। मौके पर मंसूबे छिपा लेते थे लेकिन फिर उभर आती थी वो कड़वाहट जो उनकी पहचान बनी रही। कई बार तो वही करते पाए गए जिसके लिए विरोधी की गिरेबान पर हाथ डाला था। गांधी नेहरू परिवार की राजनीति का विरोध किया, सोनिया के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया, पर जब महाराष्ट्र सरकार के मंत्री आदेश लेकर ही सरकारी काम करते, योजना बनाते तो गर्व महसूस करते। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने जीवन में तीन प्रतिज्ञाएं की थी। एक प्रतिज्ञा ये थी कि वो कभी अपनी आत्मकथा नहीं लिखेंगे। दूसरी प्रतिज्ञा ये थी कि वो कभी किसी तरह का चुनाव नहीं लड़ेंगे और तीसरी प्रतिज्ञा ये थी कि वो कभी कोई सरकारी पद नहीं हासिल करेंगे। सरकार से बाहर रहकर सरकार पर नियंत्रण रखना उनकी पहचान थी। ऐसा क्या रहा कि बाला साहब ठाकरे इतने खास बन गए। ऐसा क्या रहा कि विरोध के बावजूद लोग लगातार उनसे जुड़ते चले गए। ऐसा क्या रहा कि बिना किसी ओहदे के सत्ता के शतरंज में उन्होंने लगातार शह और मात का खेल खेला। 

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ब्रिटिश राइटर के नाम से ठाकरे टाइटल लिया गया

23 जनवरी 1926 को पुणे के सदाशिवपिड इलाके के गाड़गिल रोड के पास एक घर हुआ करता था अब वो नहीं है। इसी घर में केशव प्रबोधन ठाकरे और रमाबाई केशव ठाकरे के परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया बाल ठाकरे। बाद में इसी बच्चे को दुनिया बाला साहेब ठाकरे के नाम से जानने लगी। पांच बहने सुधा, पद्मा, सुशीला, सरला और संजीवनी और चार भाई (बाला साहेब, श्रीकांत, रमेश और रामभाई हरणे) के साथ बचपन बेहद सादगी से गुजरा। पिता केशव प्रबोधन ठाकरे समाजसेवी और क्रांतिकारी लेखक थे। कहा जाता है कि ठाकरे टाइटल एक ब्रिटिश राइटर के नाम से लिया गया था। वे ब्राह्मण विरोधी आंदोलन के पक्ष में लिखते और काम करते। जिसकी सजा उन्हें अक्सर मिलती रहती। अक्सर विरोधियों के हमले से घिरे रहते। हालांकि बाला साहेब पर दलित विरोधी होने के आरोप लगे। पिता को अपने बात पर ऐसे हालात के बावजूद अपनी बात पर टिके रहने की वजह से प्रबोधांकर की टाइटल दी गई थी। बाला साहेब पर बचपन से अपने पिता का प्रभाव पड़ा। भाईयों में सबसे बड़े होने की वजह से वो अपनी उम्र से ज्यादा समझदार समझे गए। सामाजिक व्यस्था के बावजूद बाला साहेब के पिता हर बच्चे की क्षमताओं का पूरा ख्याल रखते। पिता रोज नन्हे बाल ठाकरे को कॉर्टून का गुण सिखाते। जब बाल ठाकरे अच्छा स्कैचिंग करने लगे तो पिता ने उन्हें स्याही औऱ कुची लाकर दी और फिर ठाकरे की जिंदगी को दिशा मिल गई। पिता के डॉयरेक्शन में ठाकरे कॉर्टूनिस्ट बन रहे थे इसी बीच परिवार पुणे से मुंबई शिफ्ट हो गया। इतने बड़े परिवार को पालने के लिए पिता जद्दोजहद में लगे। बच्चें अपनी रफ्तार से आगे बढ़ने लगे। बाला साहेब के भाई और राज ठाकरे के पिता श्रीकांत ठाकरे की संगीत में रूचि देखकर पिता ने उन्हें इसी क्षेत्र में आगे बढ़ाया। देश आजादी की लड़ाई में जुटा था और मुंबई में भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी था।  

