अलग अंदाज में होगा इस बार इराक का संसदीय चुनाव, क्या इससे आएगा कुछ बदलाव?

अलग अंदाज में होगा इस बार इराक का संसदीय चुनाव, क्या इससे आएगा कुछ बदलाव?

इराक में 10 अक्टूबर को आम चुनाव होने है, जिसे 2003 में सद्दाम हुसैन के अमेरिका द्वारा अपदस्थ करने के बाद का पांचवां संसदीय चुनाव कहा जा रहा है। वोट अगले साल के लिए निर्धारित किया गया था, लेकिन प्रदर्शनकारियों को संतुष्ट करने के लिए इसे 2021 में कराने का फैसला लिया गया।

एक समय था जब बगदाद अब्बासी खलीफाओं का केंद्र रहा है। इस दौर में इराक के शहर बेहद समृद्ध हुआ करते थे। यहीं से दुनियाभर में व्यापार और संस्कृतियों का विस्तार होना शुरू हुआ था। यहां के शहर उस समय बेहद आधुनिक हुआ करते थे, जो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल थे। इसके बाद औपनिवेशिक काल में इराक की हालत खराब होनी शुरू हुई और ब्रिटेन ने अपने शासन में भारत की ही तरह इराक की अर्थव्यवस्था भी चौपट कर दी। इराक की स्वतंत्रता के बाद 1980 का दशक इराक में एक अलग तरह का बदलाव लेकर आया। इस तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन शासनकाल था। जिसे कई लोग गोल्डन पीरियड बताते हैं, हालांकि दूसरा पक्ष सद्दाम के शासन को तानाशाह की बुरी याद के रूप में भी देखते हैं। इराक में 10 अक्टूबर को चुनाव होने हैं और इसे सद्दाम हुसैन के अमेरिका द्वारा अपदस्थ करने के बाद का पांचवा चुनाव कहा जा रहा है। ऐसे में आज के इस विश्लेषण में हम बात करेंगे इराक के इतिहास की, पड़ोसी देश ईरान के साथ आठ वर्षों तक चले उसके युद्ध की, सद्दाम हुसैन के सत्ता पर कब्जे की और इराक के वर्तमान हालात की भी। लेकिन सबसे पहले शुरूआत वर्तमान से करते हैं। 

इराक में 10 अक्टूबर को आम चुनाव होने है, जिसे 2003 में सद्दाम हुसैन के अमेरिका द्वारा अपदस्थ करने के बाद का पांचवां संसदीय चुनाव कहा जा रहा है। वोट अगले साल के लिए निर्धारित किया गया था, लेकिन प्रदर्शनकारियों को संतुष्ट करने के लिए इसे 2021 में कराने का फैसला लिया गया। इराक पिछले दो सालों से  बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, खराब सेवाओं और सत्ता का दुरुपयोग की वजह ले विरोध-प्रदर्शन झेल रहा है। इराक में पिछला संसदीय चुनाव 12 मई, 2018 को हुआ था। स्वतंत्र उच्च चुनाव आयोग के अनुसार, लगभग 24 मिलियन इराकी विधायिका में 329 सीटों के लिए, व्यक्तिगत रूप से और 167 पार्टियों और गठबंधनों के लिए चल रहे 3,249 उम्मीदवारों के लिए अपने मतपत्र डालने के योग्य हैं। इराक में शिया मुस्लिम बहुसंख्यक समूहों के सत्ता में बने रहने की उम्मीद जताई जा रही है जो कि सद्दाम के सुन्नी नेतृत्व वाले शासन को सत्ता से हटाए जाने के बाद से ही इराक पर शासन कर रही है।

