गंगानगर का आम इंसान डेरे में आकर कैसे बन गया शैतान, खालिस्तानी आतंकी की मदद से संभाली डेरा की कमान?

गंगानगर का आम इंसान डेरे में आकर कैसे बन गया शैतान, खालिस्तानी आतंकी की मदद से संभाली डेरा की कमान?

वो शख्स जो खुद को सबका भगवान कहता था और अपने सरनेम के मुताबिक इंसां कहलाने के लायक भी नहीं था। वो राम रहीम नहीं बल्कि एक रंगीन मिजाज अय्याश निकला। जिसने एक हजार एकड़ में फैले डेरे को अय्याशी के घेरे में बदल दिया था।

हरियाणा के बहुचर्चित और 19 साल पुराने रणजीत सिंह हत्याकांड में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम समेत 5 लोगों को दोषी करार दिया गया है। पंचकुला की सीबीआई अदालत ने 2002 में डेरा मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के मामले में गुरमीत राम रहीम समेत 5 लोगों को दोषी पाया है। सजा 12 अक्टूबर को सीबीआई की विषेष अदालत द्वारा सुनाई जाएगी। आज के इस विश्लेषण में बताएंगे कि राजस्थान के गंगानगर में रहने वाला एक आम इंसान सिरसा के डेरे में आकर कैसे बनता गया शैतान गया। खुद को मैसेंजर ऑफ गॉड कहने वाले बाबा ने संत के चोले में लाखों लोगों के भरोसे और विश्वास को तोड़ा। ये कहानी है इंसा कहे जाने वाले बाबा जिसकी काली दुनिया में इंसानियत के लिए कोई जगह ही नहीं थी। वो चोला पहनता था संत का लेकिन उसके डेरे में सच का मतलब ही कुछ और था। बाबा के काले सच की सुहबुगाहट तो कई वर्षों से मिल रही थी लेकिन उसकी खास धमक ऐसी की उसे कुरेदने वाला खुद इस दुनिया से ही गायब हो जाता। ऐसी कोई एकलौती कहानी नहीं है बल्कि एक लंबी फेहरिस्त है। 

ये तो साफ हो चुका है कि इस बाबा में न राम जैसी मर्यादा थी न रहीम जैसी मेलजोल। कहने के लिए वो लाखों डेरा प्रेमियों के लिए भगवान का मुकाबिल था लेकिन इसकी आड़ में जो राम रहीम की करतूतें सामने आईं वो बताने के लिए काफी थी कि वो अपने नाम के मुताबिक इंसान भी नहीं था। वो राम रहीम नहीं बल्कि एक रंगीन मिजाज अय्याश निकला। जिसने एक हजार एकड़ में फैले डेरे को अय्याशी के घेरे में बदल दिया था। 

वो शख्स जो खुद को सबका भगवान कहता था और अपने सरनेम के मुताबिक इंसां कहलाने के लायक भी नहीं था। इन सब की शुरुआत होती है 90 के दशक में जब राम रहीम ने सच्चा सौदे के सिरसा डेरे की कमान संभाली। बाबा राम रहीम ने आज से करीब 47 बरस पहले सिरसा के डेरे से धुनी रमाई थी। लेकिन इसके बाद अपना जाल ऐसा फैलाया कि देखते ही देखते हजारों लोग बाबा की ओर खिचे चले आए। मौका ताड़ कर बाबा ने भी अपने भक्तों की दुखती रग पर हाथ रख दिया। और संतान प्राप्ती के मामले में अपने पास करिश्माई ताकत होने का दावा करने लगा। धर्म कर्म की बातों के बीच भगवा चोले में लोगों की निगाहों पर ऐसा पर्दा डाला कि अब लोग आंख मूंद कर उस पर यकीन करने लगे। इस पाखंडी बाबा को इसी मौके का इतंजार था। बेशक डेरा सच्चा सौदा के सबसे बड़े आश्रम के सर्वेसर्वा बनने के पीछे फैसला बाबा राम रहीम का नहीं था। बल्कि ये कहानी तो बाबा राम रहीम के होश संभालने के पहल शुरू होती है। राम रहीम का जन्म राजस्थान के गंगानगर में हुआ। तारीख बताई जाती है 12 अगस्त 1967 की। तब से लेकर बाबा का जन्मदिन आजादी के जश्न के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। राम रहीम की जिंदगी में इस जश्न का संयोग उस दिन से शुरू होता है जब पिता मगहर सिंह और मां नजीब कौर ने अपने सात साल के बेटे को डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख सतनाम सिंह के हवाले करने का फैसला किया। तब सिरसा का ये डेरा सच्चा सौदा सतनाम सिंह की देख रेख में चलता था। ये डेरा देश की आजादी के एक साल बाद अप्रैल 1948 में शाह मस्ताना जी महाराज ने बनाया था। उस दौर में मस्ताना जी महाराज आस पास के लोगों को ध्यान करना सिखाते थे। उसका दाय़रा मस्ताना महाराज से लेकर नाम सिंह के दौर तक सिरसा से लेकर देश विदेश के दूसरे हिस्सों तक बढ़ गया। 1990 में इसकी कमान सतनाम सिंह ने राम रहीम को सौंप दी जिसके बाद इसका काया कल्प ही हो गया। 