नेहरू ने खुद पर बनाए कॉर्टून को लेकर ऐसे व्यक्त की भावनाएं

देश में चल रहे आंदोलन के दौर में बाला साहब जवान हुए, पढ़ाई पूरी की और फ्री प्रेस जर्नल में बतौर कॉर्टूनिस्ट नौकरी पकड़ी। उनके बनाए कॉर्टून देखते ही देखते जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए। मौजूदा हालात और जनता की परेशानी पर वे बेहद तीखे हमले करते। बाला साहेब ठाकरे ने एक बार नेहरू जी का कॉर्टून बनाया। पंडित जी ने जब वो कॉर्टून देखा तो उन्हें बेहद पसंद आया। उन्होंने ठाकरे से मुलाकात की और कॉर्टून पर अपने दस्तखत कर अपनी भावनाओं का इजहार किया। कॉर्टून बनाने की बाला साहेब की शैली बेहद विचित्र बताई जाती है। वो अपने दिमाग में विषय को सोचते। कागज लेकर बिना पेंसिल से ढांचा बनाए स्याही और ब्रश से काम शुरू करते। नतीजा था कि समकालीन कॉर्टूनिस्ट के बीच मजबूत साख बनी।

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 उस वक्त का बम्बई

1949 में बाला साहेब की शादी मीनाताई के साथ हो गई। शादी के बाद बाला साहेब की जिंदगी में बदलाव आया। घर बदला और रहन-सहन भी। कुछ वक्त बाद कॉर्टून बनाने वाली संवेदना जमीन पर अपना काम खोजने के लिए छटपटाने लगी और देश-दुनिया में अपनी शैली के लिए मशहूर ठाकरे की नींव तैयार होने लगी। आजादी के बाद हिन्दुस्तान में भाषाई आधार पर राज्य बनाए गए। इसने महाराष्ट्र में मराठी और गैर मराठी का विवाद पैदा कर दिया। बाला साहेब ठाकरे के पिता केशव प्रबोधन ठाकरे इस आंदोलन के अगुवा बने। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन जोर-शोर से चला। मुंबई में गैर मराठियों का प्रभुत्व उस राजनीति का मौका बन गया उस राजनीति का जिसका खामियाजा आज भी उत्तर भारतीयों को भरना पड़ता है। इसके शुरुआती दौर में निशाने पर दक्षिण भारतीय और गुजराती थे। बाला साहेब अपने पिता के साथ इस आंदोलन से जुड़ गए। लोगों के बीच ठाकरे की पहचान युवा तुर्क के तौर पर होने लगी। 

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संयुक्त महाराष्ट्र की मांग 

ठाकरे के आग उगलते भाषणों ने ज्यादा से ज्यादा लोगों को आंदोलन से जोड़ा। संयुक्त महाराष्ट्र की मांग पर हुए आंदोलन ने जनवरी 1960 में गोलीबारी हुई। 105 लोगों की जान गई। उस वक्त मोरारजी देसाई मुख्यमंत्री थे। बाद में इन्हीं शहीदों की याद में मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन को हुतात्मा चौक का नाम दिया गया। 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात दो अलग राज्य बने। इस बीच बाल ठाकरे के परिवार में भी बढ़ोतरी हुई। उन्हें तीन बेटे हुए जयदेव, बिंदुमाधव और उद्धव। बाल ठाकरे के साथ उनका परिवार भी रहता था। बड़े परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए राज ठाकरे के पिता और अपने छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे के साथ मिलकर बाल ठाकरे ने मार्मिक नाम की पत्रिका निकाली। ये क्षेत्रिए भाषा में अपनी तरह की अकेली पत्रिका थी। जल्द ही मार्मिक ने लोगों के बीच अपनी जगह बना ली। मार्मिक के जरिये मराठी मानुष का मुद्दा उठाने के साथ ही उस दौर की राजनीति पर भी तीखे कॉर्टून बनाए गए। पत्रिका ने ठाकरे की प्रसिद्धि को हर अंक के साथ बढ़ाया। मार्मिक के एक खास अबियान ने बाला साहेब को जनआंदोलन से राजनीति की ओर मोड़ा। 

मराठी मानुष और नौकरियां

1961 के दौर में मराठी प्रभुत्व वाले महाराष्ट्र में हर काम के लिए मराठी भाषकों की खोज हो रही थी। आकाशवाणी की बिल्डिंग के अंदर मराठी प्रोग्राम में मराठी भाषकों की कमी के चलते इस बिल्डिंग के अंदर काम काज को बंद करना पड़ा। जब ये बात बाल ठाकरे को पता चली तो उन्होंने अपने मार्मिक के अंदर एक सीरिज चलाई। हर ऑफिस के अंदर काम करने वाले मराठी और गैर मराठियों की पूरी लिस्ट छापी, जिसका शीर्षक था- देखो और चुप बैठे रहो। सीरिज के टाइटल बदलते गए बेरोजगार मराठी युवक बाला साहब से जुड़ते गए। महाराष्ट्र में मराठी पहले का आंदोलन काफी तेज हो गया। इस आंदोलन के जरिये बाला साहेब मुंबई और महाराष्ट्र के हर घर में पहुंच गए। मराठियों के लिए कुछ करने की मांग और इरादा आपस में मिल गए और शिवसेना की धुंधली तस्वीर उभरने लगी।  