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क्या बदलाव किए गए

अब इराक़ में 83 चुनावी केन्द्र होंगे। इन केन्द्रों का निर्धारत आबादी के हिसाब से किया गया है। अतः बग़दाद में जहां देश की 21 प्रतिशत आबादी बसती है 17 चुनावी केन्द्र बनाए गए हैं।  चुनावी क़ानून बदलने के बाद एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि अब उम्मीदवारों को वोट दिया जाएगा। पहले एलायंस को वोट दिया जाता। अतः जिस उम्मीदवार को ज़्यादा वोट मिलेंगे वह संसद में सीट हासिल करेगा। यही वजह है कि इस साल आज़ाद उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई है। 789 आज़ाद उम्मीदवार मैदान में उतरे हैं। वर्ष 2018 के संसदीय चुनाव में 7 हज़ार 367 उम्मीदवार मैदान में थे मगर इस बार के चुनाव में 3 हज़ार 249 उम्मीदवार मैदान में हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्ष 2014 के चुनाव में 9 हज़ार से अधिक उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे थे। इस तरह देखा जाए तो पिछले सात वर्षों में चुनावी उम्मीदवारों की संख्या घटती गई है। एक और बदलाव इराक़ी महिलाओं के संदर्भ में है। महिला उम्मीवारों की संख्या भी काफ़ी कम हो गई है। पहले यह संख्या 2 हज़ार 592 थी जो इस साल कम होकर 951 रह गई है। 

संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में चुनाव 

इराक़ के इस साल के चुनाव अंतर्राष्ट्रीय निगरानी में होंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत ने इस संदर्भ में कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ के 800 पर्यवेक्षक इराक़ में होने वाले चुनावों की निगरानी करेंगे। पहले संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यवेक्षक केवल सुरक्षा मामलों पर नज़र रखते थे लेकिन अब यह टीम इराक़ के आयोजन की प्रक्रिया में मदद करेगी। 

शिया-सुन्नी के बीच सत्ता का बंटवारा

इराक़ की बहुसंख्यक आबादी शिया ही है। जब तक सद्दाम हुसैन इराक़ की सत्ता में रहे तब तक यहां शिया हाशिए पर रहे। सद्दाम हुसैन सुन्नी मुसलमान थे। लेकिन 2003 के बाद से अब तक इराक़ के सारे प्रधानमंत्री शिया मुसलमान ही बने और सुन्नी हाशिए पर होते गए। 2003 से पहले सद्दाम हुसैन के इराक़ में सुन्नियों का ही वर्चस्व रहा। सेना से लेकर सरकार तक में सुन्नी मुसलमानों का बोलबाला था। सद्दाम के दौर में शिया और कुर्द हाशिए पर थे। इराक़ में शिया 51 फ़ीसदी हैं और सुन्नी 42 फ़ीसदी हैं।