इसे भी पढ़ें: अलग अंदाज में होगा इस बार इराक का संसदीय चुनाव, क्या इससे आएगा कुछ बदलाव?

कहते हैं साध्वियों के साथ-साथ राम रहीम ऐसी तमाम महिलाओं को अपनी काली दुनिया में घसीट लाता जो औलाद की चाह रखती थी। ऐसी महिलाओं को वो अकेले कमरे में बुलाता और उनके साथ ज्यादती करता और कमरे में लगे हिडेन कैमरों से उनके वीडियो बना लेता। कभी रुपये-पैसों के लिए ब्लैक मेल तो कभी अपनी गंदी जेहनियत के लिए ब्लैकमेल करता। इस तरह बाबा तीन दशक में लाखों लोगों का भगवान बन बैठा। मगर अपनी दुनिया में वो खुद इंसान भी नहीं रहा। 

बाबा का लिबास और सड़को पर शुरू हुआ खूनी तांडव 

2007 में बाबा समर्थकों और सिख समुदाय के बीच की भिड़ंत। डेरा सच्चा सौदा से निकली एक चिंगारी हरियाणा से लेकर पंजाब तक सुलगा गई। दरअसल, राम रहीम ने सिख गुरु गोविंद सिंह जैसा लिबास पहन लिया था। जिस पर सिखों ने नाराजगी जताई। इसकी वजह बनी डेरे और सिख समुदाय के बीच की पुरानी रंजिश। जो डेरा गुरुओं की धार्मिक पहचान और सिख समुदाय के दायरे में दखल को लेकर बढ़ती गई। लिहाजा राम रहीम के  गुरु गोविंद सिंह जैसा लिबास पहने पर सिखों ने कड़ा ऐतराज जताया। दोनों गुटों में तनाव बढ़ा तो राम रहीम को माफी मांगनी पड़ी। राम रहीम ने बयान जारी कर कहा कि उसकी मंशा गुरु गोविंद सिंह की बराबरी करने या उनके जैसा दिखने की नहीं थी। इस बयान के साथ बाबा ने भक्तों से शांति और घर लौटने की अपील की। उस हंगामे में डेरा समर्थक की गोली से एक सिख युवक की मौत हुई और सड़कों पर खूनी तांडव शुरु हो गया। 

इसे भी पढ़ें: योगी ने की अतिरिक्त सुरक्षा बल की मांग तो अमित शाह ने थमाया 4 हजार करोड़ का बिल, CAPF की तैनाती पर राज्यों को क्यों देना पड़ता है पैसा?

खालिस्तानी आतंकी ने गुरमीत को बनाया डेरा प्रमुख?

