अपनी डिप्लोमेसी के जरिये भारत ने श्रीलंका में कैसे कर दिया चीन का गेमओवर, भारत की बदलती विदेश नीति का पूरा विश्लेषण

अपनी डिप्लोमेसी के जरिये भारत ने श्रीलंका में कैसे कर दिया चीन का गेमओवर, भारत की बदलती विदेश नीति का पूरा विश्लेषण

जंग भले ही यूक्रेन में चल रही हो। लेकिन इस युद्ध ने दुनिया के हरेक देश को सतर्क कर दिया है। ज्यादातर देश अपने पड़ोस की सुरक्षा को लेकर सतर्क हैं। इसी कवायद के तहत भारत ने अपने पड़ोसी देश श्रीलंका में अपने सबसे बड़े दुश्मन चीन को तगड़ी मात दे दी है।

पॉवरफुल की क्या परिभाषा हो सकती है, ठेठ देशी अंदाज में समझें तो उसका घर भी अच्छे से चले और पूरे मौहल्ले में भी भौकाल हो। यही बात देशों पर भी लागू होती है। भारत की हमेशा से ये चाह रही है कि उसे दक्षिण एशिया में इज्जत मिले। उसे एक पॉवरफुल कंट्री की तरह देखा जाए। उसकी ये इच्छा उसकी विदेश नीति की दिशा तय करती है। भारत का पड़ोसी मुल्क श्रीलंका के रिश्ते कैसे हैं इसके लिए अलग से एक एमआरआई का पूरा एपिसोड करना पड़ जाएगा। लेकिन संक्षेप में समझें तो तमिलनाडु से जाफरा मोटरबोट से चंद घंटों में पहुंचा जा सकता है। दोनों देशों के बीच सदियों से संबंध हैं। जब भारत और श्रीलंका दोनों ही अंग्रेजों के गुलाम थे तो भारत से तमिल समुदाय के लोग श्रीलंका जाकर बसे। आधुनिक समय में इसी तमिल समुदाय की वजह से श्रीलंका और भारत का भविष्य साथ में जुड़ा हुआ है। राजवी गांधी द्वारा तमिल समस्या को लेकर श्रीलंका में शांति सेना भेजना हो या फिर बदले में नाराज लिट्टे समर्थकों द्वारा राजीव गांधी की हत्या को अंजाम दिया जाना। दोनों देशों के बीच का कनेक्शन काफी पुराना और गहरा है और आज भी तमिलनाडु में हजारों श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी रहते हैं। 2007 में सेना भेजने के बाद से लगातार भारत श्रीलंका की मदद करता आ रहा है। लेकिन बाद के दिनों में श्रीलंका भारत की बजाय चीन की गोद में जा बैठा और इसका अब उसे खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। चीन के चक्कर में श्रीलंका दिवालिया घोषित होने की कगार पर पहुंच गया। लेकिन इन सब के बीच भारत ने श्रीलंका में चीन के साथ एक बड़ा खेल कर दिया है। भारत के विदेश मंत्री श्रीलंका के दौरे पर गए थे। जहां भारत और श्रीलंका के विदेश मंत्रियों ने आधा दर्जन महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं और श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भारतीय विदेश मंत्री ने आश्वस्त किया है कि आर्थिक संकट से निपटने में भारत श्रीलंका को निरंतर सहयोग करता रहेगा। 