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शिवसेना की स्थापना

19 जून 1966 को छत्रपति शिवाजी के आदर्श, हर हर महादेव के नारे और जय महाराष्ट्र के बोध वाक्य के साथ शिवसेना का गठन हो गया। बेलगाम आंदोलन चलाया। विरोध हिंसक हो गया और पुलिस फायरिंग में 69 लोगों की जान गई। बाला ठाकरे को गिरफ्तार किया गया। बाद में मुख्यमंत्री ने जेल में बाला साहेब अपील करवा हालात संभाले। ठाकरे जेल से बाहर निकले तो उन्हें सत्ता के ताले की बड़ी चाबी अपने पास होने का भान हो गया। 1970 में बाला साहेब ने मुंबई में रह रहे दक्षिण भारतीयों के खिलाफ जंग छेड़ दी। बाला साहब ठाकरे ने एक नारा दिया, ‘लुंगी हटाओ पूंगी बजाओ’।  इस नारे के साथ ही मराठी मानुष हावी होता गया और उन्होंने सरकारी दफतरों, गैर मराठी लोगों पर हमले शुरू कर दिए। दक्षिण भारतीये फिल्मे चलाने वाले सिनेमाघरों में तोड़फोड़ हुई। 

ट्रेड यूनियन पर कब्जा और लाल झंडे वालों से सामना

फिर माटी के लाल आंदोलन के जरिये उन्होंने महाराष्ट्र के नौकरियों पर मराठियों के पहले हक का मुद्दा उठाया। ऐसे में उनका सामना लाल झंडे वाले साम्यवादियों से हुआ जो मुंबई की ज्यादातर ट्रेड यूनियन पर काबिज थे। कहते हैं कांग्रेस ने साम्यवादियों के खिलाफ ठाकरे की मदद की। इस दौरान शिव सेना पर गंभीर आपराधिक आरोप लगे। 5 जून  1970 को ट्रेड यूनियन के नेता और विधायक कृष्ण देसाई की हत्या हो गई। दिल्ली कामगार यूनियन के दफ्तर में आग लगा दी गई। 19 आरोपियों में से 16 अपराधी साबित हुए। कम्युनिस्ट इसे शिवसेना का काम बताया है। हालांकि बाला साहेब का इस हत्याकांड से जुड़ाव कभी सामने नहीं आया। ठाकरे ने मुंबई की ट्रेड यूनियन से एक-एक कर लाल झंडे को खदेड़ दिया। मुंबई के कामगार यूनियन का मतलब शिवसेना हो गया। पटरी से फैक्ट्री तक और रेहड़ी से ऑफिस तक हर जगह शिवसेना की यूनियन ने कब्जा जमा लिया। अब शिवसेना प्रमुख के एक इशारे पर मुंबई बंद होती और देश हिल जाता। 

राजनीति में एंट्री 

शिवसेना का पहला सियासी इम्तिहान ठाणे म्युनिसिपल चुनाव में हुआ। शिवसेना ने इस चुनाव में 40 में से कुल 15 सीटों पर कब्जा जमा लिया। ये जीत शिवसेना के लिए एक बड़ा संकेत था। गिरगांव और दादर की जनता ने बाल ठाकरे पर भरोसा जताया। इस चुनाव के बाद बाल ठाकरे मराठियों के घोषित नेता बन चुके थे। शिवसेना के लिए ये एक बड़ा राजनीतिक मुकाम था। 1985 से शिवसेना जो बीएमसी पर काबिज हुई तो उसे आज तक कोई हिला नहीं सका। महाराष्ट्र के निकायों में शिवसेना का वर्चस्व ही उसका सियासी भविष्य बन गया। साल 1989 में जब शिवसेना को लगने लगा की राष्ट्रीय फलक पर छाना है तो किसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ जुड़ना होगा और पार्टी ने भाजपा का दामन थाम लिया। बाल ठाकरे के हिंदुत्व में जो प्रखरता और धार थी, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक के लिए मुफीद थी। 

आपातकाल का सपोर्ट

फिर आया आपातकाल का दौर। 1975 में इंदिरा सरकार ने आरएसएस समेत सारे संगठनों को बैन कर दिया था। शिवसेना पर भी बैन लगाने की तैयारी चल रही थी। अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि ठाकरे को अब दोबारा जेल भेजा जायेगा। लेकिन बाल ठाकरे ने सारे कयासों को गलत साबित कर दिया। खुल के इमरजेंसी का सपोर्ट किया। कभी इंदिरा को तो कभी संजय गांधी को महान नेता बताया। शिव सैनिकों ने तर्क दिया कि बालासाहेब ठाकरे की आइडियोलॉजी इंदिरा गांधी से मिलती है। इसीलिए सपोर्ट किया गया है। इमरजेंसी के ढाई साल तक शिवसेना ने कुछ नहीं किया। कोई नौकरी की डिमांड नहीं। कोई बॉर्डर इशू नहीं। कोई भाषणबाज़ी नहीं। 