सतनाम सिंह ने गुरमीत का चुनाव अपने जीते जी कर लिया था। राम रहीम के बारे में कहा जाता है कि वो अपने पिता के साथ सात साल की उम्र में डेरा जरूर आया था लेकिन रोज मर्रा के कामकाज के अलावा उसे कुछ नहीं आता था। कहते हैं गुरमीत के डेरा प्रमुख बनने में बड़ा फैक्टर उसका गुरजंत सिंह नाम का दोस्त रहा जो खालिस्तानी आतंकियों के साथ काम करता था। गुरजंत और गुरमीत राजस्थान के गंगानगर के गुरुसर मोडिया गांव के रहने वाले थे। गुरजंत के चाचा की जमीन विवाद में हत्या हो जाती है। जिसके बाद गुरजंत कातिल को मारकर जेल चला गया। जहां उसकी मुलाकात खालिस्तानी आतंकियों से होती है और वो भी उनके साथ हो लेता है। पेंग्विन पब्लिकेशन की किताब डेरा सच्चा सौदा एंड गुरमीत राम रहीम- ए डिकेड लॉन्ग इनवेस्टिगेशन के अनुसार गुरजंत को अपने और साथियों के हथियार को छिपाने के लिए व विदेश से पैसा मंगवाने के लिए एक ठिकाना चाहिए था और ये डेरा सच्चा सौदा हो सकता था। इसलिए उसने गुरमीत का साथ दिया। किताब के अनुसार एक रात गुरमीत ने डेरे का दरवाजा खोल दिया और गुरजंत अपने आतंकी साथियों के साथ अंदर दाखिल हुआ। सभी ने सोते हुए शाह सतनाम को जगाया और उसकी कनपटी पर बंदूक रख दी। जिसके कुछ दिनों बाद ही माइक पर गुरमीत को वारिस बनाए जाने का ऐलान हो गया। गुरमीत के डेरा प्रमुख बनने के बाद हथियार रखने के लिए। डेरे के बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया। करोड़ों रुपए लाए और स्टोर किए गए। हालांकि 31 अगस्त 1991 को 20 लाख का इनामी आतंकवादी गुरजंत मोहाली में एनकाउंटर में मारा जाता है और उसके मरने के बाद सारा पैसा गुरमीत का हो गया। 

साल 2000 तक राम रहीम ने अपने डेरे के रंग के साथ ही खुद को भी पूरी तरह बदल दिया। लंबे बाल, अजब-अजब पोशाक और पूरी चाक चमक के बीच कौन कह सकता था कि श्रीगंगानगर का वही लड़का है जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वो ट्रक चलाया करता था। वो संत के भेष में लव चार्जर बनने वाला है इसका अंदेशा तो होने लगा था लेकिन गुरमीत का खौफ ऐसा था कि डेरा के दूसरे साधुओं और किसी ने भी इस पर कोई ऐतराज नहीं जताया। गुरमीत न सिर्फ शादी शुदा है बल्कि तीन बच्चों के साथ पत्नी को भी डेरे के अंदर ही रखा। लेकिन साल 2002 में दो साध्वियों ने राज नहीं खोला होता तो बाबा की काली करतूतों के राज कभी उजागर नहीं होते। दोनों साध्वियों का बलाक्तकार कई महीनों से करने के बाद उसे डरा-धमका कर डेरे से निकाल दिया। लेकिन दोनों ने बाबा के कुकर्मों के खिलाफ तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वायपेयी तक चिट्ठी पहुंचा दी। लेकिन राम रहीम के खौफ में वो गुमनाम ही रहीं। उनकी खौफ की वजह वाजिब भी थी। क्योंकि राम रहीम ने सिर्फ शक में डेरे के प्रबंधन कमेटी के सदस्य रणजीत सिंह की हत्या करवा दी कि उसने साध्वी की चिट्ठी सार्वजनिक की हैं। 

इसे भी पढ़ें: RBI का Tokenisation सिस्टम क्या है, कैसे करेगा काम, इससे हमारे और आपके जीवन पर क्या पड़ेगा असर?

साध्वी की चिट्ठी को पढ़कर निकल जाएंगे आंखों से आंसू

हरिय़ाणा के कुरक्षेत्र इलाके में 15 साल पहले एक सुबह अचानक लोगों को एक गुमनाम चिट्ठी मिलती है। उस चिट्ठी में लिखा था कि डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा राम रहीम ने अपने ड़ेरे में कई साध्वियों के साथ बलात्कार किया है और चिठ्ठी लिखने वाली उन साध्वियों में से एक है। चिट्ठी में उस साध्वी ने अपने नाम की जगह नीचे बस इतना लिखा था- एक दुखी अबला। चिट्ठी लिखने वाली साध्वी ने लिखा है कि डेरा के अंदर जब पहली बार एक दूसरी साध्वी ने उसे बताया कि बाबा राम रहीम उसे अपनी गुफा में बुला रहे हैं तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा कि भगवान खुद उसे बुला रहे हैं। मगर एक बार गुफा में जाते ही जो रूप उसने अपने बाबा का देखा उसके बाद तो भगवान पर से ही उसका भरोसा उठ गया। साध्वी ने चिट्ठी में प्रधानमंत्री से मांग की थी कि डेरे में रहने वाली सैकड़ों युवतियों के साथ होने वाले बलात्कार की जांच की जाए। उसने लिखा-