भारत ने चीन को ऊपर हासिल की बढ़त

जंग भले ही यूक्रेन में चल रही हो। लेकिन इस युद्ध ने दुनिया के हरेक देश को सतर्क कर दिया है। ज्यादातर देश अपने पड़ोस की सुरक्षा को लेकर सतर्क हैं। इसी कवायद के तहत भारत ने अपने पड़ोसी देश श्रीलंका में अपने सबसे बड़े दुश्मन चीन को तगड़ी मात दे दी है। भारत और चीन के बीच सालों से राजनीतिक वर्चस्व का अखाड़ा बने श्रीलंका में भारत ने चीन को ऊपर अब एक ऐसी बढ़त हासिल कर ली है, जिसकी बराबरी करना चीन के लिए मुश्किल होगा। श्रीलंका के दौरे पर गए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की मौजूदगी में भारत और श्रीलंका के बीच एक समझौता हुआ है। जिसके तहत भारत श्रीलंका के उत्तरी भाग के तीन छोटे द्वीपों में हाईब्रिड एनर्जी के प्रोजेक्ट शुरू करेगा। पहली नजर में भले ही ये एक छोटा सा समझौता लगे लेकिन सुरक्षा के लिहाज से एक अहम मसला है। भारत ने श्रीलंका के साथ जो डील की है वो पहले चीन के हाथ में थी। भारत ने इस डील को चीन को मात देकर हासिल किया है।

क्यों अहम है ये डील

जाफना के तीन द्वीपों नैनातिवु, नेदुन्तिवु और अनालाईतिवु पर हाइब्रिड विद्युत परियोजनाएं शुरू करने को लेकर भारत और श्रीलंका के बीच समझौता हुआ है। इससे पहले चीन की कंपनी सिनोसार टेकविन के साथ जनवरी 2021 में इन तीनों द्वीपों में हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने का अनुबंध किया गया था। भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई तो श्रीलंका में फिर से मंथन शुरू हो गया। भारत ने उस वक्त इन इलाकों में चीन की मौजूदगी पर अपनी चिंता जाहिर की थी। जिसके बाद इन परियोजनाओं को निरस्त कर दिया गया था। उत्तरी श्रीलंका के ये तीनों द्वीप भारतीय सीमा के बेहद करीब हैं। यहां चीन के प्रोजक्ट का सीधा मतलब भारत की सुरक्षा को खतरा था। भारत ने इस डील को चीन को मात देकर हासिल किया है। लेकिन भारत ने श्रीलंका के साथ अपनी डिप्लोमेसी के जरिये चीन को बाहर करके ये प्रोजेक्ट अब अपने हाथ में ले लिए हैं। 

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समुद्री सुरक्षा पर सहयोग को मिलेगा बढ़ावा

करीब तीन महीने पहले ही चीन को इन प्रोजेक्ट से बाहर कर दिया गया था। अब यहां भारतीय कंपनियां अपने प्रोजेक्ट शुरू करेंगी। श्रीलंका के साथ भारत की ये डील इसलिए भी महत्वपर्ण है क्योंकि पिछले कुछ सालों से चीन अपनी पकड़ यहां मजबूत कर चुका था। भारत और श्रीलंका ने कोलंबो में अत्याधुनिक समुद्री बचाव समन्वय केंद्र (MRCC) स्थापित करने के लिए भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। समझौता ज्ञापन पर 28 मार्च को विदेश मंत्री एस जयशंकर की कोलंबो यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हिंद महासागर क्षेत्र के एक हिस्से में दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा पर सहयोग को बढ़ाता है जहां पिछले एक दशक में भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता ने केंद्र स्तर पर कब्जा कर लिया है। इस महीने की शुरुआत में, भारत ने श्रीलंकाई नौसेना को एक नौसैनिक फ्लोटिंग डॉक और श्रीलंकाई वायु सेना को दो डोर्नियर विमान प्रदान किए।

चीन का नौ सेना के अड्डे बनाने का प्लान 

श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति उसे बेहद खास बनाती है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुंद्री मार्ग यानी हिंद महासागर में श्रीलंका की स्थिति बेहद खास है। चीन यहां अपना वर्चस्व स्थापित करके समुंद्री मार्ग को अपने मालवाहक जहाजों के आवागमन के लिए सुरक्षित बनाना चाहता था। इसके साथ ही चीन अपने नौ सेना के अड्डे बनाने के इरादे पाले हुए थे। चीन के ये इरादे भारत के वर्चस्व के लिए बड़ा खतरा है। चीन ने श्रीलंका में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए वहां शी जिनपिंग के ड्रीम प्रोजेक्ट यानी बीआरआई के तहत कई परियोजनाएं शुरू की थी। जिनके मुनाफे में न आने की वजह से श्रीलंका चीन के कर्ज के बोझ के तले दब गया है। श्रीलंका की कंगाली का आलम ये हो गया कि उसके पास रसोई गैस, कच्चा तेल, दूध और दवाईयां तक खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा नहीं बची है।  श्रीलंका ने 2017 में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह को एक राज्य-संचालित चीनी फर्म को 99 साल के पट्टे के लिए 1.2 अरब डॉलर की ऋण अदला-बदली के रूप में सौंप दिया था।