शिवाजी पार्क में शिवसैनिक ने ली सीएम की शपथ

1995 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना ने 288 में से 138 सीटें जीत लीं। बाकी 7 सीटों का जुगाड़ हो गया। क्योंकि कांग्रेस के कई विधायक पार्टी छोड़ कर आ गए। शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने और बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे उप-मुख्यमंत्री। 14 मार्च 1995 को मनोहर जोशी ने शिवाजी पार्क में शपथ ली। वहीं जहां से शिवसेना ने अपना सफ़र शुरू किया था। महाराष्ट्र में पहली बार कोई मुख्यमंत्री राजभवन की बजाय खुले में शपथ ली थी। फिर मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को हटा दिया गया। और एक ‘मराठा’ नारायण राणे को मुख्यमंत्री बना दिया। उसी साल इलेक्शन कमीशन ने बाल ठाकरे पर छः साल का कम्युनल स्पीच के लिए चुनाव लड़ने और वोट देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। 

उद्धव को बनाया उत्तराधिकारी, राज ठाकरे ने पकड़ी अलग राह

महाराष्ट्र की सियासत पर राज करने वाले बाल ठाकरे वक्त के साथ बदलती राजनीति को महसूस करने लगे थे। बूढ़े होते बाल ठाकेर अपनी आखों के सामने अपने तिलस्म को टूटते हुए देख रहे थे। लेकिन सत्ता का मिजाज अब बदल चुका था। सियासत की विरासत सौंपने का संकट भी उनके सामने था। बालासाहब ठाकरे के दबाव के चलते उद्धव ठाकरे 2002 में बीएमसी चुनावों के जरिए राजनीति से जुड़े और इसमें बेहतरीन प्रदर्शन के बाद पार्टी में बाला साहब ठाकरे के बाद दूसरे नंबर पर प्रभावी होते चले गए। पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करते हुए जब कमान उद्धव ठाकरे को सौंपने के संकेत मिले तो पार्टी से संजय निरूपम जैसे वरिष्ठ नेता ने किनारा कर लिया और कांग्रेस में चले गए। 2005 में नारायण राणे ने भी शिवसेना छोड़ दिया और एनसीपी में शामिल हो गए। बाला साहब ठाकरे के असली उत्तराधिकारी माने जा रहे उनके भतीजे राज ठाकरे के बढ़ते कद के चलते उद्धव का संघर्ष भी खासा चर्चित रहा। यह संघर्ष 2004 में तब चरम पर पहुंच गया, जब उद्धव को शिवसेना की कमान सौंप दी गई। जिसके बाद शिवसेना को सबसे बड़ा झटका लगा जब उनके भतीजे राज ठाकरे ने भी पार्टी छोड़कर अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली। राज ठाकरे उसी चाल पर चलना चाहते थे जिस धार पर चलकर बाल ठाकरे ने अपनी उम्र गुजार दी। 27 नवम्बर 2005 को राज ठाकरे ने अपने घर के बाहर अपने समर्थकों के सामने घोषणा की। मैं आज से शिवसेना के सभी पदों से इस्तीफ़ा दे रहा हूं. पार्टी क्लर्क चला रहे हैं। मैं नहीं रह सकता। 2009 की दशहरा रैली जब बाल ठाकरे सामने आए तो पोते आदित्य को भी सियासी मैदान में उतार दिया। हालांकि राज ठाकरे का पार्टी छोड़कर जाने का दुख बाल ठाकरे को हमेशा से रहा। वहीं उद्धव ठाकरे पॉलिटिक्स में आने से पहले एक लेखक और फोटोग्राफर के तौर पर पहचान रखते थे।

2012 में बाल ठाकरे की मौत के बाद उद्धव ठाकरे पार्टी के लीडर बने और फिर 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद नाटकीय घटनाक्रम से गुजरते हुए कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी सरकरा बनाई व राज्य के मुखिया बने। बहरहाल, ऐसा चरित्र जिसके बारे में कोई दावा नहीं कर पाया कि वो ठाकरे को अच्छी तरह से जानता है, समझता है। बाल ठाकरे हमेशा एक अबूझ पहले बने रहे और अहम भरे आत्मविश्वास का पूरी दुनिया को लगातार एहसास कराते रहे। 

-अभिनय आकाश 

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