"मेरा यह पहला दिन था।  महाराज ने मेरे को बाँहों में लेते हुए कहा कि हम तुझे दिल से चाहते हैं। तुम्हारे साथ प्यार करना चाहते हैं क्योंकि तुमने हमारे साथ साधु बनते वक्त तन-मन-धन सब सतगुरु के अर्पण करने को कहा था। तो अब ये तन-मन हमारा है। मेरे विरोध करने पर उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं हम ही ख़ुदा हैं। तुम्हारे साथ प्यार करना चाहते हैं क्योंकि तुमने हमारे साथ साधु बनते वक्त तन-मन-धन सब सतगुरु के अर्पण करने को कहा था। तो अब ये तन-मन हमारा है। मेरे विरोध करने पर उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं हम ही ख़ुदा हैं।" साध्वी ने एक गुमनाम पत्र प्रधानमंत्री को भेजा जिसकी एक कॉपी पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी गई। हाईकोर्ट ने इसका संज्ञान लेते हुए सितंबर 2002 में सीबीआई जांच के आदेश दिए। एक गुमनाम खत से शुरू हुआ मुकदमा 25 अगस्त 2017 को गुरमीत राम रहीम के दोषी करार देने के बाद अपने मुकाम पर पहुंचने वाला भारत के इतिहास का अनोखा मुकदमा हो गया है ।

रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में राम रहीम को उम्रकैद हुई थी

साध्वी यौन शोषण मामले में जो लेटर लिखे गए थे, उन्हीं के आधार पर रामचंद्र ने अपने अखबार में खबरें प्रकाशित की थीं। छत्रपति पर पहले दबाव बनाया गया था। जब वे धमकियों के आगे नहीं झुके तो 24 अक्टूबर 2002 को सिरसा में घर के बाहर पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को गोली मारी गई थी। 28 दिन बाद 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उपचार के दौरान रामचंद्र ने दम तोड़ दिया था। हालांकि शुरूआत में इस मामले में राम रहीम का नाम नहीं था, लेकिन 2003 में जांच सीबीआई को सौंपने के बाद 2006 में राम रहीम के ड्राइवर खट्टा सिंह के बयानों के आधार पर डेरा प्रमुख का नाम इस हत्याकांड में शामिल हुआ था। 11 जनवरी 2018 को केस में राम रहीम, कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और किशन लाल को दोषी करार दिया गया था। इसके बाद चारों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

इसे भी पढ़ें: ‘आया राम, गया राम’ की कहावत और ऐसे फिर हुई दल बदल कानून की भारतीय राजनीति में एंट्री

रणजीत सिंह हत्या कांड

10 जुलाई 2002 में कुरुक्षेत्र के पास रणजीत सिंह की उनके गांव में हत्या की गई थी। रणजीत सिंह डेरा के साथ जुड़े हुए थे और मैनेजर के पद पर काम कर रहे थे। डेरा प्रबंधन को शक था कि रणजीत सिंह ने साध्वी यौन शोषण की गुमनाम चिट्ठी अपनी बहन से ही लिखवाई थी। रणजीत सिंह ने राम रहीम पर लगे इस आरोप के बाद डेरा को छोड़ दिया था। गुरमीत राम रहीम ने बड़ी कोशिश की कि रणजीत सिंह वापस आ जाए। लेकिन जब वो नहीं आया तो उसकी हत्या उसके गांव में ही करवा दी गई। पुलिस जांच से असंतुष्ट रणजीत के पिता ने जनवरी 2003 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सीबीआई जांच की मांग की थी। हाईकोर्ट ने पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए केस की जांच सीबीआई को सौंप दी। रणजीत सिंह हत्याकांड में तीन गवाह महत्वपूर्ण थे। इनमें दो चश्मदीद गवाह सुखदेव सिंह और जोगिंद्र सिंह हैं। उनका कहना था कि उन्‍होंने आरोपितों को रंजीत सिंह पर गोली चलाते हुए देखा था। तीसरा गवाह गुरमीत का ड्राइवर खट्टा सिंह था, जिसके सामने रंजीत को मारने की साजिश रची गई थी। खट्टा सिंह ने अपने बयान में कहा था कि गुरमीत राम रहीम ने उसके सामने ही रंजीत को मारने के लिए बोला था। हालांकि बाद में खट्टा सिंह अदालत के सामने बयान से मुकर गया था। कई साल बाद खट्टा सिंह फिर से कोर्ट में पेश हो गया और गवाही दी। मामले की जांच करते हुए सीबीआई ने राम रहीम समेत 5 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था। 2007 में कोर्ट ने आरोपियों पर चार्ज फ्रेम किए थे। 8 अक्टूबर 2021 को आरोपी दोषी करार दिए गए हैं। सजा 12 अक्टूबर को सीबीआई की विषेष अदालत द्वारा सुनाई जाएगी। राम रहीम को 302 यानी हत्या और 120बी यानी कि आपराधिक साजिश रखने का दोषी पाया गया है। दोषियों में गुरमीत राम रहीम, तत्कालीन डेरा प्रबंधक कृष्ण लाल, अवतार, जसबीर और सबदिल शामिल हैं।