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पहले था ओटोमन साम्राज्य

संसार की दो महान नदियाँ दजला ओर फ़रात इराक को सरसब्ज़ बनाती हैं। ईरान की खाड़ी से 100 मील ऊपर इनका संगम होता है और इनकी सम्मिलित धारा "शत्तल अरब" कहलाती है। मिस्र, सुमेरिया और हड़प्पा इन तीन सभ्यताओं में से इराक सुमेरियन सभ्यता का हिस्सा रहा है। उस काल में यह सभ्यता बेहद समृद्ध थी और हड़प्पा के लोग सुमेरियन सभ्यता के लोगों के साथ व्यापार के लिए उत्सुक रहते थे। 1534 से 1918 तक इराक ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा रहा था। सन् 1914 में तुर्की जब प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी के पक्ष में शामिल हुआ तब अंग्रेजी सेनाओं ने इराक में प्रवेश कर 22 नवंबर 1914 को बसरा पर और 11 मार्च 1917 को बगदाद पर अधिकार कर लिया। इस आक्रमण से अंग्रेजों का उद्देश्य एक ओर अबादान में स्थित ऐंग्लो-पर्शियन आयल कंपनी की रक्षा करना और दूसरी ओर मोसूल में तेल के अटूट भंडार पर अधिकार करना था। युद्ध की समाप्ति के बाद ये अंग्रेजों का प्रभावक्षेत्र बन गया। अंग्रेजों ने 23 अगस्त सन् 1921 को मेसोपोटामिया में क्षेत्र का नाम इराक रख दिया। अपनी ओर से एक कठपुतली अमीर फैजल को इराक का राजा घोषित कर दिया। सन् 1930 में इराक और ग्रेट ब्रिटेन के बीच एक विधिवत् 25 वर्षीय संधि हुई जिसकी एक शर्त यह भी थी क यथासंभव शीघ्र ही ग्रेट ब्रिटेन इराक को राष्ट्रसंघ में शामिल किए जाने की सिफारिश करेगा। संधि की इस धारा के अनुसार ग्रेट ब्रिटेन की सिफारिश पर इराक के ऊपर से उसका मैंडेट 4 अक्टूबर सन् 1932 को समाप्त हो गया और एक स्वतंत्र राष्ट्र की हैसियत से इराक राष्ट्रसंघ का सदस्य बना लिया गया। इराक के आग्रह पर ऐंग्लो-इराकी संधि की अवधि अक्टूबर, सन् 1947 तक बढ़ा दी गई। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन ने फिर इराक पर कब्जा कर लिया था। बाद में 1958 में अंग्रेजों के हाथ से सत्ता छीनी गई। अगले चार वर्षो तक इराक में जनरल क़ासिम का शासन रहा। लेकिन 8 फ़रवरी 1963 को थल एवं वायु सेना द्वारा पुन: सैनिक क्रांति किए जाने के बाद 9 फ़रवरी 1963 को जनरल कासिम फाँसी पर लटका दिए गए और आरिफ ने राष्ट्रीय असेंबली की हैसियत से कार्यभार संभाल लिया।आरिफ ने खुद ही कुछ अधिकारियों को साथ मिलाकर बाथ पार्टी की सरकार गिरा दी। 13 अप्रैल को एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में आरिफ के मारे जाने के बाद उनके बड़े भाई मेजर जनरल अब्द-अल रहमान मुहम्मद आरिफ देश के राष्ट्रपति बने। 1968 बाथ पार्टी की अगुवाई में हुए विद्रोह में अब्द-अल रहमान मुहम्मद आरिफ सत्ता से बेदखल। रिवोल्यूशन कमांड काउंसिल (आरसीसी) ने सत्ता संभाली। जनरल मोहम्मद हसन अल-बक्र ने बतौर चेयरमेन और देश के राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखी।

पेट्रोलियम कंपनी का राष्ट्रीकरण

1972 में इराक़ पेट्रोलियम कंपनी (आईपीसी) का राष्ट्रीयकरण किया गया। फिर दो साल बाद इराक़ ने कुर्द क्षेत्र को सीमित स्वायत्तता दी। फिर आता है 1979 का साल जिसके बाद इराक की तस्वीर पूरी तरह से बदलने वाली थी। अल बक्र के बाद राष्ट्रपति बने सद्दाम हुसैन। सद्दाम का मतलब जो सामना कर सके, सद्दाम मतलब जो जिद्दी, ये सद्दाम के शाब्दिक अर्थ हैं। बगदाद से आगे एक इलाका जिसे तिकरित के नाम से जाना जाता है। सद्दाम हुसैन की पैदाइश वहीं की है और उसके जन्म से पहले ही पिता की मृत्यु हो गई। 

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आठ साल तक चला इराक-ईरान युद्ध 

आधुनिक इतिहास में मध्यपूर्व में कई सारी जंग देखने को मिली। इनमें से ही एक युद्ध ईरान औऱ इराक के बीच हुआ। जो आठ सालों तक चला। इसकी शुरआत सितंबर के महीने में 1980 के दौर में हुई जब इराकी सेना ने अपने पड़ोसी मुल्क ईरान पर चढ़ाई कर दी। इराक ने खोर्रमशहर शहर पर कब्जा कर लिया। मगर इराक की बढ़त को जल्द ही ईरान की ओर से चुनौती मिलने लगी और फिर 1981 में ईरान ने सभी खोए क्षेत्र फिर से हासिल कर लिए। ईरान अब आक्रामक हो चुका था और इराकी सुरक्षा मजबूत हो गई थी।  दोनों मुल्कों ने शहरों, सैन्य ठिकानों और तेल सुविधाओं पर हवाई हमले किए। हालात इस कदर बिगड़ गए कि अमेरिकी और अन्य पश्चिमी मुल्कों को तेल उत्पादन को स्थिर रखने के लिए फारस की खाड़ी में जंगी जहाज भेजने पड़े। इराक को सऊदी अरब, कुवैत, अमेरिका समेत अन्य अरब देशों का साथ मिला। वहीं, ईरान को सिर्फ सीरिया और लीबिया का सहयोग मिला। 1988 की जुलाई में दोनों देश सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 598 के तहत संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता वाले युद्धविराम को स्वीकार करने पर सहमत हुए।  हालांकि, 20 अगस्त 1988 को ये युद्ध आधिकारिक रूप से समाप्त हुआ। 