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चीन ने श्रीलंका से क्यों बढ़ाई नजदीकी

श्रीलंका और भारत के बीच संबंध दशकों पुराने रहे हैं। साल दर साल इसमें बढ़ोतरी ही देखने को मिली। 2007 के बाद जब श्रीलंका की सेना ने तमिल उग्रवादियों के खिलाफ अभियान तेज किया तो उस वक्त भी भारत उस अभियान में उसके साथ खड़ा रहा। लेकिन इस बीच चीन ने भी श्रीलंका पर अपनी नजरे बनाई रखी थी। 2005 में श्रीलंका के राष्ट्रपति बने महिंद्रा राजपक्षे का झुकाव चीन की तरफ अधिक था। वो अपने इलाके हंबनटोटा में एक बंदरगाह बनवाना चाहते थे। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने पहले भारत की तरफ देखा, लेकिन भारतीय कंपनियों के प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं दिखाने पर राजपक्षे चीन के पास पहुंच गए। चीन की बैंकों ने उन्हें दिल खोल कर कर्ज दिया। इसके बाद अपनी वित्तीय स्थिति को ठीक करने के लिए भी श्रीलंका ने चीन से कर्ज लिया। साल 2014 में शी जिनपिंग ने श्रीलंका का दौरा भी किया। देखते ही देखते श्रीलंका पर इतना कर्ज हो गया कि उसके पास ब्याज चुकाने तक के पैसे नहीं रहे। कर्ज न चुका पाने के कारण श्रीलंका को सामरिक दृष्टि से बेहद अहम हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 साल की लीज पर दे देना पड़ा।  लेकिन एक के बाद एक कई वजहों से श्रीलंका अभूतपूर्व आर्थिक बदहाली की ओर बढ़ता चला गया। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत जीडीपी टूरिज्म से आता है। उससे दो लाख लोग जुड़े हैं। कोविड के कारण ये सेक्टर तहस-नहस हो चुका है। इसके ऊपर से श्रीलंका सरकार ने खेती के इस्तेमाल में फर्टिलाइजर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इस रोक से श्रीलंका में खाद्य पर्दाथों के उत्पादन में कमी आई है। आटा चावल और दूध की कमी हो गई है।

भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ 

श्रीलंका को दिवालिया हालत से निकालने के लिए भारत ने एक बिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन दी है। वहीं चीन भी उसे ढाई बिलियन डॉलर की मदद देने का विचार कर रहा है। लेकिन सीधे कर्ज के तौर पर जो श्रीलंका को ड्रैगन के कर्जजाल में और ज्यादा फंसा सकता है। लेकिन अब श्रीलंका को चीन की यारी से होने वाले नुकसान का अंदाजा हो गया है। वो भारत में अपने पत्ते खोल कर चीन को श्रीलंका में चित कर दिया है। भारत श्रीलंका को 2.4 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दे चुका है और दोनों देशों के बीच विकास की कई अहम परियोजनाएं भी शुरू हुई हैं।  भारत के अडानी समूह ने भी उत्तरी श्रीलंका में दो अक्षय ऊर्जा संयंत्रों के लिए 50 करोड़ डॉलर की परियोजना पर काम शुरू किया है। इस बदलते मौसम पर चीन की भी नजदीकी निगाह होगी लेकिन भारतीय राजनय को इसे स्थायी, निरंतरतापूर्ण और दीर्घायु बनाने की कोशिशें लगातार जारी रखनी होंगी।

-अभिनय आकाश