ऐसे चला 2002 से लेकर 2017 तक राम रहीम पर केस..

अप्रैल 2002: राम रहीम की साथी साध्वी ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक शिकायत भेजी थी। जिसमें उसने सीधे तौर पर राम रहीम पर यौन शोषण करने का आरोप लगाया था।

मई 2002: साध्‍वी की तरफ से दिए गए पत्र को आधार मानते हुए उसकी सत्‍यता प्रमाणित करने के लिए सिरसा के सेशन जज को जिम्‍मेदारी सौंपी गई।

दिसंबर 2002: सेशन जज ने अपनी रिपोर्ट में शिकायत को सही पाया और इसके बाद राम रहीम पर धारा 376, 506 और 509 के तहत केस दर्ज करने का आदेश दिया गया।

दिसंबर 2003: मामले की गंभीरता को देखते हुए राम रहीम पर लगे यौन शोषण के आरोप की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। जांच का जिम्‍मा सतीश डागर पर था। उन्‍होंने भरसक प्रयास के बाद लगभग दो साल बाद उस साध्‍वी को तलाशने में सफलता प्राप्‍त कर ली, जिसका यौन शोषण हुआ था।

जुलाई 2007: सीबीआई ने शिकायत मिलने के लगभग चार साल बाद सीबीआई की अदालत में मामले की चार्जशीट दाखिल की। फिर अंबाला से यह केस पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत में भेज दिया गया। चार्जशीट में साध्‍वियों के साथ ही अन्‍य के साथ भी यौन शोषण होने का पता चला। हालांकि उनकी पूरी जानकारी हासिल नहीं की जा सकी। ये मामले 1999 और 2001 के बताए गए।

अगस्त 2008: चार्ज शीट फाइल करने के एक साल बाद केस का ट्रायल शुरू हुआ और डेरा प्रमुख राम रहीम के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए।

साल 2011: तीन साल बाद इस केस में ट्रायल शुरू हुआ, जिसमें वकीलों की बड़ी फौज ने राम रहीम का बचाव करने की कोशिश की. यह ट्रायल 2016 में जाकर पूरा हुआ।

जुलाई 2016: मामले की सुनवाई के दौरान 52 गवाह पेश किए गए, इनमें 15 वादी थे और 37 प्रतिवादी थे।

जून 2017: एक साल बाद अदालत ने डेरा प्रमुख के विदेश जाने पर रोक लगा दी।

25 जुलाई 2017: सीबीआई अदालत ने मामले में प्रतिदिन सुनवाई करने के निर्देश दिए. साथ ही जल्‍द फैसला सुनाने की बात कही।

17 अगस्त 2017: 15 साल पुराने मामले में दोनों ओर से चल रही जिरह खत्म हो गई और फैसले के लिए 25 अगस्त की तारीख मुकर्रर की गई।

25 अगस्त 2017: सीबीआई की विशेष अदालत ने गुरमीत राम रहीम को दोषी पाया और स्‍पेशल जेल भेजना का आदेश दिया। इस मामले में सजा का ऐलान 28 अगस्‍त को किया जाएगा।

 28 अगस्त, 2017: दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने 20 साल की सजा सुनाई।

11 जनवरी 2018: रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में राम रहीम को उम्रकैद हुई।

8 अक्टूबर 2021: राम रहीम पूर्व प्रबंधक की हत्या के दोषी क़रार दिया गया। 

-अभिनय आकाश






Prabhasakshi logoखबरें और भी हैं...

राजनीति

झरोखे से...