जॉर्ज बुश पर जानलेवा हमले की कोशिश

कुवैत में अप्रैल में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर हुए जानलेवा हमले की कोशिश के बाद बदले की कार्रवाई में अमरीकी सेना ने बगदाद स्थित इराक़ के खुफिया विभाग के मुख्यालय पर क्रूज़ मिसाइलों से हमला किया। साल 1995 में सद्दाम हुसैन ने जनमत संग्रह जीत कर राष्ट्रपति पद पर और सात सालों तक बने रहने का मार्ग प्रशस्त किया। बगदाद से संयुक्त राष्ट्र संघ के कर्मचारियों के निष्कासन के बाद अमरीका और ब्रिटेन ने बमबारी शुरू कर दी। इराक़ के नाभिकीय, रासायनिक और जैविक हथियार कार्यक्रम को नष्ट करने के लिए चलाए गए इस अभियान को ‘ऑपरेशन डेजर्ट फॉक्स’ का नाम दिया गया था।

सत्ता से बेदखल हुआ सद्दाम

मार्च 2003 में संयुक्त राष्ट्र संघ में ब्रिटेन के राजदूत ने कहा कि इराक के साथ चल रही कूटनयिक कोशिशें खत्म हो गई हैं. हथियार निरीक्षक लौट गए हैं. अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सद्दाम हुसैन और उनके बेटों को 48 घंटों के भीतर इराक़ न छोड़ने पर युद्ध का सामना करने की चेतावनी दी। बगदाद स्थित संयुक्त राष्ट्र के मु्ख्यालय में आत्मघाती हमलावरों ने बम लदे ट्रक से हमला किया। 13 दिसंबर को अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को एक बंकर से गिरफ्तार किया और 30 दिसंबर को फांसी दी गई जिसे पूरी दुनिया ने देखा। जून 2004 में इराक़ के प्रधानमंत्री इयाद अलावी की अंतरिम सरकार का गठन। 2005 में हिंसा के बीच संसद ने कुर्दिश नेता जलाल तालाबानी को इराक़ का राष्ट्रपति और शिया नेता इब्राहिम जाफरी को प्रधानमंत्री नामित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2011 तक इराक से अपनी सेना वापस बुलाने का ऐलान किया। मार्च 2010 में संसदीय चुनाव और नई सरकार के गठन को मंजूरी मिलने के बाद जलाल तालाबानी का राष्ट्रपति पद पर और बतौर प्रधानमंत्री नूरी अल मालिकी की दोबारा नियुक्ति होती है। 

बहरहाल, अब्बासी खलीफाओं ने शिक्षा, व्यापार, तकनीक, सामाजिक विकास पर काफी जोर दिया। इसे पूरी दुनिया खासकर अरब वर्ल्ड में तेजी से फैलाया। मध्यकाल में इराक ज्ञान का केंद्र रहा है। इस काल में जहां यूरोप जैसे क्षेत्र में दास और स्वामी हुआ करते थे और लोगों को सैकड़ों किस्म के टैक्स देने पड़ते थे, वहीं बगदाद अरब वर्ल्ड का केंद्र हुआ करता था और इसके कोने-कोने में विकास हो रहा था। इसके बाद औपनिवेशिक काल में इराक की हालत खराब होनी शुरू हुई, क्योंकि ब्रिटेन ने अपने शासन में भारत की ही तरह इराक की अर्थव्यवस्था भी चौपट कर दी।

- अभिनय आकाश






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